स्वप्निल चक्रवर्ती की कविताएँ ::
बांग्ला से अनुवाद : प्रशांत विप्लवी

प्रेमी
वह लड़का
जो अपना सिर झुकाए निकल गया
मेरा प्रेमी है।
साड़ी माँगने पर चूड़ी लाता है
चूड़ी माँगने पर बीस रुपये का बिंदी-पैकेट
खाने की ख़्वाहिश करूँ तो मूँगफली
नहीं माँगने पर सिर्फ़ चुंबन
उसे अगर मैं अपने हृदय में झाँकने के लिए बोलूँ
मेरे जन्म-दाग़ और तिल देखकर मुँह फेर लेता है
वह मेरा प्रेमी है—
वैशिष्ट्यहीन, रीढ़ भी टेढ़ी, झुककर चलता है, डर-डरकर सड़क पार करता है, दोस्तों के बीच मेरी तस्वीर दिखाकर नहीं कहता है कि दुनिया की सबसे सुंदर प्रेमिका उसके पास है।
वह मेरा प्रेमी जिसके शर्ट के दो बटन टूटे हैं, माँ को ब्लड-शुगर है, बहन की शादी नहीं हुई।
वह मेरा प्रेमी जो बहुत से फूलों के नाम नहीं जानता, नहीं जानता है मिसीसिपी किसी देश की नदी है, जिसे नहीं पता कविता कैसे लिखी जाती है, जो गणित में भी कमज़ोर है।
कल जब मैं चेहरे से पान का पत्ता हटाकर अपने पति की आँखों में आँखें डालूँगी और परसों के बाद वाले दिन जब गले, गर्दन और छाती पर किसी दूसरे के द्वारा दिए गए क्षत-चिह्नों को लेकर छत पर जाऊँगी…
वह शायद बहुत कुछ जान जाएगा और समझेगा
वह शायद अनायास ही वह लिख लेगा
कुछ बेहतरीन कविताएँ या गीत
वह शायद बनाएगा कोई सुंदर तस्वीर…
युवतियाँ मुग्ध होंगी, बूढ़े नॉस्टैल्जिक!
मैं भी शाम वाले चाय के अड्डे पर
मुँह खोलकर बोल दूँगी—
वह मेरा प्रेमी है।
प्रेमिका
वह लड़की
जो ठीक अभी हल्दी-स्नान करके आई है
मेरी प्रेमिका है।
बैठना चाहता तब आँगन था
सोने की इच्छा होती तब गोद।
वह मेरी प्रेमिका—उम्र तेईस वर्ष, पितृहीन, मामा के घर पली-बढ़ी। मेरे शर्ट में कितने बटन टूटे हुए हैं, कितनी नौकरियाँ पाते-पाते रह गया… वह सब जानती है।
वह जानती है कि मैं कब घर लौटता हूँ, महीने के किस तारीख़ को मेरी पॉकेट में पैसे नहीं होते, मेरा सिर-दर्द किस गोली से ठीक होता है, मेरा कौन दोस्त बढ़िया है, कौन सुविधावादी… वह सब जानती है।
वह मेरी प्रेमिका है—मन दुखी हो तो हँसती है, ख़ुश हो तो ज़ार-ओ-क़तार रोती है… जिसे हँसते हुए देखा, लजाते हुए देखा उसी की बात कर रहा हूँ.. वह मेरी प्रेमिका है।
वह कल किसी और की दुल्हन होगी?
शायद हो सकती है…
वह मेरी प्रेमिका है—
आज भी है और कल भी रहेगी
कहानी में नहीं हुई तो कविता में रहेगी
रसोईघर में नहीं भी हो तो छत के घने अँधेरे में रहेगी
धूप में नहीं भी होगी तो आँधी की तीव्रता में होगी।
वह मेरी प्रेमिका है।
शोक-सभा
मेरी शोक-सभा की अध्यक्षता करे कोई विधुर गौरैया
गौरैये से बेहतर कौन समझ सकता है—
घर टूट जाने का दुख।
मेरी शोक-सभा में दीर्घ निःश्वास छोड़े
इस शताब्दी का सबसे पुराना बरगद
यह दीर्घ निःश्वास फैल जाए
मेरी प्रेमिका के आँगन तक
कम से कम एक दुपहर उसका मन विषाद से भर उठे।
मेरी शोक-सभा के समापन वक्तव्य के लिए
आमंत्रित हो मेरा सबसे बड़ा शत्रु
निष्कपट होकर वह यह कह दे—
मैं कितना पागल था।
मेरी शोक-सभा में रोने की ध्वनि उठे
मेरे इलाक़े के सबसे बूढ़े कुत्ते के गले से
उसके रोने में कम से कम कोई बनावट नहीं होगी।
मेरी शोक-सभा किसी डस्टबिन के पास हो
फैल जाए दुर्गंध
सभ्य लोग बहाना बनाकर चले जाएँ
शोक-सभा के ख़त्म होने से पहले।
मेरी शोक-सभा में बारिश हो
बारिश में भीगकर सभा भंग हो जाने के बावजूद
एक कोने में बैठा रहे एक शहरी कौआ
कम से कम उसे एक टुकड़ा मांस का मिल जाए।
नामकरण
इस शहर में जिसे मैं अभाव समझता हूँ
मैंने उसका नाम प्यार रखा है
इस शहर में जिसे मैं घृणा समझता हूँ
मैंने उसका नाम संपत्ति-मालिकाना रखा है
इस शहर में जो कुछ आदत है
जो कुछ बहुत सोचने पर मजबूर करता है
उसे मैं स्मृति कहता हूँ
इस शहर में जो लोग समझते हुए भी
न समझने का दिखावा करते हैं
