प्रोमिला मन्हास की कविताएँ ::
डोगरी से अनुवाद : कमल जीत चौधरी

प्रोमिला मन्हास

चौखट

मेरी तुम्हारी दुनिया के माँझ
मीलों का पैंडा1पैंड़ा/तय किया हुआ रास्ता नहीं
बस पुतली जितना एक कपाट
अत्त संकरा
गर्भ-जून2वैष्णो देवी कथा-अनुसार वह सँकरी गुफा, जिसमें वैष्णों देवी; भैरों से बचने के लिए नौ महीने छुपी रहीं।-सा

मैं हूँ आर
तुम उस पार,
बीच में एक चौखट है
तब तक आर; पार न होगा
तब तक पार; आर न होगा
जब तक न; तुम हाथ बढ़ाओ
जब तक न; तुम साथ निभाओ।

कब यह आख़िर बार

माँ की कोख
कोख में दीया
दीये में मैं
दीये में मैं?
मैं कहाँ से आई?
चाँद से उतरी
आपमें शामिल हुई

पूजा की चौकी
चौकी पर दीया
दीये में मैं
दीये में मैं?
मैं कहाँ से आई?
जिसने मुझे जाया
उसने अंक लगाया

तुलसी का चबूतरा
चबूतरे पर दीया
दीये में मैं
दीये में मैं?
किसने मुझे पाया?
उसने,
मापें3मा-पें : वालिदैन ने/माँ-पिता ने मुझे;
जिसके संग ब्याहा

पिंडदान का थाल
थाल में दीया
दीये में मैं
दीये में मैं?
किसने मुझे सिराया?
उसने सिराया
जो मेरा जाया—

इसी तरह कब तक,
दीयों के चक्कर खाऊँगी
कब तक काँटों को,
अपने मग बनाऊँगी
कब तक लावों में,
हड्डियाँ तक गलाऊँगी
कब तक प्यार के,
समर्पित मोर नचाऊँगी
कब तक दीयों पर,
अपना सब कुछ लुटाऊँगी?

मैं किस दिन, चाँद से; सूरज से मिलूँगी
कब मेरा अस्तित्व रज कण में मिलेगा
कब यह बारिश बन; चिनाब में तिरेगा
आख़िर; कब यह आख़िर बार, विदेह को धरेगा?

ऐनक

जब मुझे दूर नज़र की ऐनक लगी
तो मेरी उससे नहीं बनी
मुझे दो आँखों पर और दो आँखें सजाना
बेमतलब-सा लगता था

तो ऐनक जहाँ-तहाँ रुलती रहती
प्रतीक्षारत रहकर
मुझे बिटर-बिटर ताकती
जैसे कोई नई नवेली
अपने साईं को देखती हो
और वह उस पर ज़रा भी ध्यान न देता हो

समय बीता…
मुझे कभी-कभी उसकी याद आती
आती, उस समय आती
जब आँखें थक जातीं
या उनमें रड़क पैदा होती

समय बीता…
नज़र की अकड़ भी
घनी होती धूल में विलीन हो गई
अब नहीं रहा जाता
ऐनक के बग़ैर
यदि कहीं रखकर भूल जाऊँ
तो घर आसमान पर
उठा लेती हूँ
आज क़द्र करती हूँ
दूर नज़र की ऐनक की।

काव्य-कला

ज़रूरत अनुसार
डेहरी4अनाज-भंडारण के लिए मिट्टी से बनाया गया पात्र से
कनक निकालना
धोना
सुखाना
ऊर्जा लगाकर
घराट तक पहुँचाना
आटा पाना
ज़रूरत अनुसार
आटा
त्राम्बड़ी5आटा गूँथने की परात/बरतन में डालना

आटा गूँथना
हथेलियों के गोल में
पेड़ा बनाना
पोरों की थाप से
पेड़ा थापना
गोल गोल बेलकर
फुलका6चपाती/रोटी बनाना…

