कविताएँ ::
गिरिराज किराडू

ये कविताएँ पिछले पाँच-छह साल में लिखी गईं। यह वह समय है जब मैंने कोई कविता प्रकाशित नहीं की। इससे पहले भी मेरे जीवन में ऐसा लंबा समय आया है, जब मैंने कोई कविता नहीं लिखी या प्रकाशित नहीं की।

पिछले एक महीने के आरोपित एकांत में मैंने इधर के सालों में लिखी अप्रकाशित कविताओं को फिर से देखा और लगा कि इन्हें ख़ुद से दूर कर दिया जाए ताकि इनके साथ रहने के अज़ाब से छुट्टी मिले। मुझे शीर्षक देने में हमेशा समस्या रही है। यहाँ हर कविता के शीर्षक के तौर पर उस शहर/जगह का नाम है, जहाँ यह कविता लिखी गई या जहाँ के अनुभव से वह बनी। साथ में लिखने का वर्ष है। आख़िरी कविता फ़रवरी की शुरुआत में लिखी गई थी। आरोपित एकांतवास में अभी तक मैंने कोई कविता नहीं लिखी है।

मेरी कविताएँ पहली बार साल 1999-2000 में प्रकाशित हुई थीं, जब मैं चौबीस-पच्चीस साल का था। तब से अब तक मुझे अपने लिखने के बारे में तीन बातें समझ आई हैं। एक, मैं एग्जिस्टेंशियली लेखक शायद नहीं हूँ। दो, मैं वो काम लगातार नहीं कर पाता जो लेखन की तरह निपट अकेले करने होते हैं। और तीन, मैं ऑथर कहलाने से घबराता रहा हूँ। पिछले कुछ समय से ऐसे लोग ढूँढ़ रहा हूँ जो कोलोब्रेटिव लेखन में इंटरेस्टेड हों।

मुझे साहित्य-कला की दुनिया में वह काम करने में सुख मिला जिसमें बहुत-से दूसरे लोगों के साथ लग कर काम करना होता है। ‘प्रतिलिपि’ में राहुल सोनी और शिव कुमार गांधी के अलावा दुनिया भर की भाषाओं से कन्सलटेंट थे। ‘कविता समय’ जो उस समय हिंदी कविता का सबसे बड़ा इंडिपेंडेंट इवेंट था—उसके आयोजन में अशोक कुमार पांडेय और बोधिसत्व साथ थे। इंडिया हैबिटेट सेंटर के भारतीय भाषाओं के महोत्सव ‘समन्वय’ में सत्यानंद निरुपम के अलावा कई भाषाओं के सलाहकार और हैबिटेट की बेहतरीन टीम थी। यही सब करना साहित्य में मेरे लिए सबसे अच्छी चीज़ रहा है और पिछले चार सालों में ‘स्टोरीटेल’ के साथ यह जारी है।

गिरिराज किराडू

रोम 2017

“जो पास वाले घर में रहता है उसे मारा जा सकता है
जो पिछली गली में रहता है उसे मारा जा सकता है
जो शहर के दूसरे छोर पर रहता है उसे मारा जा सकता है
जो बाहर से आया है उसे आने के लिए मारा जा सकता है
जो शहर में नहीं रहता उसे उसके बच्चों के साथ मारा जा सकता है
वह हमारे जैसा नहीं उसके पूरे क़बीले को मारा जा सकता है”

धीमी आवाज़ में एक लड़की से कह रहा था वह
कोलोजियम के सामने सुनहरी बीयर पीते हुए

गली में दीवार पर ख़ून और तलवार की इबारत

रिसेप्शन पर एक नवनाज़ी
शहर जिसका उपन्यास है

राँची 2017

अपने दिमाग़ से सोचो
सीने में एक झरना बहने दो
क़बीलों के नहीं चेहरों के चित्र बनाओ मन में
कोई दो एक से नहीं अनगिनत को एक न मानो

शहर में संसद बिठाने आया है एक परदेसी
कार बस से धीमे और उसके पीछे चलती है
बस में राष्ट्रवादी हैं
बस चाय पानी के लिए रुकेगी
झिलमिल सितारों का आँगन होगा बज रहा होगा

