लगभग एक माह के मौन के बाद ‘सदानीरा’ फिर दृश्य में दख़ल के लिए उपस्थित है। इस हाहाकार में ‘सदानीरा’ के दख़ल की शक्ल रचनात्मक ही रही है, रचनात्मक ही हो सकती है। लेकिन कभी-कभी रचनात्मकता को बरतने का नियमित, नियमबद्ध और तयशुदा ढर्रा भी ऊब और विकार से भर देता है; इसलिए हमने सोचा कि कुछ रोज़ चुप रहकर देखें, इस नियमितता से बाहर…
नाख़ूनों में भर लें खुरचकर धरती सारी
कविताएँ :: अदिति शर्मा
एक कहानी मर रही है और यह शहर सो रहा है
गद्य :: पीयूष रंजन परमार
अंतिम प्यार होता है अनूठा पतझड़ के फूल-सा
गालाक्तियोन ताबीद्ज़े की कविताएँ :: अँग्रेज़ी से अनुवाद : रीनू तलवाड़ और प्रचण्ड प्रवीर
रात जब मेरी आँखों पर उतारी गई
सारा शगुफ़्ता की कविताएँ :: उर्दू से अनुवाद : मुमताज़ इक़बाल
नया अंक : वर्ष 8, अंक 25
क्रम :: विशेषांक-2021 Pan-India VoW!