लंबी कविता ::
कुशाग्र अद्वैत

एक घटना सरीखी कथा को भी अगर अच्छी काव्य-काया मिल जाए तो विलक्षणता दौड़ी चली आती है। कुशाग्र अद्वैत की यहाँ प्रस्तुत लंबी कविता या कहें काव्य-कथा में वियोग और बदहवासी से परिपूर्ण कुछ ऐसी ध्वनियाँ उभरती हैं, जो अंत तक आते-आते विह्वल कर देती हैं। इस कविता की शुरुआत में ही कालिदास कृत ‘मेघदूत’ के ‘पूर्वमेघ’ की एक पंक्ति उद्धृत है। ‘मेघदूत’ में यह वही जगह है, जहाँ यक्ष अपनी पीड़ा और कातरता में यक्षिणी के साथ इतना एकमेक है कि अपनी स्थिति से ही उसकी भी स्थिति को समझ जाता है।

कुशाग्र कृत लंबी कविता में कई सारे बड़े उप-प्रत्यय भी उपस्थित हैं, जैसे कि किसी घटना के विषय में लोगों का सच आत्मनिष्ठ होता है और व्याख्याओं के द्वारा—भोक्ता या नैरेटर किसी से भी उसका सच नहीं छीनना चाहता। यही स्थिति जीवन में घटित बातों और किसी बड़े text के साथ भी होती है।

यह कविता बहुत से सुंदर वाक्यों से समायुज्य है। उड़द की दाल के बाद के हिस्से में अलक्षित दृश्य हैं… ये एक रवानी में चले आए हैं।

कुशाग्र की इस रचना में रचना-प्रक्रिया भी एक नैरेटर बन रही है। यहाँ क़त्ल हुई नायिका की तरफ़ से नैरेटर अंत में कुछेक वाक्य/परिच्छेद रखता है और वही इस कविता में गुरु हो जाता है।

हालाँकि इस लंबी कविता की संरचना पर सोचते हुए मुझे यों भी लगता है कि कवि अगर इस लंबी कविता को कुछ संधि-स्थलों से खंडवार बाँट देता तो बेहतर होता। इससे यहाँ थोड़ी पाठकीय सुविधा उत्पन्न होती, बावजूद इसके पाठक अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार कुछ न कुछ प्रभाव ग्रहण करता ही है।

इधर दो कवियों—प्रज्वल चतुर्वेदी और अंचित—की लंबी कविताओं से गुज़रते हुए, उनकी प्रस्तावना लिखने के क्रम में बार-बार लंबी कविता के शिल्प पर भी कुछ विचार-मंथन हुआ। इस मसले पर किसी स्पष्ट निष्कर्ष पर न पहुँच पाने पर भी, पठनीयता का सवाल बार-बार सामने आया।

इस सिलसिले में ही अब जब कुशाग्र अद्वैत की यह लंबी कविता सार्वजनिक हो रही है, मुझे उम्मीद है कि पाठक इस तीसरी लंबी कविता से भी धैर्यपूर्वक गुज़रेंगे और इस बहुविध text में जो भाषाई लचक है—उससे रससिक्त होंगे।

अखिलेश सिंह

कुशाग्र अद्वैत

उड़द दाल

संकल्पैस्तैर्विशति विधिया वैरिणा रुद्धमार्गः

उनके लिए सारा संसार
एक विराट कारावास था
और इस जेल की सलाख़ें
उसका ही विस्तार

सबकी तरह उनके पास भी
बीते सातेक वर्षों से
यहाँ होने की एक कहानी थी

सबके पास जिसके अपने संस्करण थे
और वे क़तई उत्तर-आधुनिक थे
इन अर्थों में कि जानते रहने के बावजूद
उनके बारे में क्या कुछ फैल रहा है
या कि फैलाया जा रहा है

मनगढ़ंत अफ़वाहों की कितनी गर्द
जमा होती गई है
उनके देखते-देखते
उनकी चुप्पी से लगकर
उनकी चुप्पी पर लद कर

उन्होंने किसी से भी
उसका सत्य नहीं छीना
कोई स्पष्टीकरण कभी नहीं दिया

बहुत-सी कथाएँ चलती हैं
कुछ से अभी मैं भी अनजान हूँ
और तथ्यों के सब संस्करण देकर भी
सत्य को नहीं छुआ जा सकता
इसलिए आसानी इसमें है
कि कोई एक संस्करण दूँ
और आप अंदाज़ लगाने को स्वतंत्र रहें