राँची से जितना दूर जाओगे राँची से उतना ही दूर जाओगे

जमशेद एक नगर है
कम्प्यूटर में संसद बिठाने का डिज़ाइन है
बस में राष्ट्रवादी हैं

मुंबई 2017

समंदर से 950 मीटर दूर
ग्यारह मिनट का पैदल रास्ता
मरने के ख़याल से तीस मिनट पहले चूमने का ख़याल

उपदेशक स्त्री उसे घर पहुँचाने जाएगी
बाला साहब ठाकरे कला उद्यान के आगे से गुज़रेगी टैक्सी हमेशा की तरह
वह हनुमान चालीसा गाएगी सपने में

वर्सोवा में उसका प्रेमी बाज़ू पर नाज़ी टैटू बनवा रहा है

पेरिस 2017

आइफ़िल टावर को तीन सौ आँखों से देखना पड़ता है
भूरे इंसान को भूरा देखने के लिए एक जोड़ी आँखें काफ़ी होती हैं

“जिडान को हम क़त्ल भी माफ़ कर सकते हैं” बहत्तर घंटे बाद अंदाज़ा होता है
यह कहने वाला फ़्रेंच नहीं अल्जीरियन था

पेरिस में भूरा आदमी सुंदर से मारा जाता है

शिमला 2018
बेटे के लिए

अँग्रेज़ों के बंगले में रहने वाले दोस्त से मिलना
पहाड़ी बेचैन की शादी में जाना
हिटलर आया हिटलर आया से घबराना
सब छोड़कर
पेड़ गिनते हैं प्रति मकान प्रति दुकान
गाते हैं साईं का भजन मराठी में
गेंद को उछालते हैं तीसरी मंज़िल के पार

शिमला में आज जादूगर शंकर सम्राट सीनियर जूनियर का आख़िरी शो है
सब छोड़ना इसे मत छोड़ना

दिल्ली 2017

कोई एक विधि है जिससे सारे के सारे सात सौ करोड़ मुझमें साँस लेते हैं
यह हमेशा नहीं हुआ है
लेकिन वह ठीक समय पता है जब ऐसा हुआ है
तब मैंने कविता नहीं लिखी
साँस इतनी व्यस्त इतनी चहल-पहल से आबाद होने पर
हर-एक सेकिंड़ अपने से तेज़ हो जाता है

कविता, मुझे माफ़ करें, ख़ाली साँस की काहिली में लिखी जाती है।

दिल्ली 2020

आधार कार्ड वोटर कार्ड पैन कार्ड पासपोर्ट सब हैं

उदासी का आधार कार्ड नहीं होता। पैनकार्ड का तो सवाल ही नहीं उठता।
वोटर कार्ड होता था, ख़ुद उसी से खो गया लगता है।

आपके सामने लोग अपमानित किए जाएँगे मारे जाएँगे और आप
रोज़ अपने काग़ज़ को और सुरक्षित एक पॉकिट में जमाएँगे

चंडीगढ़ 2017
रघुवीर सहाय के लिए, फिर से

हत्या करने के विचार से उत्तेजित स्टूडियो को हर उस भाषा में बोलना आता था जिसमें अब तक बोलने और चुप रहने की कोशिश की थी मैंने मेरी कोई मातृभाषा नहीं थी जिसके एकांत में रोना अधिक करुण अधिक कलामय होता मैं उत्तर का था उत्तर में मातृभाषाएँ एक भाषावैज्ञानिक आपदा थीं

पड़ोसी घेर लेते थे पड़ोस की भाषा में
मनुष्य घबराते थे पड़ोस की भाषा में चीख़ते थे
पड़ोस की भाषा में ही मार दिया जाता था

न्याय के अपरम्पार अबूझ को जिल्द में बाँध कर
मानवाधिकार भी क्या चीज़ हैं कह कर अधिकारी हँसे

इलाहाबाद 2016

“जिन स्त्रियों से मुझे प्रेम हुआ उनमें तुम पहली ब्याहता हो”
पाँव के नाख़ून काटते हुए उसने कहा
वह अपने घर के सुरक्षित एकांत में था
कुछ समय पहले तक मैं उस भद्र एकांत में थी
यह वाक्य सुनते हुए बाहर के बीहड़ में पहुँच गई

वह जैसे पृथ्वी को देखता था उसे उसका अभिमान बहुत था
अभिमान नाख़ून काटने के अंदाज़ में भी था

