गद्य ::
कार्ल ओवे क्नॉसगार्ड
अँग्रेज़ी से अनुवाद : प्रवीण झा

Karl Ove Knausgård writer
कार्ल ओवे क्नॉसगार्ड

हृदय के लिए जीवन सामान्य है; यह तब तक धड़कता है, जब तक धड़क सकता है। और फिर यह रुक जाता है। आज नहीं तो कल, एक दिन, यह धड़कन अपनी मर्ज़ी से रुक जाएगी, और रक्त शरीर के सबसे निचले बिंदु की ओर बह कर एक स्थान पर जम जाएगा; बाहर से यह एक काले, कोमल धब्बे की तरह नज़र आएगा, चाहे आदमी कितना भी गोरा हो; जैसे-जैसे शरीर का तापमान घटेगा, भुजाएँ अकड़ जाएँगी, और अँतड़ियाँ सूख जाएँगी। पहले कुछ घंटों में यह प्रक्रिया इतनी निष्ठुरता से घटती है, जैसे यह कोई धर्म-कर्म हो, जैसे जीवन का अंत कुछ स्पष्ट नियमों से हो रहा हो, जिनसे मृत्यु के प्रतिनिधि भी बँधे हैं, इस हद तक कि वे तब तक प्रतीक्षा करते हैं जब तक जीवन एक नए स्वरूप के आने से पहले पूरी तरह ख़त्म न हो जाए। एक ऐसे बिंदु तक जहाँ से जीवन पुन: वापस न आ सके।

असंख्य कीटाणुओं को शरीर में प्रवेश करने से अब रोकना असंभव है।

अगर वे कुछ घंटे पहले प्रवेश करने का प्रयत्न करते तो उन्हें प्रतिरोध मिलता, लेकिन अब शांति है, और ये कीटाणु सहजता से इस आर्द्र अंधकार में प्रवेश कर रहे हैं। वे शरीर के हैवर्स-नलिका से गुज़र कर लिबरकुह्न ग्रंथियों से होते हुए लैंगरहैंस द्वीप-समूह पहुँचते हैं। वहाँ से वे गुर्दे के बोमैन कैप्सूल, रक्त-मज्जाओं के क्लार्क स्तंभों, और मष्तिष्क के काले पदार्थ से गुज़रते हुए हृदय तक पहुँचते हैं। हृदय अब तक सुरक्षित है, लेकिन इसकी वह गतिविधि ख़त्म हो चुकी है जिसके आधार पर इसकी संरचना है; एक विचित्र एकांत, जैसे किसी कारख़ाने के सभी कर्मी जल्दबाज़ी में कहीं भागने को विवश हुए हों, या फिर जैसे एक घने जंगल में खड़ी पीली गाड़ियाँ, या किसी पहाड़ी से नीचे लटकती एक पुरानी रस्सी जिसमें अब भी पानी से भरी एक बाल्टी बँधी है।

शरीर से जीवन के निकलते ही, यह मृत्यु के अधीन हो जाता है। शरीर ही क्या, ये लैंप, सूटकेस, क़ालीन, दरवाज़े, खिड़कियाँ, खेत, दलदल, धाराएँ, पहाड़, बादल, आकाश। इनमें कोई भी हमारे लिए पराए नहीं। हम ऐसी ही वस्तुओं और सिद्धांतों से घिरे हैं, जो मृत संसार का अंश हैं। लेकिन फिर भी हमें किसी के मृत स्वरूप से इतनी घृणा नहीं होती जितनी कि मनुष्य के, कम से कम हम लाशों को अपने पास देखना तो पसंद नहीं करते। बड़े-बड़े अस्पतालों में वे न सिर्फ छुपा कर रखे जाते हैं, बल्कि उनको जिन कमरों में रखा जाता है, वे भी छुपे हुए होते हैं। उनके अपने लिफ़्ट, अपने तहख़ानों के गलियारे। और अगर आप वहाँ तक पहुँच भी गए तो उनका शरीर सफ़ेद चादर में लिपटा मिलेगा। जब उन्हें अस्पताल से बाहर ले जाया जाता है, तो एक विशेष द्वार से ले जाया जाता है; ऐसी गाड़ियों में, जिनके शीशे चढ़े होते हैं; गिरजाघर के मैदानों में भी उनके लिए अँधेरे कमरे होते हैं, और उन्हें ज़मीन में गाड़ते समय भी ताबूत में बंद रखा जाता है। पता नहीं, इससे आख़िर क्या लाभ मिलता है?

