कविताएँ ::
वसुंधरा यादव

वसुंधरा यादव

युद्ध के विरुद्ध

मटमैले दृश्यों के बीच
एक ताज़ा पन्ना फड़फड़ाता है
धरती चिंघाड़ती है
आसमान थर्राता है
एक उद्घोषक घोषणा करता है
एक अविराम युद्ध शुरू हो गया है
युद्ध में घिरे हुए सारे व्यक्ति युद्ध के ख़िलाफ़ हैं
आसमान में कुछ दृश्य उभरते-बिगड़ते हैं
फड़फड़ाते पन्नों में एक ताज़ा चित्र
बेहद ताज़ा शस्त्रों के साथ खड़ा है
देखो-देखो अभी-अभी
एक युवा बम ने
घायल कर दिया मुझे
एक बुज़ुर्ग बंदूक़ ने नोच लिया
मेरे शरीर का आधा हिस्सा
एक मटमैले आसमान ने छीन ली
मेरी बादशाहत
यह समय है दृश्यों के बिगड़ने का
यह समय है
जब एक व्यक्ति
दूसरे व्यक्ति को
युद्ध की रणनीति के बारे में बताता है
यह वह समय है
जब मर जाएँ सारी मछलियाँ
पानी के ख़िलाफ़ होने में
यह सच है कि सारे युद्ध शांति चाहते थे
यह भी सच है कि सारे युद्धों ने
सिर्फ़ अशांति फैलाई है
युद्ध एक बच्चे की पेंटिंग है
जिसे देखकर दहल गए माँ-बाप
और अब जब मटमैले दृश्यों में
फड़फड़ाता है ताज़ा पन्ना
वे उस पन्ने के ख़िलाफ़
बेहद रंगीन चित्र बनाना चाहते हैं।

हथियार

साथी तुम जब भी आते हो
लाते हो साथ महुआ-इमली
और अपनी आँखों में बसा ढेर सारा बस्तर
तुम आते हो तो समूचा जंगल आता है साथ
तुम हथेलियों पर रखकर मेरी तरफ़ बढ़ाते हो केंदू
महुआ की महक में छिपाते हो पूरा बारूद से भरा जंगल
तुम कहते कि जंगल में महुआ बहुत फल रहा
इमली तो तुम्हारे स्कूल में सिरों पर टपकती है
और केंदू खाकर ज़िंदा रह जाते हैं कई भूखे बच्चे
पर मैं तुम्हारे मुँह से सुनना चाहती हूँ
बहुत फल रही है बारूद की बेल
बहुत बढ़ गए हैं हथियार
तुम्हारे सिरों पर तानी गई बंदूक़ ने ले ली हैं कई जानें
और अब तो वे लाशों के कारोबारी हो गए हैं
जंगल ख़ामोश होने की हद तक चुप थे
ख़ून की आख़िरी बूँद निचुड़ने तक शांत थे
कि फिर मार दी गई उनकी छह महीने की बच्ची
और ए’लान किया गया जंगल में फिर लौट आई है शांति
फिर लौट आई है पेड़ों में महुए की महक
अब सारे फूल शामिल हो सकते हैं
अपनी नन्हीं और मासूम दोस्त की शहादत में
तुम लौटते हो मेरे पास
तुम्हारे हाथ में कोई फूल नहीं है
कि मैं जूड़े में लगाकर इतरा सकूँ
सहेलियों के बीच
तुम रोते नहीं सुबकते हो
मेरे हाथों को अपनी आँखों पर धरकर
अब तो सहा नहीं जाता
आँसुओं का एक दरिया बन गई हैं तुम्हारी आँखें
खौलने की हद तक गर्म हो रहा है तुम्हारा ख़ून
मैं तुम्हें रोकती नहीं वापस भेजती हूँ
बारूद के शहर में
जंगल से कहना
तुम्हारी प्रेमिका ने निहत्था भेजा है तुम्हें
उन बंदूक़ों के मुहाने पर
जिन पर लिखा था
निहत्थे लोग हथियार बन जाते हैं।