वाक्य लेकिन सफ़ेद झूठ था

दिल्ली 2018

यह अलस्सुबह का सपना था
प्रधानमंत्री जैसा दिखने वाला एक व्यक्ति माफ़ी माँग रहा था
वह हिंदी में ही माँगी गई माफ़ी थी
एक ऐसी भाषा जिसमें माफ़ी माँगना लोग भूल गए थे

जयपुर 2014

सुबह तीन बजे हमने सुबह में रहने की ख़्वाहिश को तर्क कर दिया
चार बजे तक साफ़ नज़र आने लगे वे शव
जिन्हें दफ़नाने की ज़िम्मेवारी हमारी नहीं थी
पाँच बजे हमने अंतःकरण को एक हथियार की तरह खोंसा
छह बजे पार्क में फूलों पर मँडरा रहे थे ठहाके कभी बूढ़े कभी दुष्ट
सात बजे हमारे फ़ोन में गिरा ‘आक्रमण’
आठ बजे आरती हुई
नौ बजे बूट बजाए
दस बजे हम राष्ट्र हो गए

[पूर्व-प्रकाशित]

नवलगढ़ 2015

दादी के देहांत से घर में
छुआछूत का भी अंत हो गया हो ऐसा नहीं है

दादी ने वह सबको दिया थोड़ा-ज़्यादा
कुछ ने ख़ुद से झगड़ा किया कुछ ने हमेशा दूसरों से
हमारी संतानें भी संक्रमित हैं

हड्डियों के साथ यह भी जलेगा थोड़ा-ज़्यादा

बीरपाड़ा 2015

रेवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी का दफ़्तर
आस-पास की किसी भी दुकान से बड़ा है
टोप्पो फ़ुलटाइमर लोगों में सबसे ज़्यादा पार्ट टाइम है
और सबसे कम रेवोल्यूशनरी, सबसे कम सोशलिस्ट भी
उसका घर बंदापानी बागान में है
वह दो सौ रुपए दिहाड़ी में दूर से आए मारवाड़ी का गाइड है हफ़्ते भर के लिए
उसका घर एक ख़ाली खँडहर है
वह बर्बादी को निस्संग भाव से सुनाता है
बर्बादी इतनी है कि उसकी हिंदी से कम नहीं होती

वह कहता है यह मौत की बाड़ी है

उम्मीद उस अस्पताल की तरह जो बागान के साथ बंद हो गया

रेड बैंक 2015

मज़दूर नहीं जानते मालिक बनकर कैसे चलाएँ एक बागान को
एक अजनबी के सामने वे झगड़ते हैं गहरे दोस्तों की तरह
एकदम जानलेवा
उन्हें अपने रहस्यों की कोई परवाह नहीं
बर्बादी इतनी है कि कोई रहस्य नहीं है

अंत में थक कर वह कहता है तू ही रह ले उसके साथ लेकिन
फ़ैक्ट्री नहीं चला सकता तो उसे रख कर क्या करेगा

टोप्पो चल पड़ता है
सब मरेगा यह मौत की बाड़ी है
सिगरेट पिलाओ ना
तुमि बांग्ला बूझबे?

अलीपुरदुआर 2015

मानो कलक्टर साहब से सिर्फ़ यह सुनने के लिए
पचास किलोमीटर किराए की मोटर साइकिल चला कर आया कि
वह मेरा ट्रेन टिकट कन्फ़र्म करा पाने में असमर्थ हैं

कलक्टर साहिब ने यह कहते हुए अन्न वितरण की फ़ाइल चाय के पास रख दी

उन्होंने मुझसे पूछा मैं उनके कलक्टर दोस्त को कैसे जानता हूँ
मैं उनसे रेड बैंक और बंदापानी के बारे में बात करने आया था

वे बाहर तक छोड़ने भी आए

कानपुर 2016

“…तिया सोचता है हम …तिये उसका जीवन
कोने-कोने में ढूँढ़ेंगे उसे अदब से बताएँगे
फ़ोन करके
सर मिल गई है सी गेट
ग्रे कलर आप कलेक्ट करने आएँगे या मैं आप के
पते पर भिजवाने का इंतज़ाम करूँ
हमारा होटल सच में आपके लायक़ नहीं था
ऐसा लगता है आप अपना जीवन भूल जाने के लिए ही यहाँ आए थे”