खुली लाशों को अस्पताल के गलियारों से साधारण टैक्सी में लिटा कर या बिठा कर भी ले जाया जा सकता है, किसी को उनसे कोई ख़तरा नहीं। अगर एक वृद्ध व्यक्ति सिनेमा-हॉल में फ़िल्म देखते मर गया, तो उसे वहीं बैठे रहने दिया जाए, चाहे तो अगले शो तक भी। अगर कोई शिक्षक विद्यालय के मैदान में हृदयाघात से मर गए, तो उन्हें वहीं लेटे रहने दिया जाए। तुरंत ले जाकर क्या होगा? जब तक उनके परिजन आ नहीं जाते, उनको पड़े रहने दिया जाए, चाहे वे दुपहर को आएँ या देर रात। अगर कोई चिड़िया आकर उनके शरीर में चोंच मार ही दे तो क्या होगा? और वैसे भी क़ब्र में लिटा कर उनके शरीर की क्या बेहतर क़द्र होने वाली है? जब तक कोई लाश किसी का रास्ता नहीं रोकती, उसे हटाने की क्या ज़रूरत है? वे दुबारा तो मर नहीं सकते।

जाड़े की ठंडी हवाएँ तो इस मामले में अधिक अनुकूल होंगी। एक बेघर व्यक्ति ठंड में बेंच पर बैठे-बैठे मर जाए, कोई एक ऊँची इमारत या पुल से छलाँग लगा कर आत्महत्या कर ले, एक वृद्धा सीढ़ियों से गिर जाए, ट्रैफ़िक दुर्घटनाओं में एक शरीर गाड़ियों के मध्य दब जाए, एक शराबी फिसल कर झील में गिर जाए, एक बच्ची खेलते-खेलते किसी बस के टायर के नीचे दब जाए। इन्हें सार्वजनिक आँखों से छुपाने की क्या आवश्यकता है? शिष्टाचार? इससे बेहतर शिष्टाचार क्या होगा कि बच्ची के माँ-बाप को वही दबा-कुचला शरीर उसी जगह दिखाया जाए, जहाँ यह घटना हुई। उसका कुचला हुआ सिर, छिन्न-भिन्न शरीर, ख़ून से लथपथ बाल, और उसकी अब तक बेदाग़ जैकेट। पूरी दुनिया के समक्ष, कोई रहस्य नहीं। जैसी वह थी, वैसी ही। लेकिन लोग उस एक घंटे का भी इंतज़ार नहीं करना चाहते, जब तक उसके माँ-बाप आ जाएँ।

वह शहर जो लाशों को तुरंत नहीं हटाता, जो मरे हुए व्यक्ति को यथास्थान छोड़ देता है—हाइवे पर, गलियों में, पार्क में, गाड़ी पार्किंग में, वह शहर नर्क कहलाता है। जबकि यह नर्क हमारे यथार्थ के अधिक क़रीब है। हम यह जानते हैं, लेकिन इसका सामना नहीं करना चाहते। मृत्यु को छुपाना सामूहिक शोषण का जीता-जागता प्रतीक है।

लेकिन आख़िर किसका शोषण हो रहा है, यह स्पष्ट नहीं। यह मृत्यु तो नहीं, क्योंकि यह तो समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। अख़बार और टेलीविजन मृत्यु को समुचित स्थान देते रहे हैं। मृत्यु की परिस्थितियों के अनुसार इसके महत्त्व घटते-बढ़ते रहते हैं, लेकिन वार्षिक औसत लगभग स्थायी है। और ये इतने माध्यमों से संचारित होते हैं कि आप इन ख़बरों से बच नहीं सकते। किंतु इस तरह की मृत्यु हमारे लिए ख़तरा नहीं। बल्कि हम तो ऐसी मृत्यु देखना और पढ़ना चाहते हैं। गल्प-कथाओं में इतनी लाशें गिरती हैं कि इसे गुप्त रखने का तात्पर्य समझ नहीं आता। अगर मृत्यु की चर्चा से हमें डर नहीं लगता, तो लाशों को छुपाना क्यों? या कहीं हम यह समझते हैं कि मृत्यु की परिकल्पना और वास्तविक मृत्यु भिन्न हैं?

