वहीं के वहीं रहना

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व्यंग्य ::
प्रचण्ड प्रवीर

वहीं के वहीं रहना

कल की बात है, जैसे ही मैंने एयरपोर्ट के बाहर क़दम रखा, मेरे सहयात्री ने मुझे इशारे से बताया कि एयरपोर्ट की विशेष सेवा वाली बस आगे से मिलेगी। देश के प्रमुख हवाई अड्डों पर नगर बस सेवा उन लोगों के लिए है, जो बेहद महँगी टैक्सी-सेवा का उपयोग नहीं करना चाहते। समस्या थी कि पटना से आगे अपने घर तक की यात्रा कैसे की जाए? कोरोना-काल में अगर रेलगाड़ी में पहले से आरक्षण नहीं किया हो, फिर रेल तो भूल ही जाइए। मेरे सहयात्री संजय जी ने मुझे बताया कि गांधी मैदान से सरकारी बस मिल जाएगी। वह भी मेरे शहर की तरफ़ ही जा रहे थे। मतदान के मद्देनज़र निजी बस सेवा बंद थी। एयरपोर्ट से चलने वाली बस में कंडक्टर हमें बिठा कर ख़ुश हुआ कि इन दिनों लोग इस बस का प्रयोग करने लगे और अफ़सर को रिपोर्ट देना अच्छा होगा। एक नवयुवक शायद किसी को छोड़ने आया था और अब लौट रहा था। उसने चौंकते हुए कहा, “क्या? पचास रुपए? यहाँ से गाँधी मैदान के? दस रुपया से ज़्यादा नहीं होता।” कंडक्टर ने तेवर दिखा कर कहा, “अरे, अब बस चल दी है। हमने रिपोर्ट भेज दी है, अब तुम तमाशा कर रहे हो? चुपचाप पैसा निकालो।”

नवयुवक भी तैश में आ गया, “आप बेईमानी कर रहे हैं।” कंडक्टर ने उतने ही ग़ुस्से में कहा, “पैसा कैसे नहीं दोगे? हम तुम्हारा शर्ट छीन लेंगे। हम तुम्हारा मोबाइल छीन लेंगे।” नवयुवक का युवा जोश होश खोने लगा, “छीन के दिखाइए? हाथ लगा के दिखाइए तो ज़रा।”

ड्राइवर ने बीच-बचाव किया, “देखो यह सही भाड़ा है। आपको टिकट दिया जाएगा।” कंडक्टर अब तक अस्सी के दशक का सर्वहारा हीरो बन चुका था, उसने इशारे से कहा, “तुम चुप रहो न। हाँ सुनो, तुम पैसा नहीं दिए तो तुम्हारा बैग छीन लेंगे। कैसे नहीं दोगे? बिना पैसा लिए हम उतरने नहीं देंगे।”

हमारे सहयात्री संजय जी और हम ये तमाशा देख रहे थे। संजय जी ने कहा, “ये समाजवादी है।” मैंने अचकचा के पूछा, “मतलब?”

“मतलब यह है कि देसी समाजवाद यही है। जिसके पास कुछ चीज़ हो और दूसरे के पास नहीं, तो दूसरे को अधिकार है कि वह पहले से छीन के बाँट ले। सरल शब्दों में यही समाजवाद की परिभाषा है।”

मैं इस परिभाषा को अभी समझ ही रहा था कि समाजवाद की लाठी के ज़ोर से कुछ डरते हुए पर फिर भी झूठी शान बघारते नवयुवक ने समाजवादी कंडक्टर को पचास का नोट थमा दिया।

गांधी मैदान पहुँच कर पता चला कि सरकारी बसें दशकों से खस्ताहाल थीं। इस कोरोना-काल में जब रेल बंद हो गई है, तब आनन-फानन में सरकार ने परमिट पर बहुत-सी बसों को लगा रखा है। उधर से आएगी, तभी जाएगी। मतदान के बाद चुनाव-परिणाम का बाज़ार गर्म था। “विपक्षी पार्टी ने कहा है कि दस लाख सरकारी नौकरी देंगे।” किसी और ने तंज़ कसा, “व्याकरण अशुद्ध है। नवीं पास नेता जी कहना चाह रहे थे कि दस लाख में सरकारी नौकरी देंगे।” पहले ने कहा, “राष्ट्रवादियों ने वह राह भी बंद कर थी। इसी बहाने घर पर नौकरी मिल जाएगी।”

हमारे सहयात्री काउंटर पर पता करके आए और बोले, “टिकट दो सौ रुपए का है, लेकिन चार सौ लेगा तभी टिकट देगा।” मैंने पूछा, “क्यों?”