626 GB

यह मेला उद्यम का है खड़े हो जाओ शुरू हो जाओ आय.आय.टी. में
स्टार्ट अप प्रोफ़ेसर से मिलने जा रहा है एक लोकतंत्र-प्रेमी परदेसी
भगाड़ जैसे पुल पर राष्ट्रवादी ऑटो से हिचखोले खाता हुआ

शहर के दूसरे छोर मकरंद देशपांडे
मकरंद देशपांडे का अभिनय कर रहा है

ऊपरवाले ने कमलापसंद पूरे शहर पर थूक दिया है

रायपुर 2015
विनोद कुमार शुक्ल के लिए, फिर से

इत्ते बड़े बीहड़ विविध देश को अनुभव करने के लिए
बहुत-सा निजी गल्प शायद ज़रूरी होता होगा
हर रोज़ हर एक के भीतर उसका अपना निजी एक देश बिखरता बनता होगा
हरेक हर रोज़ अपने भीतर के उस देश को खोता पाता होगा
देश बनाने के कठिन सार्वजनिक के समांतर
सबके भीतर थोड़ा थोड़ा सबका भीतर होता होगा
और बड़ी और बीहड़ और विविध एक पृथ्वी होती होगी
हस्ती का फ़रेब दुख का तापमान होता होगा
कोई डराने वाला फ़रमान होता होगा
हौसले जैसा सामान होता होगा
नश्वरता का अनुमान होता होगा

एथेंस 2017

लोकतंत्र-प्रेमी
पूरी तैयारी के साथ
पानी भोजन कंधे पर लटका कर
चढ़ा एक्रोपोलिस
शताब्दियों पीछे देख पाना बहुत मुश्किल नहीं था
लेकिन दिखाई आज का एथेंस ही दिया
अपनी ग़रीबी में कुछ कुछ जयपुर जैसा
और राह चलते इतिहास से टकरा देने में दिल्ली जैसा

रंगमंच कई थे सभी भव्य थे
यह तो शुरू से पता ही था कि ग़ुलामों का ज़िक्र कोई नहीं करेगा

वेटिकन 2017

Sean*, मैं सिस्टीन चैपल में हूँ
यह कला लेकिन मुझे बाँध नहीं पा रही
क्या इसलिए कि मुझे पढ़ने से नहीं देखने से ही मर्म मिलता है वाली बात में
अभी भी कोई सच्चा भरोसा नहीं?
सिस्टीन चैपल का अर्थ, बल्कि कई अर्थ तो यहाँ आने से पहले भी पता थे

मेरा ध्यान अटका है उस बूढ़े अमेरिकी में जिसे कम सुनाई देता है
उस अरब लड़की में जो अपने बेटे को सँभालने में इस क़दर खोई है
मानो सामान लेने अपनी गली में खड़ी हो
उस पादरी में जो थोड़ी देर पहले दिखा था और जिसकी शक्ल
नोखा के बाबा छोटूराम उच्च माध्यमिक विद्यालय के 1987 वाले
शारीरिक शिक्षक से मिलती है और
उस सिंगल पेरेंट गाइड में जिससे मैं दस साल पहले मिलता तो
‘पाप-भरे’ ख़यालों से नहीं बच पाता

शुक्रिया, माइकल एंजेलो बस एक तुम्हारी वजह से
बहुत तरह से अश्लील और दिव्य है ईश्वर का राज्य

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*फ़िल्म ‘गुड विल हंटिंग’ का पात्र ‘Dr. Sean Maguire’. संदर्भ के लिए यह दृश्य देखिए :

कलकत्ता 2019

पूरे समय उसने बताया कि
अगर दीदी को नहीं हटाया तो वो लोग हमको मार डालेंगे
मैंने कहा दादा इतना तो मुझे वहाँ से भी पता है
इधर आने का क्या फ़ायदा तुमसे बात करने का क्या फ़ायदा
कुछ अंदर की बात बताओ
वो बोला उन्नीस बरस हो गए अपना ज़िला छोड़े हुए
बांग्ला बोल सकते हो?
उसने जवाब नहीं दिया

दादा दादी नाना नानी बरसों वहाँ रहे
मेरे पिता ने राशन का अनाज पाने के लिए आठ साल की उम्र में ग़ुंडागर्दी की वहाँ
मेरी माँ ने स्वाभिमान सीखा नानी ने वोट देने की कला
लेकिन किसी ने बांग्ला नहीं सीखी
किसी ने मछली नहीं खाई

कहा बांग्ला गान सुनो
और मैं सच ही एमोनो बोंधु आरे की आचे* गाने लगा
कोखोनोवा स्नेहोमोयी सिस्टर, समझे झालर?