और अपना बोझ दूसरों के कंधों पर डाल देते हैं
उन्हें मैं लोकतंत्र कहता हूँ।
जब यह शहर पानी से लबालब भर जाता है
और बिजली की गड़गड़ाहट से कान ढकने पड़ते हैं
तब मैं पानी को जुलूस समझता हूँ
और बिजली को नारा मानता हूँ
इस शहर में एक मुट्ठी भोजन के लिए
जो लोग मर जाते हैं
उन्हें मैं शहीद कहता हूँ।
भीतरी घर का मॉर्ग
मेरे सीने के भीतर का घर
एक मॉर्ग की तरह ठंडा है
वहाँ चार लाशें पड़ी हैं
और वे सभी मेरी हैं।
मैं पहली बार अवहेलना में मरा था
दूसरी बार प्रतिश्रुति की अकाल-मृत्यु में मरा था
तीसरी बार मुझे एक विश्वासघातक ने ख़ून किया
चौथी बार मैं स्वेच्छा से मरा हूँ।
मेरे सीने के भीतर का घर
एक मॉर्ग की तरह ठंडा है
वहाँ चार लाशें हैं
उनका पोस्टमार्टम नहीं हुआ है।
एक तुम की कहानी
तुमने कहा था
रातों को नींद नहीं आती
मैंने समझा
समय चाहिए तुम्हें
तुमने कहा था
आसमान में कितने बादल घिर आए हैं
मुझे लगा
शायद उदास हो तुम
तुमने कहा था
बाल उलझ गए हैं
मुझे लगा स्पर्श चाहती हो तुम
तुमने कहा था
आज शाम तुम बरामदे पर रहोगी
मैंने समझा
मिलना चाहती हो तुम
तुमने कहा था
अँधेरे से बहुत डर लगता है
मैंने समझा
तुम्हें मुझसे लिपटे रहने की इच्छा है
तुमने कहा था
समुद्र के पास जाना है तुम्हें
मैंने समझा
हाथ पकड़कर साथ-साथ चलना चाहती हो
तुमने कहा था
नीला प्रिय रंग है तुम्हारा
मैंने समझा
शायद तुम पीड़ा में हो
तुमने कहा था
होंठ फट रहे हैं
मैंने समझा
तुम चूमना चाहती हो शायद
तुम बोली थी
गणित पसंद नहीं तुम्हें
मैंने समझा
कविता पसंद है तुम्हें
तुम बोली थी
आज तुम्हें जल्दी घर लौटना पड़ेगा
तुमने आगे कहा था
यह अचानक से मिलना
बेवक़्त फ़ोन करना…
अब तुम्हें अच्छा नहीं लगता है
मैं समझ गया था
तुम संबंध तोड़ना चाहती हो
उसके बाद जब तुमने अलिखित हस्ताक्षर से
अदृश्य अदालत में मेरे विरुद्ध
अलगाव का मामला दायर किया
मैं समझ गया
तुम मुक्ति चाहती हो
इसके बाद सब कुछ समझकर
मैं दार्शनिक बन गया
जब सब कुछ मिटाकर
तुम दूसरे के घर की शो-पीस बनीं
एक दिन हमारी मुलाकात हुई
तब तुमने पूछा था
कैसे हो?
मैं समझ गया था
तुम ठीक नहीं हो।
अंतिम बार
हम दोनों जिस दिन अंतिम बार मिले थे
उस दिन समझ आया था
दीर्घ निःश्वास से भरी
इस दुनिया में कुछ भी नहीं है
जिस दिन हमारी अंतिम बात हुई थी
उस दिन जाना
चुप रहना कितना कष्टकर है
अंतिम बार जब हमने एक दूसरे को छुआ
उस दिन समझ पाया आग कितना जलाती है
अंतिम बार जब हम दोनों
एक दूसरे से मुँह फेरकर चले गए
उस दिन समझ पाया
विदा होना कितना कठिन है
दीर्घ निःश्वास
दीर्घ निःश्वास ठीक जगह पर छोड़ना होता है
सावधानी से, बालों को हटाकर, गर्दन के पास
ताकि तुम महसूस कर सको कि
मैं सचमुच असहाय हूँ।
फिर अगर तुम मुझे सीने से लगा लो
तो मैं कुछ देर स्तब्ध रहूँ
ठीक वैसे ही जैसे ठहरती है
तूफ़ान से पहले की रात
तुम मुझे सिखाओगी तैरने के कुछ प्राचीन तरीक़े
तुम समझाओगी दुनिया के सारे अनियम
दरअस्ल सामाजिक कुसंस्कार हैं।
तुम दिखालाओगी एक अजीब-सा बायोस्कोप
तुम्हारी नाभि किसी अनजाने भूतिया सिनेमा-घर जैसी
अगर मैं तुम्हारे अनजाने रोने की धुन में
कुछ उदास शब्द बिठा सकूँ
तभी—
मैं सिगरेट की राख झाड़ दूँगा
तुम्हारी अलौकिक नग्न छाया में
क्योंकि इसी तरह
संगम एक गीत बन जाता है!
स्वप्निल चक्रवर्ती बांग्लादेश के अत्यंत प्रभावशाली नए कवि हैं। उनकी कविताएँ आधुनिक जीवन की भावनाओं और उसके संघर्षों को मर्ममय ढंग से व्यक्त करती हैं। बांग्लाभाषी नई पीढ़ी के बीच वह बेहद चर्चित हैं। उनकी कविताओं की दो किताबें आ चुकी हैं। इस वर्ष के कोलकाता बुक फ़ेयर में उनकी कविता-पुस्तकें विशेष विमर्श का विषय रहीं। प्रशांत विप्लवी हिंदी की नई पीढ़ी के कवि-लेखक-अनुवादक हैं।