कविताएँ :: महिमा कुशवाहा
दुनिया नहीं बोलती—यहाँ—सिर्फ़ दुनिया की पुरानी आदतें बोलती हैं
कविताएँ :: संदीप रावत
मेरी समझ से परे है आज की प्रेम-कविता आज से पहले की भी और सबसे पहली प्रेम-कविता भी
कविताएँ :: अभिजीत
मेरे पास विदा का कोई समुचित वाक्य नहीं
कविताएँ :: पंकज प्रखर
इस संसार में सिर्फ़ देखे गए रंग ही फीके पड़ते हैं
कविताएँ :: सोमेश शुक्ल
पेड़ और पत्तों की सहमति से आता है पतझड़, पेड़ और पत्तों की सहमति से ही विदा लेता है
कविताएँ :: जितेंद्र सिंह