_______________________
* :

कलकत्ता 2018

नूतन बाज़ार टैगोर कासल और ढाकापट्टी नहीं लौट पाया
गणेश टाकीज़ और प्रभात सिनेमा भी नहीं
देखी वह नदी जो नानी ने नौ की उम्र में तैर कर पार की
हावड़ा ब्रिज पर लोहे और शोर को उस थप्पड़ की तरह सुना
जो बग़ल वाले कमरे के सोनीनानाजी ने 1982 में अपने ‘नौकर’ को मारा था

यह शहर मेरी नानी का उपन्यास है
यहाँ वह नौ बरस की उम्र में ब्याह कर आई थी
उसने यह उपन्यास मुझे लिखने के लिए सुनाया था
मैं अपनी मृत्यु के फेर से बाहर न निकला

कलकत्ता लिखना है

प्राग 2017

मैं फ़ुटबाल स्टेडियम में बने होटेल में ठहरा हूँ

दिन भर चार्ल्स ब्रिज के पार पुराना शहर
चौराहा बोहेमिया की मटमैली शाम
काफ़्का इस शहर में टूरिज़्म की शै है

निर्मल वर्मा का लिखा गल्प नहीं है मेरी याद में
सरकारी थिएटर की इमारत शायद तब भी वैसी रही होगी

शाम को स्टेडियम में सैकड़ों नवनाज़ी
नाज़ियों के हाथ में बीयर भी नाज़ी लगती है

जो निष्पक्ष है सुरक्षित नहीं टिकट खिड़की पर मुझसे कहा जाता है
मैं चेक क्लब का मफ़लर गले में डालता हूँ
और सोचता हूँ अब दो घंटे के लिए मैं चेक हूँ

हुबली 2017

परोपकार का स्थापत्य करोड़ों का
फ़रिश्ते यहाँ सुबह-शाम घूमते रहते हैं
दुनिया का हर ग़रीब उनके सॉफ़्टवेयर में है
दो डॉलर प्रतिदिन से कम पर जीने वालों के लिए
उनके पास बहुत से बेशक़ीमती सुझाव हैं

पाँच दिन पच्चीस देश के फ़रिश्ते करुणा से काँपते हैं
एक दूसरे का हाथ थामते हैं
बुद्धिमान सुंदर दिखते लोग
कम से कम तेईस लाख चालीस हज़ार शब्द बोलते हैं
अन्याय शब्द एक बार भी नहीं

भारतीय रेल 2015

पिता से कहकर उसने एक रात्रिवास में टिका दिया था
उसके घर में तुम्हारा प्रवेश निषेध है

इस यात्रा में तुम्हें उसके साथ नहीं होना था
तुम बिना टिकट उसके जीवन में आ गए हो

सपने में वह अपना विवाह देख रही है
राजधानी में सवेरा होगा

बार्सिलोना 2019

घर पर बात कर रहा हूँ
मेरी एक बहन दाने-दाने को मोहताज है
उसके पिता से हम लोगों का झगड़ा हुआ उससे नहीं
स्त्रियाँ एक दूसरे से रिश्ता ख़त्म नहीं करती ऐसा माँ कह रही है

उन बहनों ने मुझे बहुत प्यार किया है
मैंने किसी को भी नहीं उनको भी नहीं

उसी शाम मेरे जीवन के पहले पाकिस्तानी
इंडियन खिलाते हुए

मेड्रिड 2019
शिव कुमार गांधी के लिए, फिर से

एक

गुएर्निका की सुरक्षा कड़ी है म्यूज़ियम में
उसे दूर से देखना होता है
उसकी फ़ोटो नहीं ली जा सकती
उसकी फ़ोटो सिर्फ़ संग्रहालय ले सकता है
गुएर्निका को पंखा झालर काफ़ी टेबल बुक बनाया जा सकता है
उसके पास नहीं जाया जा सकता

गुएर्निका से ख़तरे का पता नहीं चले
इसलिए उसकी इतनी सुरक्षा है, कॉमरेड करात?

