नज़्में ::
इरशाद ख़ान सिकंदर

इरशाद ख़ान सिकंदर

भीड़

भीड़ तो बस भीड़ है
इस भीड़ का क्या
भीड़ ने मंदिर बनाए, बुत तराशे
मस्जिदें तामीर कीं सजदे किए
देवताओं और ख़ुदाओं को लगाया काम पर
चौक चौराहे सड़क गलियाँ ख़ुदा से भर गईं
इस क़दर कि राह चलना हो गया दुश्वार
भीड़ बढ़ती जा रही है
ये ज़मीं को खा रही है
आसमाँ भी आजकल ख़तरे में है
भीड़ के क़ब्ज़े में है
भीड़ ने आदत लगा ली भीड़ की
और आदमख़ोर आदत के सबब
भीड़ से बाहर कोई निकला तो वो मारा गया
भीड़ में शामिल रहो
मैं भी रस्मन भीड़ में शामिल हुआ
ज़िंदा रहने के लिए था लाज़मी
हाँ मगर मैं भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ
भीड़ तो बस भीड़ है
इस भीड़ का क्या

मेरा जवाब

मैं कि एक शाइर हूँ
सर से पाँव तक शाइर
लफ़्ज़ ओढ़ता हूँ मैं लफ़्ज़ ही बिछाता हूँ
लफ़्ज़ों की इनायत से अपना घर चलाता हूँ
आलिमो की सुहबत से
ज़ीस्त की शरीयत से
मेहनत-ओ-मशक़्क़त से
पाई-पाई जोड़ी है
ये जो मेरे खाते में
चंद लफ़्ज़ हैं साहब
ये मिरी कमाई हैं
आप ऐरे-ग़ैरे हैं

मुआफ़ कीजिए हज़रत
अपनी मैं जमा-पूँजी
यूँ ही ऐरों-ग़ैरों पर
ख़र्च कर नहीं सकता

क्यों जहाँ में आए हम

वक़्त की दराँती जब,
ज़िंदगी की फ़स्लों को
काटने को लपकी तो,
एक नज़्म लिखनी थी
नज़्म लिख न पाए हम

जब कराहता सूरज,
शाम के मुहाने पर
गिर पड़ा था ज़ख़्मी-सा,
चंद शे’र कहने थे
शे’र कह न पाए हम

शब के ज़ेरे-साया कल,
चाँद ने कहा जिस दम
सुनिए आप मेरे हैं,
कोई गीत गाना था
गीत गा न पाए हम

वो समय भी आया जब,
इक भरे थिएटर में
मंच पर उदासी थी,
हमको रक़्स करना था
रक़्स कर न पाए हम

दिन गुज़ारा जूँ-तूँ कर,
जैसे-तैसे काटी शब
अपनी ऐसी हालत पर,
सर्द आह भरना थी
आह भर न पाए हम

ज़िंदगी को शिकवा है,
एक भी कसौटी पर
हम खरे नहीं उतरे,
कौन जान सकता है
क्यों जहाँ में आए हम

हिसाब

तिरे जो गाल पे इक तिल है दशमलव की तरह
उसी ने दिल में मिरे एक रेखा खींची है
तमाम रात मुहब्बत गणित लगाती है
मिरे हिसाब में हर बार तू ही आती है

सितारे चाँद उछालते हैं

तुम्हें हैरत बहुत होगी
मगर ये हमने देखा है
ज़मीं पर इक फ़लक ऐसा
जहाँ अक्सर ये होता है
सितारे चाँद उछालते हैं

तुझको भूल जाऊँ मैं

आज बरसों के बाद ये सोचा
क्यों न थोड़ा-सा मुस्कुराऊँ मैं
अपनी बोझल उदास पलकों पर
कुछ ख़ुशी के दिए जलाऊँ मैं
अपने होंटों को आइना देकर
कम से कम ज़ंग तो हटाऊँ मैं
दिल के सूने पड़े-से कोनों में
गुलूकारों को ला बिठाऊँ मैं
धूल तन्हाइयों की साफ़ करूँ
घर से बाहर क़दम बढ़ाऊँ मैं
अपनी बेचैनियों को यकजा कर
कारनामा कोई दिखाऊँ मैं
मेरे बस में है कोशिशें करना
कोशिशें क्यों न करता जाऊँ मैं
क्या ख़बर इन तमाम हिकमत से
एक दिन तुझको भूल जाऊँ मैं
एक दिन तुझको…


इरशाद ख़ान सिकंदर उर्दू की नई पीढ़ी के अत्यंत सुपरिचित शाइर हैं। ‘आँसुओं का तर्जुमा’ और ‘दूसरा इश्क़’ उनकी शाइरी की चर्चित किताबें हैं। उनसे ik.sikandar@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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