जिन्हें चप्पलें चुभती है

तुम लौट आओ बस्तर
कि हम गीत गा गाकर थक चुके हैं आज़ादी के
और यहाँ के सारे अधूरे काम पूरे कर लिए हैं हमने
हम अकेले ही घूम रहे हैं सड़कों पर
तुम्हारी यादें लादे

कितनी बार थक कर बैठे उस चबूतरे पर
जहाँ विदा की भोर
अपने हाथों में मेरे हाथ भरकर
कहा था तुमने
मास्टर को कोई नहीं मारता… तुम बचे रहोगे
और लौटकर आओगे मेरी ख़ातिर

तुम लौट आओ कि
कि बहुत लोग मारे जा रहे हैं
तुम्हारे आस-पास
मेरा दिल बहुत घबराता है

यहाँ भी मारे जा रहे हैं
तुम्हारे अनेक दोस्त
ये नहीं बचेंगे साथी
यह जानते हुए भी कि
तुम इनसे बेइंतिहा मोहब्बत करते हो
तुम लौट आओ बस्तर
कि सड़कों पर काँटे नहीं बिछे फिर भी
सारी राहें तुम्हारे बग़ैर चुभ रही हैं
आँखों ने उदास रहना सीख लिया है
तुम लौट आओ इससे पहले कि जंगल की किरचें
धँस जाएँ तुम्हारी आत्मा में
और बस्तर सुर्ख़ कर दें
तुम्हारी भूरी आँखें
तुम समझो मेरी जान
मैंने कल रात सपने में
इंद्रावती नदी पार करते देखा तुम्हें
और देखी एक गोली जिस पर
तुम्हारे नाम का पहला अक्षर लिखा था
लौट आओ कि यहाँ भी बच्चे पढ़ नहीं पा रहे
उनके बस्तों में भर दिया गया है अँधेरा
वे रोज़ अँधेरे के साथ स्कूल जाते हैं
और वैसे ही लौट आते हैं
तुम कुछ भी मत कहो साथी
यह तो बिल्कुल भी नहीं कि
बस्तर में तुम्हें चप्पलें चुभती हैं
और हाथ थक जाते हैं
लाशें ढोते-ढोते
तुम लौट आओ
कि छूने हैं तुम्हारे हाथ
और देखने हैं वे पैर
जिन्हें चप्पलें चुभती हैं
और जूते अश्लील लगते हैं।

उनकी बंदूक़ें

उस रात सारे ज़ख़्म ज़िंदा हो गए
‎सारी नज़रें ख़ौफ़ से भर गईं
‎मेरे ऊपर चलाए जा रहे थे
कुल्हाड़ी से भी तेज़ धार वाले हथियार
‎सारी जवान आवाज़ें दफ़्न हो गई क़ब्रों में
‎और बारूद उगाया जा रहा था मेरे सीने पर
‎मैंने उन सबको आवाज़ें दीं जो
‎फुसफुसाकर कर रहे थे
अपनी प्रेमिका से वादा
‎जंगल में घुमाने का
केंदू खिलाने का
‎जो लौटकर आए
उन्होंने कभी जंगल नहीं देखा था
‎जो लौटकर आए
वे जंगल की औलाद नहीं थे
‎जो लौटकर आए
बारूद लेकर आए
‎मिटा दी हमारी नस्लें
‎हमारे बच्चों के सिरों में भर दीं गोलियाँ
‎जब फ़ौज जंगल में उतरती है
‎तो नहीं रखती कभी बंदूक़ धरती पर
‎वे चुनते हैं हमारा महुआ और केंदू
‎हम उनकी बंदूक़ें चुनते हुए मारे जाते हैं
‎किसी अख़बार में दर्ज नहीं होता
‎हम हथियार के ख़िलाफ़ साजिश करते हैं
‎और मारे जाते हथियारों के पक्ष में
‎सारी लड़ाइयाँ छोड़कर बच्चे महुआ बीनते हैं
‎केंदू चुनते हैं
और तुम्हारे बारूद पर पैर धरकर मारे जाते हैं
‎वे स्कूल जाते हुए स्कूल मास्टर के साथ मारे जाते हैं
‎खेत काटते लकड़ी बीनते
अपने पिता अपनी माँ के साथ मारे जाते हैं
‎असल में वे जब भी मारे जाते हैं
‎अपने आदिवासी होने के कारण मारे जाते हैं।

