आलेख ::
अमिताव कुमार
अनुवाद : जे सुशील

Illustration by The New York Times

पुराने और नए निशानों के आस-पास

क़रीब दस साल पहले, मैंने कॉलेज सीनियर्स को साल भर लंबा रचनात्मक लेखन (क्रिएटिव राइटिंग) का कोर्स पढ़ाना शुरू किया था। कोर्स के अंत में, हर छात्र से यह उम्मीद थी कि वह कहानियों की या कविताओं की एक किताब लिख पाएगा। मैंने उनके लिए एक मंत्र बनाया : “हर दिन लिखो, और हर दिन टहलने जाओ।” इस निर्देश में यह स्पष्ट था कि एक सौ पचास शब्द लिखने हैं और दस मिनट बिल्कुल ध्यान से टहलना या पैदल चलना है।

यह एक अत्यंत साधारण लक्ष्य था, क्योंकि मैं चाहता था कि मैं ख़ुद भी इसे कर पाऊँ। मेरा एक छोटा बच्चा था और साथ ही कई कक्षाएँ थीं—पढ़ाने के लिए। उन्हीं दिनों मैंने एनी डिलार्ड की प्रसिद्ध पंक्तियाँ पढ़ी थीं : ‘‘हम कैसे अपने दिन बिताते हैं, निश्चित रूप से वह यह तय करता है कि हम अपना जीवन कैसे बिताते हैं।” इन पंक्तियों ने मुझे एहसास कराया कि मैं भी अक्सर अपने दिन इस चाहत में बिताता था कि मैं लिखूँ, लेकिन लिखता नहीं था। बार-बार लगातार, मैं अपनी डायरी में नोट करता जाता था, “मैंने आज नहीं लिखा।” मुझे लगने लगा था कि मैं इसी तरह अपना जीवन बिता दूँगा—निराशा से भरा हुआ।

इसी कारण मैंने ख़ुद भी वह काम करना तय किया जो कि मैंने अपने छात्रों के लिए तय किया था। मैंने लिखने के लिए एक नोटबुक ख़रीदी, जिसमें काले-सफ़ेद चौकोर डिजाइन वाले कवर होते हैं। हर दिन अपना दिन का निश्चित कोटा पूरा करने के बाद, मैं नोटबुक के अंतिम पन्ने पर उस दिन की तारीख़ लिख देता और उसके सामने एक चेक का निशान या टिक मार्क लगा देता। कुछ दिन के बाद मैं अपना नोटबुक ले जाकर छात्रों को वे चेक के निशान दिखाया करता।

मैं अपने शहर पटना के बारे में लिख रहा था, जहाँ चूहों ने मेरी माँ के नक़ली दाँत चुरा लिए थे और पुलिस का दावा था कि इन चूहों ने पुलिस द्वारा ज़ब्त की गई सारी शराब पी ली है। मुझे नहीं लगता कि मैंने एक भी दिन लिखना बंद किया होगा और जब साल ख़त्म हुआ तो मेरे पास एक छोटी-सी किताब तैयार थी। यह तरीक़ा काम कर गया था; मैं अब इसे छोड़ने वाला नहीं था। कक्षाओं के बीच के समय में, ट्रेन में, या फिर बच्चे के डॉक्टर के कमरे के बाहर इंतज़ार करते हुए, मैं अपने हर दिन के कोटे के शब्द लिख देता था और फिर उन्हें गिन लेता कि मैंने हर दिन का लक्ष्य पूरा कर लिया है। एक बार मैं जब यह कर लेता और नोटबुक के पीछे चेक का निशान लगा लेता तो मुझे ऐसा लगने लगता कि मैं अपना जीवन लिखते हुए बिताऊँगा।

मेरे नोटबुक्स के पीछे के पन्नों पर इन चेक निशानों वाले कॉलम में कई घंटों का काम देखा जा सकता है। साथ ही ऐसे शब्द भी : फलाँ पत्रिका द्वारा ख़ारिज, फलाँ द्वारा ख़ारिज, फलाँ ने किया ख़ारिज, फलाँ ने छापा… और आँकड़े (बीस हज़ार, तीस हज़ार, पचास हज़ार, नब्बे हज़ार—ये शब्दों की संख्या है) और तारीख़ (किताब का अनुबंध साइन किया गया : 7 मार्च 2017; मेरे पब्लिशर की मृत्यु : 30 दिसबंर, 2019)

2010 के नवंबर के आख़िरी दिनों में, सिर्फ़ एक शब्द है: “फ़र्बर।” जो बच्चों को सुलाने की ट्रेनिंग का एक तरीक़ा है। मैंने वह पढ़ा और मेरे दिमाग़ में तुरंत आया—उनींदी आंखों और थकान वाला वह आदमी जो एक बच्चे को सुलाने के प्रयास में लगा हुआ है। अगले साल दो अप्रैल के दिन, तीन कॉलम में चेक के निशान बने हुए हैं; जिसके सामने ये तीन शब्द लिखे हुए हैं : “वर्ल्ड कप जीत।” ( भारत ने श्रीलंका को हराकर विश्वकप जीता था क्रिकेट का।) लेकिन जीवन के तथ्य इस नोटबुक से अमूमन ग़ायब हैं। यहाँ तक कि अपने पिछले साल का लेखा-जोखा देखते हुए, मैं कहीं भी ऐसे चिह्न तक नहीं खोज पाया जिससे यह पता चले कि हम एक महामारी से गुज़रे हैं। सिर्फ़ शब्दों की गणना, परियोजनाओं के शीर्षक, एजेंट को भेजे अपने काम के बारे में नोट्स और वे चेक के निशान—अपने मंत्र के प्रति ईमानदार रहने का मेरे संघर्ष का इतिहास; ख़ुद को पागलपन से बचाए रखने और कुछ लिखते रहने की मेरी इच्छा का दस्तावेज़।