एक मरी हुई शाम
उन्होंने एक क़त्ल किया था
शायद एक नहीं दो
शायद दो नहीं एक
शायद में कही कथा है यह
शायद नहीं कही कथा है यह
तो शायद उन्होंने एक नहीं दो क़त्ल किए थे
और इस तरह कि वे करना न चाहते रहे हों
किसी ने सिर पर बंदूक़ रख करवा लिया हो

सारी गुत्थियाँ यहीं से शुरू होती हैं
सारी पेचीदगियाँ
अब भले ही उनके हाथ काँपते हों
अब भले चाक़ू के ख़याल से भी
सकपका जाते हों
एक वक़्त था जब
किसी की आँत के आर-पार
सात बार चाक़ू चलाई थी

कोई कहता है मक़्तूल
ख़ुद एक हत्यारा था
कोई उसे वहशी बताता है
कोई ख़ानदानी दुश्मनी का नाम देता है
जो बात मुझे पचाए नहीं पचती
आख़िर दर-दर की ठोकर खाते अनाथ का
कौन सा घर-ख़ानदान
कौन रिश्तेदार इतना सगा कि
उसके लिए अपने इतने वसंत
इस क़ैद में खोटी कर दिए जाएँ

ख़ैर, ख़ैर, ख़ैर…
वे इस क़ैद को जीते हैं
और बेतरह जीते हैं
रसोई देखते हैं
और देखते हैं
दूसरों की भूख

कभी अकुलाए
बहुत प्यासे
जगते हैं
और पनियाई आँख लिए
बग़ल टटोलते हैं

तब उनके भीतर
एक फ़िल्म चलने लगती है
बीत चुके जीवन की फ़िल्म
रीत चुके जीवन की फ़िल्म

बहुत अनाथ
बहुत वंचित जीवन :
माँ नहीं,
माँ की छाया नहीं,
माँ के पयोधर नहीं
तृप्ति देती एक छींट तक नहीं

भटकन
बहुत भटकन
एकाकीपन

मन नगाड़े पर
सप्तपदी के मंत्र बजते हैं
एक स्त्री गुलाबी साड़ी पहने
कभी पीछे
कभी आगे डोलती है

दृश्य में दृश्य घुलते हैं
नींद कब की टूट चुकी
लेकिन सब कुछ
स्वप्नवत्

युगों बाद वह रात आती है
जब एक निरापद स्त्री
अपनी सब चोटें दिखाती है :
ये… वहाँ चढ़ते लगी थी
वो… साइकिल से गिरकर
और उँगली पर…
घास काटते बखत
हँसिया से

नहीं
उधर नहीं
मन की चोटों पर फिर कभी
अभी इधर देखो :
उमा की हथेली पर तिल ही तिल थे
उसकी माँ बताते न थकती
हथेली पर तिल शुभ का प्रतीक है
मैं भी शुभ ही शुभ चाहती थी
इसलिए शाला में पीछे बैठ
रोज़ाना इधर… क़लम चुभाती थी
तिल बनाती थी

जैसे वह रात घिसती जाती
वंचना की सारी याद मिटती जाती
पहली बार कोई देह इतनी अपनी हुई
इतनी अपनी कि उसके कुचों को चूसते
और बेध्यानी में काट लेते
बरसो पीछे खो चुका शैशव जाग उठता
वह चिहुँकती, स्तनों को लजाकर छिपाती
फिर खिलखिलाती और खेलने देती

वह यकायक
उसे पाने को हाथ बढ़ाते
कुछ दरकता
कुछ टूट जाता
सलाख़ें चिल्लाकर कहतीं
उसे अब पाया नहीं जा सकता
खींचकर यहाँ लाया नहीं जा सकता

लेकिन
क़िसिम-क़िसिम के जीवन-प्रसंग हैं
किसी को पाने के और भी ढंग है
छूने और छूते जाने के और भी ढंग है

इस ही क्षण
एक महान् संकल्प कुलबुलाने लग जाता
याद आती उड़द की दाल
जिससे कभी बेतरह तिरपित हुए थे
याद आती वह रुग्ण ऋतु
जब वह दिन-रात पट्टियाँ रखती
लेकिन मुआ बुख़ार जाने का नाम न लेता
हर चीज़ खाने की मनाही थी
और घर पर राशन का र भी नहीं

वह पड़ोस से माँग लाई
थोड़ी-सी दाल
और उसे इस बिध से पकाती
कि चूल्हे की गंध
लीपे हुए घर की गंध
उसकी देह-गंध
सब पर सवा पड़ रही थी
हींग की गंध