“बड़े अजीब आदमी हैं आप?” संजय जी भड़के, “सरकार बदल रही है। दुनिया का मिजाज़ बदल रहा है। आप वहीं के वहीं रहना चाहते हैं।” हम फिर भी नहीं समझे। संजय जी ने तरस खाकर कहा, “ये पूँजीवादी हैं।”

“कैसे?”

“सरल शब्दों में पूँजीवाद क्या है? यही कि जो चीज़ आपको दस में मिल सकती है, वह बाज़ार से ग़ायब करके आपको बीस में लेने में मजबूर कर देंगे। आप ख़ुशी-ख़ुशी लीजिएगा, क्योंकि उसमें इंग्लिश का तड़का लगा रहेगा।”
“इंग्लिश का तड़का?”
“और क्या? भारत में जितने भी कपड़ों के ब्रांड हैं, सबके अँग्रेज़ी नाम हैं। सब देसी कम्पनियाँ बनाती और बेचती हैं। लेकिन जब तक अँग्रेज़ी का तड़का नहीं लगता, आप क्या मफ़तलाल को पूछते हैं? जब तक डकैती और कालाबाज़ारी सोशलिज़्म और कैपिटलिज़्म के नाम से आती है, उस समय अँग्रेज़ी बोलने वाले मानसिक रोगी पत्रकार ख़ुशी से पगलाने लगते हैं।”

उनकी बातों में दम था। हमारा राजनैतिक ज्ञान और समझ बहुत कम है। इसलिए हम औरों को सुनकर समझना पसंद करते हैं। लोग बता रहे थे कि सत्तर के दशक के बाद अब जाकर युवा-बहार वापस आई है, क्योंकि सत्तर के युवा नायकों के बच्चे अब बड़े होकर युवा हुए, वरना बिहार में चालीस साल से अनुभवी नेतृत्व की ज़रूरत थी। अब युवा जोश की ज़रूरत आ गई है। पहले सड़क नहीं थी, बिजली नहीं थी, अब दोनों आ गए हैं पर उद्योग नहीं हैं, नौकरी नहीं है।

बस आई और संजय जी की बहादुरी और जुगाड़ के सौजन्य से ‘पहले आओ पहले पाओ’ के सिद्धांत पर हम किसी तरह बस में बैठ गए। साथ में कुछ भाग्यहीन बीच में सामान रख कर उसी पर बैठ कर सफ़र करने लगे।

संजय जी ने बड़े मिलनसार आदमी निकले। उन्होंने आगे बैठे यात्री से पूछा, “सुनने में आ रहा है कि उत्तर प्रदेश से बाहर निकल कर पहली बार अमेरिका को कमलापसंद राष्ट्रपति मिलने वाला है।” आगे बैठे सज्जन ने कहा, “अभी तक फ़ैसला आया नहीं है। कमला के नाम में ही हारिस है, कैसे जीतेगी? अमरीका में चुनाव का नतीजा आने में इतना समय लगता है, उस हिसाब से अपना बिहार ही बढ़िया है।”

बग़ल में बैठे बूढ़े सज्जन ने कहा, “हम जिस चीज़ के शिकार हैं, उसको कोई नहीं देखता। बाहर बैठे लोग ये देखते और समझते हैं कि केवल जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर वोट जा रहा है। कुर्सी पर बैठे लोग वही बिगुल बजाएँगे, वही समझेंगे जो समझना चाहते हैं।”