फ़ोटो-फ़्रेम

जैसे बेटों को मिलती है
विरासत
दादी ने
मुझे मेरे बचपन में
पिता के साफ़े7पगड़ी की कुछ तंदें8कतरन/छाँटन सौंपीं
जिससे मैंने अपने लिए एक ककून बुना
ककून से बना मुलायम सुंदर रेशम
जिससे मैंने एक रेशमी कपड़ा बुना
इस कपड़े से एक फ़ोटो-फ़्रेम जड़ा
उसी में अपना संसार मढ़ा

फिर यह सोचकर कि
पीले-कमज़ोर जीव-कोशों पर जमी काई
उतर न जाए
उनमें नई ऊर्जा न आ जाए,
मेरी साँसें नीरवता में ही उच्छ्वास व निःश्वास हुईं

मगर हवा के दबाव से भी
फ़ोटो-फ़्रेम का शीशा तिड़क सकता था
सो घोंट रखने लगी साँस
समेट लिया वजूद
संचित किए अहम के टूटे-फूटे टुकड़े
बड़ी मशक्कत से
शून्य में विलय कीं इच्छाएँ
खींच ली चेतना, अंदर ही अंदर
सजा ली मुस्कान
बनकर शिला-सी
रूखे मौन के आवरण से ढक लिया अपना आप

मेरी बेटी मेरी ही सदी की पौध
मैं आज़ादी से पहले
वह आज़ादी के बाद
उसने नहीं ली विरासत में
दादी के हाथों से
अपने पिता के साफ़े की तंदें
वो किरमकश9रेशम के कीड़े पालने वाला नहीं
उसका अधिकार है पूरे साफ़े पर
वह पैदा हुई
रंग-बिरंगे पंख लिए
हँसती-गरजती, उसाँस भरती
प्राणों के मोहक फाहे फाँकती
लंबी गर्दन
सीधी रीढ़
अनंत पर उसकी जो नज़र है रहती
यह शून्य ही उसका फ़्रेम हुआ

जबरन पकड़कर मेरा हाथ
वह ले जाती है
मुझे फ़ोटो-फ़्रेम से बाहर
चक्कर कटवाती गास-आकाश
मगर मेरे फ़ोटो-फ़्रेम का शीशा नहीं तिड़कता
गिर्दा-गिर्द,
और गिन्नी खाती
एक ही बात मन में आती—

जिसके टूटने से डरती रही,
वह शीशा कभी था भी या नहीं,
है भी या नहीं?

पंजेब गुमरुट्ठ10उलझी हुई पायल

हिलती न ढुलती
पंजेब गुमरुट्ठ हुई
टखनों से सटी रहती
छनकना तो चाहती है
पर छनक नहीं पाती है
बस घुटी-घुटी
असहाय
विरहिणी का रूप धारे
अपने गुम हुए काले मोती
तलाशती
मुझसे बहुत नाराज़ रहती है
कि मैं उसके मोती खोजकर
उसे नहीं दे रही
मैं ज़रूर ढूँढ़ती
ढूँढ़कर उसे दे सकती
जो यह गिरे होते;
सफ़ेद संगमरमर पर
उसे कौन समझाए,
मरुपंथियों के बिछुड़े मोती
कभी नहीं मिला करते हैं।

गार11दलदल/खोह/कंदरा

न पैजनी हूँ
न चोली
न रानी हूँ
न गोली12दासी सुवास का प्रतिबिंब नहीं
तांडव वाला नृत नहीं
जननी हूँ
एक जन हूँ
पार भी हूँ
और आर भी
भव-सागर का गार भी।


प्रोमिला मन्हास सुपरिचित डोगरी कवि हैं। वर्ष 2022 में, ‘फुल्लें लदोई रात रानी’ शीर्षक से उनका पहला कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ, जिसे प्रो. रामनाथ शास्त्री अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। वह कई वर्षों तक दूरदर्शन और आकाशवाणी जम्मू में समाचार-वाचिका (Casual) भी रही हैं। संप्रति एक सरकारी विद्यालय में वनस्पति शास्त्र की वरिष्ठ व्याख्याता हैं। उनसे Promilamanhas1970@gmail.com पर बात की जा सकती है। कमल जीत चौधरी से परिचय के लिए यहाँ देखें : जैसे आस की आँखों में चमके डायन उदासी

प्रतिक्रिया दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *