सारा शगुफ़्ता की कविताएँ ::
उर्दू से अनुवाद : मुमताज़ इक़बाल

सारा शगुफ़्ता

प्रतीक्षा की कुटिया

हृदय की मस्जिद से हर दिन जनाज़े उठते हैं
शाखा पर फूलों का आजीवन कारावास कितना है
मैंने आँखों में प्रतीक्षा को फाँसी दी है
समय और मेरे बीच प्रतीक्षा की आत्मा रहती है
आँखों से छुपकर रहना—हँसते रहना
रोकर कितने चुप हुए!
अकेली कुटिया है जो तेरे हृदय में मेरे हृदय में रहती है
और ऐ मूर्तिकार!
हम क्यों पत्थर में रहें, कोई क्यों पत्थर में रहे
चल मिट्टी को अब आँगन कहें
सूरज को अपना अन्न कहें
पानी पर अपना पुण्य लिखें
आँखों की गंदी बस्ती से बेहतर है इक गर्त भी
प्रतीक्षा से अधिक आँखें भौंकती रहती हैं
पत्थर को क्यों रूप दें
ये आँसू मेरे अपने हैं
बूढ़े पेड़ और बूढ़े मौसम पर बूढ़ी कोयल कूकी
प्रतीक्षा की कुटिया में बच्चे सच्चे होते हैं
ख़ाली हाथों की अपेक्षा
ख़ाली आँखों से डरना है
और सीने में इक तीर पड़ा है जिसका नाम है हृदय…
हाँ तीर चला, मगर किसी पक्षी की आँख की रौशनी तेरे तीर से न रूठे
आ मैं तेरे आँचल में मिट्टी जितना धैर्य बाँधूँ
कि प्रतीक्षा की धज्जियों से एक एक चादर सी डालूँ…

ख़ाली आँखों का मकान

ख़ाली आँखों का मकान महँगा है
मुझे मिट्टी की लकीर बन जाने दो
ईश्वर बहुत सारे मानवों की रचना करना भूल गया है
मेरी सुनसान आँखों में आहट रहने दो
आग का स्वाद दिया है
और नींद का स्वाद मानव
मुझे पत्थरों जितना कस दो
कि मेरा गूंगापन प्रसिद्ध न हो
मैं ईश्वर की जीभ मुँह में रखे
कभी फूल बन जाती हूँ और कभी काँटा
ज़ंजीरों की रिहाई दो
कि मानव उनसे अधिक बंधनों में जकड़ा हुआ है
मुझे अकेली मरना है
अतः ये आँखें
यह हृदय
किसी ख़ाली मानव को देना।

मुजरा

हृदय का मुजरा सुनो और आवाज़ों के सारे सिक्के पैंजनी की आत्मा से दूर फेंक दो
रास्तों को बंदी बना लो और सूलियों को सोचने दो
और हृदय का मुजरा सुनो
फूलों को अपने पूर्ण रक्त से हँस लेने दो
और फूलों का मुजरा सुनो
सूखी रोटी की आवाज़ कहीं से आ रही है
मुझे थोड़े से भूखे रंग दो
और ज़ंजीर के मुजरे की कड़ियाँ खोल दो।

हठ की टाकियाँ

रात जब मेरी आँखों पर उतारी गई
मैं ईश्वर देख रही थी
और आँखें चुरा रही थी
हठ की टाकियाँ अपने कपड़ों से चुन रही थी
तौबा पढ़ रही थी
और तलवार का घाव धो रही थी
मैं पुनः बंदी बना ली गई थी
और अपनी अज्ञानता से क्षुब्ध थी
और उड़ानों का मुझे दुःख था
ज़मीन मुझे रट चुकी थी
और आस्मान अपना वक्तव्य सुना चुका था
चाँद मेरे हृदय में ही टूटा था
और ईश्वर हर दिन मेरे हृदय में आकर स्पंदन करता है
सूरज हर दिन आस्मान पर बिखर जाता है।