मैं यह स्वीकार करता हूँ कि यह एक बहुत ही साधारण और वास्तव में बहुत पुराना तरीक़ा है रिकार्ड रखने का। इसकी रीढ़ में चेक के निशानों का एक लंबा-सा कॉलम है। मैं स्मार्टफ़ोन पर एप्स की बजाय, जो सर्विलांस पूँजीवाद के इस दौर में डायरी का काम करते हैं, इस तकनीक को अधिक बेहतर मानता हूँ। ये एप्स हर दिन गिन सकते हैं कि आप कितने क़दम चले, हमारी यादों को तस्वीरों के रूप में जमा करते हैं, यहाँ तक कि इसका रिकार्ड भी रखते हैं कि हमने कहाँ अपनी गाड़ियाँ पार्क की हैं। ये इतनी जानकारियाँ जमा कर सकते हैं कि किसी भी व्यक्ति के कठिन मेहनत से किए गए एक काम का कोई तुक नहीं रह जाता है। जेफ़ बेज़ोस और ज़ुकेरबर्ग की बनाई इस दुनिया में ये चेक का निशान गांधी है।

ये मेरी नज़रों से बचा नहीं है कि बेज़ोस और ज़ुकेरबर्ग ने मेरे प्यारे चेक के निशान या टिक मार्क को अपनाने की कोशिश की है। सोशल मीडिया पर, चेक के निशान का इस्तेमाल शुरू-शुरू में निष्पक्ष वेरिफ़िकेशन के लिए किया गया, ताकि यूजर्स को पता चले कि जाने-माने लोगों के अकाउंट सही हैं। जल्दी ही लोगों ने इसे स्टेटस सिंबल मान लिया—एक क़िस्म का सबूत कि आप इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि लोग इस बारे में सोचें कि आप वाक़ई आप हैं या नहीं। किसी समय में एक साधारण उपलब्धि का द्योतक, जो मेरे हर दिन के संघर्ष और चुपचाप अर्जित की गई सफलता को चिह्नित कर रहा था, वह चेक का निशान भ्रष्ट कर दिया गया। अब दो क़िस्म के लोग हैं : एक वे जिनके नाम के आगे ट्विटर और इंस्टाग्राम पर चेक का निशान है और बाक़ी हम जैसे लोग—बिना चेक के निशान के लोग। मैं उन पिक्सल्स से बने नीले निशान का उत्सव नहीं मनाऊँगा जो यह बनावटी दिखावा करता है कि वह मानव के जीवन को सबसे महत्त्वपूर्ण मानता है। मैं चेक के निशान को उसके अत्यंत बेसिक स्वरूप में ही रखना चाहूँगा, जिसे कोई इंसान बनाता है अपने हाथों से स्याही या पेंसिल से।

काग़ज़ पर कुछ बनाते हुए, एक बच्चा V बनाता है जिसके बाद एक और V, फिर एक और V, समतल काग़ज़ पर हवा में उठते हाथ की तरह। “ये क्या है जो तुमने बनाया है?” माँ या बाप में से कोई एक पूछता है। विश्वास से भरा जवाब मिलता है : “पक्षी उड़ रहे हैं!” मुझे याद है जब मैं ऐसा बच्चा था। मुझे याद है कि प्राइमरी स्कूल में जब मैं होमवर्क करके देता था तो मेरे टीचर जवाबों के आगे टिक मार्क लगा दिया करते थे, जिसका मतलब होता था कि मेरे जवाब सही हैं। मैं बहुत अच्छा छात्र नहीं था; ये चेक के निशान मेरे लिए ख़ुश होने और उत्सव के मौक़े हुआ करते थे।

लेकिन अब उम्र होने के बाद, चेक के इन निशानों का दूसरा उद्देश्य है : ये दिखने वाले चिह्न इस बात की पुष्टि करते हैं कि मैं क्या हूँ, वह इससे तय होगा कि मैं क्या करता हूँ। मैं लेखक हूँ, इसलिए मैं हर दिन लिखता हूँ। हो सकता है आप भी लेखक हों। हो सकता है आप नहीं हों लेखक। बात फिर भी वही है। वह चेक का निशान हर उस काम से अधिक महत्त्वपूर्ण है जो आप दिन भर में करते हैं… प्रयास महत्त्वपूर्ण है, उद्देश्य की पूर्ति नहीं। पहला दिखाता है आपका असल जीना, दूसरा बस एक जीवन।


अमिताव कुमार (जन्म : 1963) सुपरिचित भारतीय अँग्रेज़ी लेखक, पत्रकार और अध्यापक हैं। वह पटना शहर पर लिखी अपनी किताब ‘ए मैटर ऑफ़ रैट्स’ के लिए काफ़ी मशहूर हैं। वह अमेरिका में रहते हैं। उनका यहाँ प्रस्तुत आलेख अपने मूल स्वरूप में हाल ही में The New York Times में प्रकाशित हुआ है। जे सुशील सुपरिचित हिंदी लेखक-कलाकार, पत्रकार और अनुवादक हैं। उनसे और अधिक परिचय के लिए यहाँ देखें : हाँ से कहीं अधिक ताक़तवर है न कहना

अमिताव कुमार की फ़ीचर्ड इमेज़ : Man’s World India

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