जिसने दी होगी दाल
उसने ही कहा होगा
खड़ी उड़द सबको नहीं पचती
जैसे सबको नहीं पचता प्रेम
जैसे जो नहीं करते श्रम
जैसे जो नहीं उठाते जोखिम
उन्हें कुछ नहीं पचता

यहाँ कथा-सूत्र पकड़कर रखना
मुश्किल हुआ जाता है
सब कुछ इतना गड्डमड्ड है
और इतनी तेज़ी से घट रहा
कि यहाँ से मेरा निकल जाना ही श्रेयस्कर

आगे की कथा मुझसे नहीं कही जा रही
कथानायक अब रोने लग गया है
भर्राए गले से विलंबित में कुछ कहने लग गया है
मुझे दें इजाज़त
उसे सुना जाए :

जब भट्टी मालिक के लोग
आए मेरा घर जलाने
संध्या पूजा का दीपक
बुझा नहीं था पूरमपूर
आकाश को भेदती थी
मुई चिरैया की आवाज़
सो चुके थे पेड़ों में रहने वाले देवता

वह चीख़ी होगी
बुलाया होगा विधाता को
लेकिन आस्था ने उसकी रक्षा नहीं की

उसने बुलाया होगा मुझे
लेकिन प्रेम जिसे उसने सर्वस्व दे दिया
ने उसकी रक्षा नहीं की

उसकी स्वर लहरियाँ
थम गईं
उसके कंठ के गीत
उसके काम नहीं आए

मिथक धरे के धरे रह गए
कोई गिद्ध उनसे उड़कर नहीं आया
बस कुछ कुत्ते रहे भौंकते
जिन्हें उसने जियाया था
भूख से दो रोटी कम खाकर

कोई न फटका
उस जलते घर के आस-पास
जिसे उसने सजाया था
मन से
ख़ूब जतन से

दो लोगों का
श्रमसिंचित प्रतिसंसार—
जिसमें एक दाना न हो
लेकिन सुख था
दो कथरी थी
एक कम्बल था
लेकिन क्या तो नींद थी…
धू-धूकर जलता रहा
सारी रात

और वह खपरैल भर ही नहीं जला
तुलसी का बिरवा जल गया
आम के पत्तों का तोरण जल गया
उसके हाथ जल गए
उन हाथों की मेहँदी जल गई
दीवार पर हथेली की जो छाप थी…

उसकी पायल की खनक जल गई
उसके पाँव जल गए
और पाँव पर मैंने जो चुंबन रोपे थे…

उसकी आँखें जल गईं
उसके सपने जल गए
और उसकी कोख में जो शिशु था…

उसकी अपार श्रद्धा से आबद्ध मुझमें
आस्था के जो नए कल्ले फूटते थे
और कोमलता के जितने तंतु
मेरे भीतर उमगते थे
उन लोगों ने
सबको दिया बार

मैं पुनः हुआ अनाथ
जीवन का क्या रहा प्रयोजन
पुराने पुल की तरफ़ गया
नदी से कहने—मुझे लील ले
लेकिन जिनका आसान नहीं जीवन
उनका आसान नहीं मरण

शिव की तरह
जली प्रिया की दाह लिए
जगह-जगह फिरा
जिसने जहाँ दौड़ाया दौड़ा
उन्हें खोजने बंबई तलक गया
और वो नहीं मिले
बरस भर बाद दिखे
यूँ ही बाज़ार में निश्चिंत घूमते

चोरी की एक चाक़ू
सदा मेरे साथ रहती
उन्हें बस पकड़ पाया
धागे तिरकिट धिन ना
धिं धिं धागे तिरकिट
धिक् धिक् थ
धिक् धिक् थ
धिक् धिक् थ

एक महाशून्य में गया तैर
कुछ लोगों ने पकड़ा
बल भर पीटा
कुछ काँपते-से
दूर खड़े थे
पास आने से कतराते थे
जुगुप्सा से रहे देखते
कि हत्या उनके लिए
एकदम नई चीज़ थी

एक सिपाही
आया कहीं से
हथकड़ी पहनाने

तब से यहीं हूँ
याद करते
उसकी सिंदूर-रेखा,
अग्नि के फेरे,
ड्योढ़ी पर बनी अल्पना,
कटि पर पल्लू खोंसे
ताल से उसका
कलशी लेकर लौटना,
साथ बीनना महुआ,
और मेरा हील-हुज्जत कर
उसके लिए टिकुली-गजरा लाना

एक हूम की तरह
कसकता है
कि कैसे
पहुँच नहीं पाया उसे बचाने
बताओ, कुछ भी कर नहीं पाया
एक अंत्येष्टि तक नहीं