अपमान के गिरे दाम तले

अपमान के गिरे दामों से उसने अपने आपको चुना
और फिर काग़ज़ की तरह देखने लगी…
उसने अपने हृदय के रक्त में रक्ताभ फूल तैरने के लिए छोड़ दिया
वह फूल के दुःख में महकने लगी
और अँधेरे अपनी आँखों में इकट्ठा करती रही
और वह ग़रीब कुछ इस प्रकार थी कि अपमान कहीं बिकता न था
मृत आँखों वाले उसकी आँखों की रौशनी से गर्भधारण कैसे करते
कि उसका अपमान अभी कुँवारा था
उसकी चूड़ियाँ जब भी हँसती थीं—वह टूट जाती थी
वह जब भी डाली की तरह झुकती उसका एक फूल टूट जाता
वह अपने ज़हर में बुझी एक बाँसुरी है
वह पग-पग क़ब्र-प्रति-क़ब्र उतरती है
और हर दिन क़ब्र की गवाही देती है
काग़ज़ चुनती है
वह अपनी देह के तने से अपने गिरे पत्ते उठाती है
और हर दिन अपनी बंद मुट्ठी में सिसककर रह जाती है
वह सोचती है!
काश मानव होने से अच्छा तो वह गेहूँ का एक पेड़ होती
फिर कोई पक्षी चहचहाता तो वह अपने मौसम देखती
पर वह मिट्टी है—केवल मिट्टी
वह अपनी देह से हर दिन खिलौने बनाती है
और खिलौने से अधिक टूट जाती है
वह कुँवारी है मगर अपमान का लगान सहती है
वह हमारी है!
पर हम भी उसे अपनी दीवारों में चुनकर रखते हैं
कि हमारे घर ईंटों से भी छोटे हैं।

जेल

मैं अधिकतर नंगी रह जाती हूँ
और लोग अपनी-अपनी सज़ाओं को प्राप्त हो जाते हैं
पर मैं उन्हें मुक्त नहीं करूँगी
क्योंकि मैं स्वयं देह की जेल काट रही हूँ।

भूख है भिक्षापात्र

देखो मैं अटी धरा पर छाँव नाम को न थी
और मुझे अपनी परछाई से सख़्त नफ़रत थी
ईश्वर ने मेरी प्रार्थना में दुःखों को रखा
तो शैतान ने मेरा नाम प्रकोप रखा
वे लोग सम्मान-योग्य हुए जो पाप से भी छोटे थे
मैं मिट्टी पर थूक फेंकूँ तो मेरी जीभ जल जाए
लेकिन मेरे ईश्वर की कृपा से ऐसा ही हुआ
कृपा भाग्य के भिक्षापात्र में मिट्टी थूकती
और मैं सिक्के गिनते-गिनते भिक्षापात्र से भी गिर गई
भूख ने बहुत नाटक खेले
और मैं मानवीय कटघरे में उतर आई
फ़रिश्तों ने अपनी भूख चबाई
और मानव की ताक पर दृष्टि बनाए रखी
मैं जो पापरहित आँखों की स्वामिनी थी
और शैतान की भूख देख रही थी
कि आग की भूख तड़-तड़ लकड़ियाँ चबाने लगी
मेरे घर में मजबूरी के ताले लग गए
फिर इंसान मेरे घर कभी नहीं आया
परछाई के साथ मैं दीपक रखती
और अपनी चिता के लिए इस प्रकार दीपक ढूँढ़ती
जैसे मन एकांत के विलाप सुन ले
मेरी आग मुझे ताप रही है
मेरी हाँ सपेरों में बस रही है
मैं पग-पग पर घट रही हूँ।

मैं कौन थी

मैं कौन थी
गंदी आँखों और घृणित हँसी वाली
झूठी नींद वाली
मुस्कुराहट को टाँके लगाने वाली
नाभि के नीचे रहने वाली
और नाभि के नीचे बच्चे का चेहरा देखने वाली
मैं कौन थी
तुम कौन थे
संभवतः कोई तीसरा हमें जान रहा हो
नहीं-नहीं मैं कौन नहीं थी
नहीं-नहीं तुम कौन नहीं थे
फिर वे दोनों कौन थे
वे कोई अपने शरीरों से भागे हुए
मिट्टी के खिलौने थे
जिन्हें धरती बनना प्रिय नहीं था
वे चोर और चोरनी की खोज में थे
कि खिलौनों की तरह टूटने लगे
और शब्दों का जोड़-तोड़ न हो सका
कि वे दोनों इतने बच्चे थे
कि शब्द उन्हें सीख नहीं सकते थे।


सारा शगुफ़्ता (1954-1984) पाकिस्तान की अत्यंत मशहूर और उल्लेखनीय कवयित्री हैं। उनकी यहाँ प्रस्तुत कविताएँ उर्दू से हिंदी अनुवाद के लिए उनके कविता-संग्रह ‘नींद का रंग’ से चुनी गई हैं। मुमताज़ इक़बाल उर्दू-हिंदी की नई पीढ़ी से संबद्ध लेखक-अनुवादक और शोधार्थी हैं। उनसे naushadahmadamu@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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