मैं उनकी बात ध्यान से सुनने लगा। वह कहते रहे, “कुछ विदेश से पढ़कर आए युवा नई पार्टी बनाते हैं, सोचते हैं कि बिहार को यूरोप बना देंगे। विकास कर देंगे। कोई यह नहीं समझता कि हमारी सभ्यता बहुत विकसित है, लेकिन अव्यवस्थित है। इसे यूरोप और अमेरिका न बनाइए।”

संजय जी ने कहा, “सही कह रहे हैं आप। मेरे मोहल्ले में आकर देखिए आप। माधोपुर में शत-प्रतिशत साक्षरता है। हमारा मोहल्ला केरल से कम नहीं है।”

बस हाईवे पर चल रही थी। संजय जी ने कहा, “इस सरकार को लोग सड़क और बिजली के लिए याद करेंगे।” आगे बैठे एक युवाशक्ति ने कहा, “बिजली-पानी क्या मुद्दा है? असल मुद्दा तो सामाजिक न्याय का होता है।”

वृद्ध सज्जन ने कहा, “बिहार की धरती ने चाणक्य पैदा किया था। उन्होंने चंद्रगुप्त से कहा था की हमें नंद को हटाना होगा, क्योंकि वह राजा का कर्त्तव्य नहीं निभा पाया है। राजा का पहला कर्त्तव्य है, ‘मत्स्यन्याय’ को रोकना। बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है, अगर मानव-समाज में हर बाहुबली कमज़ोर को सताने लगे, वही उसका नुमाइंदा बने, वही समाज के पतन का कारण है। वहीं से अराजकता शुरू होती है। आज सारे निजी स्कूल बाहुबली चलाते हैं, जानते हो किस तरह? अमेरिका और यूरोप की तरह। मैं कहता हूँ यह क्या ज़रूरी है कि स्कूल में सभी बच्चों के महँगे कपड़े और जूते हों? ज़रूरी यह है कि हर जगह स्कूल का भवन हो, वहाँ शिक्षक हो और विद्यार्थी हों, जो पढ़े-लिखें। अभी जो शिक्षक है वही चुनाव भी देखेगा, जनगणना भी करेगा और बाढ़ में राहत-सामग्री भी बाँटेगा। वही समाज आगे बढ़ेगा जहाँ पढ़े-लिखे और सही मायने में शिक्षित लोग होंगे। इसके लिए बहुत संसाधन नहीं, इच्छाशक्ति चाहिए। लेकिन यह समस्या और उसको हल करने की इच्छाशक्ति किसी में दिखती नहीं।”

युवाशक्ति वाले नीली क़मीज़ पहने लड़के ने भावुक होकर कहा, “आज कोई भारतमाता की दुर्दशा नहीं देख रहा। ये दिनकर की भूमि, ये रेणु का राज्य, ये बुद्ध-महावीर की धरती कंगाल हो गई है। कोई इसे देख नहीं रहा है।”

उसके साथी ने कहा, “यह सारा दारोमदार हमारे कंधे पर है। हम भारत माता को ऐसे निराश नहीं होने देंगे।”

संजय जी ने पूछा, “आप क्या करेंगे?”

“नारे लगा कर अपनी आवाज़ दिल्ली पहुँचा देंगे। बोलो भाई लोग, भारत माता की जै ।”
“जै।”
“अरे कुछ खाए नहीं हो क्या? ज़ोर से आवाज़ लगाओ मेरे साथ। भारत माता की जै।” चार-पाँच लोग चीख़ने लगे, “भारत माता की जै।” जब सबकी जय-जयकार ख़त्म हुई, तब संजय जी ने मुझसे पूछा, “क्या समझे?”
“हम कुछ नहीं समझे।”
“ये लोग राष्ट्रवादी हैं।” संजय ने मुस्कुराकर कहा और फिर पूछा, “आप ऐसे गुमसुम क्यों हो गए?”

ग़ालिब हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क़ से
बैठे हैं हम तहय्या-ए -तूफ़ां किए हुए

प्रचण्ड प्रवीर हिंदी कथाकार और अनुवादक हैं। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखें : रहिए अब ऐसी जगह चलकर

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