आधे भाई के नाम फिर से

कहते हैं कि उसने इतनी तेज़ भींची थीं मुट्ठियाँ
मानो उसकी मुट्ठियों में जितनी जान थी
वह सब उतर आई हो उसके चेहरे पर
दादी कहती कि उसकी भिंची मुट्ठियों और बंद आँख से
एकबारगी लगा कि रोकर हिला देगा पूरी दुनिया
और आले में रखा दीया ताकता रहेगा रात भर

कहते हैं कि उसके हाथों में भगवान के दिए दो लाल थे
जिन्हें बचाने की जद्दोजहद में मर गया मेरा भाई

वह न रोया और न खोली उसने अपनी नन्हीं हथेलियाँ
माँ कहतीं कि उसके हाथों में मैं थी
मेरी खुली मुट्ठियों में कुछ नहीं था
कि मैं बचा सकती अपने भाई को
मुझे कुछ बचाना आता ही नहीं था
कहते हैं उसके हिस्से का भी रोना मैं इतना तेज़ रोई
कि बरसों तक याद करती रही बड़ी-बूढ़ियाँ
और याद दिलाती रहीं मुझे उसका मरना‌
मेरे भाई मेरे सपनों में तुम इतने गोरे हो
कि भूल‌ जाती हूँ हम एक साथ जन्मे थे
और हम अपने-अपने हिस्से का रो सकते थे
ताख पर रखे दीये से काजल लगाते वक़्त या
मेरी बातों से ज़ख़्मी होकर दुखी होने पर
याद करती है माँ तुम्हें
हर सपने में मैं तुम्हारे मरने से बच जाती हूँ
और तुम मेरे जीने से मर जाते हो।

तुम्हारा भी बेटा हो

सड़क का किनारा था वह
कुछ देर पहले यहाँ की दूब बहुत हरी थी
ठीक वैसी ही जैसी
सड़क के किनारे की होती है घास

सालों से गुज़र रहे हैं हम इस चौराहे से
सालों से खड़ी हैं पान की वह दुकान
जो दूब को भरती रही लाल रंग से
और ख़ून का भरम बनाए रखती है
पर आज पान नहीं ख़ून है सड़क के किनारे
और एक पच्चीस साल के नौजवान की लाश है
कहते हैं कि दूर तक बिखर गई थीं आँतें
और मरने के कुछ समय बाद तक
ज़िंदा थीं उनकी आँखें
उसकी आवाज़ देती आँखें याद हैं पानवाले को
और बिखरी हुई आँतें याद हैं उसके भाई को
माँ को कोई भी बात याद नहीं है
एक लाश हैं जो उसके इकलौते बेटे की है
मुझे याद आते हैं एक माँ के उठे हुए हाथ
भगवान् अगले जन्म में तुम्हारा भी एक बेटा हो
और वह पच्चीस साल की उम्र में
सड़क-दुघर्टना में मारा जाए
मैं सोचती हूँ कि खेत में बोऊँ उनकी यह ख़्वाहिश
किस नदी से सींचूँ यह बद्दुआ
किस पानी से धोऊँ उनकी आँखें
मै कहती हूँ यक़ीनन भगवान् को
इसी जन्म में एक बेटा होगा
और वह पच्चीस साल की उम्र में
सड़क-दुघर्टना में मारा जाएगा।


वसुंधरा यादव [जन्म : 2000] की कविताओं के ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह प्राथमिक अवसर है। इससे पूर्व उनकी कुछ कविताएँ ‘हिन्दवी’ और ‘समकालीन जनमत’ पर प्रकाशित हो चुकी हैं। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं। उनसे vasundhara.stp@gmail.com पर संवाद संभव है।

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