संभव है कि हमारे मन में मृत्यु की परिकल्पना इतनी गहरी है कि उसमें तनिक भी विकृति हमें भयभीत करती है, और हम उस विकृति को दुनिया की नज़रों से छुपाते हैं। यह कोई सोची-समझी योजना नहीं है, जो श्राद्ध-कर्मों के माध्यम से की जाने लगी है, और अपने स्वरूप को अतार्किक से तार्किक, सामूहिक से व्यक्तिगत में बदलती रही है; बल्कि लाशों को छुपाना तो कभी प्रश्न रहा ही नहीं। यह तो युगों-युगों से होता आ रहा है, किसी ऐसी अनिवार्यता से, जिसे कोई नहीं जानता।

अगर किसी पतझड़ के मौसम में एक इतवार की दुपहर आपके पिता घर के बाहर मर जाएँ, आप जल्दी से उनके मृत शरीर को घर के अंदर लाकर चादर से ढँक देते हैं। प्रवृत्ति यहीं तक सीमित नहीं है। हम उन्हें ज़मीन के क़रीब भी यथाशीघ्र रख देते हैं। किसी भी अस्पताल का मुर्दा-घर चौथी मंज़िल पर नहीं होता, लाशें सदैव ज़मीन के क़रीब निचले तल पर या तहख़ाने में ही रखी जाती हैं। और आगे भी जो एजेंसियाँ इन लाशों से गुज़रती हैं, उनका भी यही नियम है। बीमा कंपनियाँ आठवें माले पर होंगी, लेकिन श्राद्ध-कर्म कार्यालय निचले तल पर ही होंगे—मुख्य सड़क या गली में। संभव है कि इसका वैज्ञानिक कारण यह रहा हो कि ज़मीन के नीचे तापमान कम रहता हो, तो ऐसी रीति बन गई हो। लेकिन आज के कोल्ड-स्टोरेज के ज़माने में भी यही रीति है। क्या ज़मीन के ऊपर लाश को ले जाना और मृत्यु विरोधाभासी हैं? जैसे हम सभी मनुष्यों के अंदर यह धारणा बस गई हो कि मृत्यु सदैव इस मिट्टी के क़रीब ही है।

यह प्रतीत होता है कि मृत्यु का संचार दो माध्यमों से होता है। एक जो छुपाने या गुरुत्वाकर्षण से होता है, मिट्टी और अँधेरे से; और दूसरा खुली हवा से, हल्केपन से। मध्य-एशिया में एक पिता अपने बच्चे को विनाश से बचाने के लिए भगा कर ले जा रहा है, और उन दोनों की मृत्यु हो जाती है, उनकी लाशों से लटकते मांस के लोथड़े तमाम टी.वी. चैनल्स और इंटरनेट के माध्यम से दुनिया भर में पसर जाते हैं, और हमारे मस्तिष्क में मृत्यु की एक और छवि अंकित हो जाती है। इन छवियों में न कोई वज़न होता है, न गहराई, न समय, न स्थान और न वे लोग जो इन शरीरों को कभी धारण करते थे। वे अब कहीं नहीं हैं और वे अब हर जगह हैं। उनमें से कई लोग हमारे आँखों सामने से गुज़र कर दिमाग़ की सिलवटों में दब जाते हैं। एक स्की करती हुई युवती की जाँघ में एक चोट लगती है, उसकी एक धमनी फट जाती है और उसके साथ-साथ उसका शोणित भी पहाड़ से बह रहा होता है। उसके शरीर के नीचे आने से पहले ही वह मर चुकी होती है।

एक हवाई जहाज़ उड़ता है, और उड़ते ही उसकी पत्तियों में आग लग जाती है, और पल भर वह काले धुएँ का एक बड़ा गोला बन कर नीले आकाश में लुप्त हो जाता है। उत्तरी नॉर्वे में एक मछुआरा नाव सहित ग़ायब हो गया। टी.वी. पर बताया गया कि मौसम साफ़ था, कोई तूफ़ान नहीं आया और हेलीकॉप्टर से लिए चित्र भी बस एक वीरान समंदर दर्शा रहे हैं। आकाश में कुछ बिखरे बादल दिख रहे हैं, लेकिन उतने घने भी नहीं। वह बस यूँ ही एक दिन मर गया। रिपोर्टर टी.वी. पर कुछ कह रहे हैं, और मुझे भी बस एक वीरान नीला समंदर ही दिख रहा है। और तभी एक क्षण के लिए मुझे उस जल से उभरता एक चेहरा दिखाई दिया। पता नहीं, यह एक सेकंड के लिए था या उससे भी कम। लेकिन यह छवि मेरे जीवन पर एक गहरी छाप छोड़ गई और जैसे ही यह छवि ओझल हुई, मुझे लगा कि यह बात किसी को बतानी चाहिए।

कार्ल ओवे क्नॉसगार्ड (जन्म : 1968) नॉर्वेजियन लेखक हैं। यह प्रस्तुति उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘मीन कैम्प’ (अँग्रेज़ी में ‘माइ स्ट्रगल’) के पहले खंड के पहले अध्याय के एक अंश का अनुवाद है। प्रवीण झा हिंदी के सुपरिचित लेखक हैं। ‘कुली लाइन्स’ उनकी नवीनतम पुस्तक है। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखें : किताब कैसे पढ़ें

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