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भालचंद्र नेमाडे के कुछ उद्धरण :: मराठी से अनुवाद : सूर्यनारायण रणसुभे समीक्षा लिखना—यह साहित्य में मुफ़्तख़ोरी की क्रिया है। ● समीक्षा पूर्णतः निर्गुण रूप में एक व्यक्ति द्वारा साहित्यादि कलाओं पर किया गया चिंतन होता है। ● समीक्षा साहित्य-भूमि से रस सींचनेवाला जीवंत शास्त्र...
पाठ :: श्रुति कुमुद 'जिगरी' की ज़मीन प्रकृति पर मनुष्य को तरजीह या दोनों का समन्वय, यह द्वंद्व हर दर्शन को आकार देता रहा है। बीसवीं सदी में विज्ञान की मदद से मनुष्य ने ख़ुद को केंद्र में स्थापित कर लिया और...
पाठ :: अमितेश कुमार विष्णु खरे की कविता में स्त्रियाँ ‘देखना’ को विश्लेषित करते हुए अपने अंतिम साक्षात्कार में विष्णु खरे बताते हैं कि आयु और परिवेश के अलग-अलग अनुभव और चरण किस तरह देखने की सलाहियत पैदा करते हैं : बचपन,...
गद्य :: आशुतोष दुबे आलोचना का अकाल चेक कवि मिरोस्लाव होलुब ने लिखा है : ‘‘कविता नाम वापिस लेने की प्रक्रिया में संभव होती है।’’ अगर इसी का विस्तार करें तो आलोचना शायद नाम देने की प्रक्रिया में संभव होती है। यह...
‘अताशी’ पर :: गार्गी मिश्र बख़्शे है जल्वा-ए-गुल ज़ौक़-ए-तमाशा 'ग़ालिब' चश्म को चाहिए हर रंग में वा हो जाना हमारे आस-पास और हमसे दूरस्थ संसार में ऐसी कहानियाँ साँस ले रही हैं जो यह कहना चाहती हैं कि उन्हें सुनने और समझने...
‘पाताल लोक’ पर :: स्मृति सुमन अमेज़न प्राइम पर प्रसारित हो रही वेब सीरीज ‘पाताल लोक’ अनेक कारणों से चर्चित और प्रशंसित हो रही है। इस पर कई दृष्टिकोणों से चर्चा की जा सकती है, पर मेरे ख़याल से चर्चा करते...