वह कितने चाव से
सबको खिलाती थी
रोका-बरजा
कहाँ कुछ मानती थी
दिन-भर बैठ सकती थी
उस भटियारख़ाने में

और उसके नाम से किसी ने
एक निवाला तक नहीं तोड़ा
मनई छोड़ो
कौवा-चिरई तक नहीं

लेता हूँ संकल्प
क़ैद में ही होगा आयोजन
उसके नाम से खाएँगे मेरे स्वजन
पर कौन हैं मेरे स्वजन?
मेरी ही तरह अभागे
कुछ क़ैदी
कुछ हत्यारे
ठेठ गँवार
भूमिहीन
बिपदा के मारे!

हाँ, ये ही हैं
इनके लिए ही बनाऊँगा
खड़ी उड़द की दाल
बिल्कुल जैसे वह बनाती थी :
बहुत धीमी आँच पर
हींग का छौंका देकर

तब बुख़ार से देह धधकती थी
अबकी आत्मा को व्यापा है ज्वर
और इससे ऐसे ही उबरूँगा
ऐसे ही पाऊँगा पार

थोड़ी लकड़ी लगेगी
थोड़ा-सा घी
कहीं लगाना होगा चूल्हा
कुछ रुपए लेगा सिपाही
तो लेता नहीं

वह द्वितीया का दिन था
जब उन हत्यारों ने
मेरा सब कुछ छीन लिया था
यहाँ रहते-रहते
दिक्-काल बिसरने लगता है
कोई लाओ पंचांग…

आख़िर वह सुबह आई
पारदर्शी-सी धूप खिली थी
और कड़ी चौकसी में
दाल पक रही थी
बहुत चाहा
कि चखकर देखूँ
वैसी बन रही है या नहीं
लेकिन ऐसे तो
भंग हो जाता अनुष्ठान!

सुध हुआ अचानक
वह बहुत बार
सीधे कड़ाही से चख लेती थी
और कुछ भंग नहीं होता था…

उसकी लीक पर चलते
मैं भी चखता हूँ
और होता हूँ अस्त
अरे, वह स्वाद नहीं
नहीं, वह स्वाद नहीं!

क्या उसकी वह बात झूठ थी
भाव से आता है स्वाद
या सच ही मेरे पास
वह भाव नहीं

इन सोचों में लगता हूँ
बूड़ने-बटुरने
कि कोई वायवीय उपस्थिति
जकड़ कर कहती है—
इसमें गुड़ की दो ढेली डालो
आएगा वही स्वाद
जो जीमने बैठ गए हैं
उन्हें परोसो पहले
वे खाएँ—
अघाएँ
उनसे जो बच जाए
लेना तुम वह अन्न

फिर होगा संकल्प पूर
और मेघों के इस पार
आकाश मड़इया में
मुझसे आ मिलोगे

मिलोगे न सजन!


कुशाग्र अद्वैत की कविताओं के प्रकाशन का ‘सदानीरा’ पर यह छठा अवसर है। उनकी कविताओं, उन पर टिप्पणी, उनके कविता-पाठ और उनसे परिचय के लिए यहाँ देखें : हम हारे हुए लोग हैं │ इस भाषा के घर में │ फ़ंतासी, देरी, भूलो, चुम्बन काम न आएगा, करीमा बलोच पवित्र चीज़ को अश्लील न बनाऊँ │ प्रार्थना-प्रलाप 

2 Comments

  1. Kamini Chaturvedi अगस्त 12, 2025 at 9:09 पूर्वाह्न

    भावुक कर देने वाली कविता ।सही कहा जिनका जीवन कठिन है उनका मरण भी कठिन होता है।
    आपकी कविता पढ़कर लोक के ऐसे व्यक्ति की याद आ गई जिसने सब कुछ अपने ऊपर झेला है और हम उससे मिल चुके हों।

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  2. प्रज्वल चतुर्वेदी अगस्त 13, 2025 at 6:42 पूर्वाह्न

    कमाल की कविता है। भाव-सिक्त! यह कविता जिसका अनुष्ठान करती है, अपने चरम पर पहुंच कर उस अनुष्ठान की निष्पत्ति भी! प्रतीक, उपमाएं, भाषा— सभी परिपक्व। दार्शनिकता के छोटे छींटे भाव के तप्त तवे पर जिस छांय से पड़ते हैं, और अपनी आयतन में बढ़कर वाष्प हो जाते हैं, और घेरकर छाते हैं जब— मज़ा आ जाता है। कुशाग्र को शुभकामनाएं।

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