भास्कर चक्रवर्ती की कविताएँ ::
बांग्ला से अनुवाद : बेबी शॉ

भास्कर चक्रवर्ती │ तस्वीर सौजन्य : seagull books

दोस्ती

दोस्ती को कौन नहीं समझता?
कविता, मैं कहता हूँ—
कविता लोगों को ख़ुश रखने की कला है

कविता लिखना वास्तव में
उतना आसान नहीं है
जितना आप सोचते हैं।

नहीं, धूम्रपान मत करो
एक सफ़ेद काग़ज़ के टुकड़े पर लिखो—मित्र
लिखो—मित्र मित्र मित्र…
हम दुखी हैं
हमारा रिश्ता दोस्ती से शुरू होता है
और इसका अंत होता है—कमीना-हरामी में…

प्रेमी-प्रेमिका

प्रेमी एक दिन पति बन जाते हैं।

पति तो वही हैं जो प्रेमी नहीं हैं…
लेकिन वे ऑमलेट खाते हैं।
फ़िश फ़्राई खाते हैं।
दो-तीन-चार बार सड़क के आस-पास
घूमकर आ जाते हैं
और बीड़ी पीते हैं…
थोड़ी और रात के बाद
नग्न तस्वीर देखते हैं।

प्रेमिकाएँ? वे कहाँ जाती हैं?
—वे पत्नियाँ बन जाती हैं
और पेट में बच्चा लेती हैं…

सारी बातें खो जाती हैं
शब्द खो जाते हैं

रसोई-घर की लाइटें जल उठती हैं…

काटाकूटी

काली स्याही पर
लाल स्याही की दुखद काटाकूटी

यह कुछ भी नहीं है।

सचमुच ऐसा कुछ भी नहीं है
अगर आपको याद नहीं है
एक काला लड़का—
रक्ताक्त धान के खेत में सो रहा है
अंतिम नींद…

जिराफ़ की भाषा1‘जिराफ़ की भाषा’ पुस्तक की 48वीं कविता।

इस सरगम को पार करने के बाद
मेरा दो घंटे आपके साथ बैठने का मन करता है।

मेरी तीसरी आँख खो गई है।

सीढ़ियों से ऊपर जो आ रहे हैं आज
मैंने उनका चेहरा नहीं देखा
तुम्हें दुखी करना
मेरे जीवन का तरीक़ा नहीं है

मैं जा रहा हूँ
क्योंकि मुझे जाना है
नहीं तो मैं
थोड़ी देर और रुक जाता।

अठारह मई, मेरे जीवन की

अठारह मई,
मेरी ज़िंदगी का
सबसे ख़ूबसूरत दिन हो जाओ तुम

यह सत्ताईस मई की शाम है
मैं अँधेरे में बैठकर लिखना चाहता हूँ
तुम कुएँ की बाल्टी की तरह
नाचते-नाचते
नीचे उतर जाओ
और मेरे लिए ले आओ
चिकना पवित्र जल
ले आओ अभिमान का पुरस्कार
और झंडा…

अँधेरे के बारे में

तुम ऐसे आकर खड़ी हो गई हो, जैसे दुपहर को ज्वर आता है। समय घड़ी के माध्यम से रक्त की रेखा की तरह चल रहा है।—क्या मैं बुख़ार से कभी उठ नहीं पाऊँगा? आज रात भी जागना है। शरीर मिल जाता है—एक कोमल शरीर में। मैं केवल अपनी दुनिया देखता हूँ… चारों ओर हज़ारों रोशनियाँ जल रही हैं, लेकिन मैंने अपने जीवन में ऐसा अँधेरा कभी नहीं देखा।

जिराफ़ की भाषा2‘जिराफ़ की भाषा’ पुस्तक की 23वीं कविता।

इस रात और इस अँधेरे में
तुम अकेली उसके साथ हो।

एक शांत हवा
और रेडियो चालू करके
कोई सो गया है।

तुम्हें जो जीवन मिला
वह कैसा लग रहा है तुम्हें?—
कठिन? बहुत एकाकी? बहुत अकेला?

जहाँ पैरों के निशान हैं, वहाँ
रक्त खिल उठता है!


भास्कर चक्रवर्ती (1945-2005) बांग्ला के समादृत कवि-लेखक हैं। उनका जन्म स्वतंत्रता-पूर्व कोलकाता में, शहर के सबसे पुराने और ऐतिहासिक उत्तरी भाग, बरानगर में हुआ। उन्होंने ब्रह्मानंद केशव चंद्र कॉलेज में अध्ययन किया। स्कूल शिक्षक रहते हुए उन्होंने 1960 के दशक में अपनी साहित्यिक यात्रा शुरू की और आधुनिक बांग्ला कविता संभव की। उनकी उल्लेख-योग्य पुस्तकों में हैं—‘शीतकाल कबे आसबे सुपर्णा’, ‘एसो, सु संबाद एसो’, ‘रास्ताय आबार’। बेबी शॉ नई पीढ़ी की सुपरिचित-सम्मानित बांग्ला कवि-गद्यकार-अनुवादक हैं। हिंदी और अँग्रेज़ी साहित्य से बांग्ला में उन्होंने सराहनीय अनुवाद-कार्य किया है। बांग्ला से हिंदी में अनुवाद करने का यह उनका प्राथमिक अवसर है। भास्कर चक्रवर्ती की कविताओं से परिचय कराने के लिए ‘सदानीरा’ उनकी बेहद शुक्रगुज़ार है।

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