दो

जितने लोग संग्रहालय के बाहर लाइन में खड़े थे
उतने मैंने राशन पानी नोटबंदी की क़तार में भी नहीं देखे
वे सब गुएर्निका के पास सेल्फ़ी खींचेंगे इससे बड़ा ख़तरा गुएर्निका को
कोई हो सकता है, कॉमरेड करात?

भुवनेश्वर 2019

मंदिर में एक प्राचीन सभ्यता है
बाहर उन्मत्त बारिश

एक जीवन बीत गया
अब जो जीते हो वह विप्लव है कोशिकाओं का

यहाँ से कोलकाता नहीं सीधे मगध जाना

वेनिस 2017

ग्लास फ़ैक्ट्री में मज़दूर मेरिनेक मेरा नाम पूछती है
मैं कहता हूँ संध्या
उसे कभी पता नहीं होगा यह एक स्त्री नाम है

यह इतना सुंदर शहर है कि मैं घबरा कर एक गाँव भाग आया हूँ
गाँव में लोग बर्लुस्कोनी के बारे में पुराने जोक सुना रहे हैं

झुँझनू 2015

उसने कमरे को ऐसे देखा मानो वह सुकरात है और
उस कमरे में बैठे जिज्ञासुओं से संवाद शुरू कर रहा है
एक लड़के के कान में रब्बी शेरगिल बज रहा था
उसकी पूर्व प्रेमिका के कान में अइयईयो नेंजू वलयूधड़ी*
उसने पूछा कि कक्षा से यदि तुम सोचते नहीं तो तुम होते
लामा कहे जाने वाले ने कहा हूँ तो सोच भी लेता हूँ

खाना बिना अलंकार के लगा हुआ था
सफ़ाचट सर वाली एक लड़की ने सुर लगाना शुरू किया
कहब तो लग जाय ठाठ से

_______________________
* :

गिरिराज किराडू (जन्म : 1975) सुख्यात हिंदी कवि-आलोचक-अनुवादक और संपादक हैं। हिंदीसाहित्यसंसार में उनकी गति गहन है। एक सुचर्चित और सुदीर्घ काव्य-जीवन में वह अपनी कविता के प्रकाशन को प्रदीर्घ अंतरालों के लिए स्थगित करते रहे हैं। इन अंतरालों में उनके बाद के कवि हिंदी कविता से अपने परिचय-अपरिचय में एक नए कविता समय को जन्म देते रहे हैं। कवियों और कविता के इस अवध्य, अप्रतिहत और प्रकाशित कोलाहल में गिरिराज ने अपनी कविता को धैर्ययुक्त गंभीरता और ज़िम्मेवारी दी है। इस विचार में वह इस प्रकाशित कोलाहल से दूर जाकर कविता रचते, उसे स्थगित करते और फिर उसे एक लंबे प्रकाशनावकाश के बाद प्रकाशित करके ख़ुद से दूर करते हैं। इस प्रकार हिंदी कविता में कुछ इस प्रकार का एक ‘प्रकाशपर्व’ संभव होता है जिसकी एक विशेषता उसकी प्रतीक्षा में भी है। यह प्रतीक्षा इस तथ्य की तस्दीक़ करती है कि जिसने कभी भी कुछ महत्त्व का रचा है, वह कभी भी लौट सकता है—फिर से महत्त्व का रचने के लिए। महत्त्व के इस क्षण में यह हिंदी कविता का ‘गिरिराजयोग’ है। ‘सदानीरा’ का सौभाग्य है कि वह इस अवसर की साक्षी है। गिरिराज किराडू से rajkiradoo@gmail.com पर बात की जा सकती है।

2 Comments

  1. प्रभु नारायण वर्मा अप्रैल 15, 2020 at 6:16 पूर्वाह्न

    गिरिराज जी, बहुत अच्छी कविताएँ लिखते हैं आप। एक ग़ुस्सा, एक दुख और एक रियलिस्टिक निराशा को न्यूनतम छवियों में रिकॉर्ड करना महारत का काम है। ग़ायब मत होइएगा फिर से किसी ज़िद में। यही आपका घर है।

    Reply
  2. हरप्रीत कौर अप्रैल 17, 2020 at 12:14 अपराह्न

    बधाई किराडू जी| अच्छी कवीताओं के लिए लंबे समय बाद आपको पढ़कर अच्छा लगा|

    Reply

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