कविताएँ ::
शिव कुमार गांधी

शिव कुमार गांधी

दुविधाएँ

एक

शाम में कैसे जाऊँ दुपहरी के कोरे पन्ने लेकर
रात तक भार बढ़ता ही जाता है
ढोना जिसे मुहाल है
रातें ये काली-काली
टिमटिमातें तारों पर बैठ चिढ़ाती हुईं।

दो

इतनी आत्महत्याएँ हुईं
उस शहर में
कि कैसे कहूँ

वह मेरा ही शहर था या कि उस शहर में
जीवन जहाँ बनना शुरू भर हुआ था
क्या मुझे किसी और शहर जा मरना था?
पर कौन-से शहर?

तीन

कितना बदरंग हो चुका था
तुम्हारे घर का दरवाज़ा
चालीस बरस बाद जिसे मैंने देखा
पलक भर देखा,
खटखटाया नहीं।

अगर तुम वहाँ मिलतीं
कैसे कहता
कि इतनी दूर से
ये दरवाज़ा ही देखने आया हूँ,
थका हुआ।

मैं जानता था कि तुम वहाँ नहीं मिलतीं
मैं जानता था कि मैं भी कहीं नहीं मिलता
मैं कल्पनाओं में इतना समय बिता चुका था
कि अब कैसे मिलता और कहाँ आख़िर?

चार

रेत के टीलों में जहाँ बोर्ड लगा था
उस सागर जैसी विस्तृत भूमि के बिकने का
बचपन की स्मृतियों के डब-डब आँसू
उन टीलों में समा गए।

बोर्ड पर मैंने थूकना चाहा,
ताक़त कम पड़ी।

पाँच

क्या इसे ऐसे कहूँ कि हर बार
उस एक शहर के बारे में सोचकर
मैं अपने में ही वापस लौट आया
फिर देखा कि कहाँ?

अपने में लौट आकर
कौन-सा शहर मेरे पास रहा?

छह

हाँ, मैं नहीं गया
बचपन के अपने शहर
तीस साल बीते
जैसे कि मेरे नहीं जाने से ही
शहर का नक़्शा जल गया हो?
जैसे कि मैं जिन शहरों में रहा
वहाँ के नक़्शे बहुत आबाद हो गए हों?

सात

शाम ढलते न ढलते
कितनी तो पारदर्शी सुंदर-सी पीली रौशनी
धूल भरी तेज़ हवाओं के साथ
आँखों में समा जाती है
मैं बाँहें फैलाता हूँ
और पल भर बाद
अपनी बाँहों में ताकता हूँ
और ख़ुद पर हँसता हूँ
न बाँहें
न रौशनी
न पीला रंग
धूल भरी तेज़ हवाओं का वेग है…
मुझे बिखरा देने की चुनौती देता हुआ।

आठ

यह आइने में किसके आँसू हैं?
मेरे तो नहीं

मैं तो सुख की ब्रांडेड चादर से लिपटा
दुख का एक विज्ञापन हूँ—
दुनिया को उबाता हुआ।

नौ

मुझे अक्सर सोते में
कविता लिखने के सपने आते हैं
लिख देता हूँ
पूरी की पूरी कविताएँ
जागकर सुबह
कुछ शब्द
कुछ पंक्तियाँ
और उनका असर याद करने की कोशिश करता हूँ।

मैं पाता हूँ—
सुबह-सुबह की पहली ही गतिविधि ने
मुझे धकिया कर दिन से बाहर कर दिया है।

याद अगर कोई वास्तविक कुआँ होती तो
उसमें बाल्टी डाली जा सकती थी
याद अगर कोई वास्तविक कुआँ होती तो
घटता जलस्तर भी दिखता जाता
तल के अंत में पड़े पत्थर तक दिख जाते
सपनों में लिखी कविताएँ
उन पत्थरों के नीचे दबी दिख जातीं।

दस

मैं अकेला होता हूँ

अकेलेपन को भरने की कोशिश करता हूँ
बेहतरीन स्वादों और ख़यालों से

मैं ही अपने अकेलेपन को ख़ुद से छीन लेता हूँ।

यात्राएँ

एक

मैं जब भी कसता हूँ
अपने जूतों के फ़ीते
अपनी आकांक्षाओं के साथ
अप्रत्याशित संशय
जूतों के बाज़ू में आ बैठता है
आकांक्षाओं पर सवार
मुझे उलझाता-थकाता
पूछता है—किधर चले?

मन के सामान का भार
यात्रा के सामान का भार
जाने कितने पहाड़,
जमी हुई धूल, घुटन,
कितनी अँधेरी गुफाएँ?
अब और कितनी यात्राएँ?
कितनी बाहर की ओर?
कितनी अंदर की?

संशय घसीटता है
मन को जूतों से बाहर

जूते हैं कि आदतन चल ही पड़ते हैं
बिना परवाह किए
कहीं दरवाज़े खुले हैं,
कहीं बंद।

दो

एक रंग
जाने कितनी दूर से आया मुझ तक
जाने किसने भेजा या स्वयं ही
यात्राएँ उन्होंने भी कीं
जो मुझ तक आना चाहते थे
मैं अकेला ही नहीं झाड़ता रहा धूल

तीन

खिड़की का खुलना
जैसे कि रेलगाड़ी की सीटी का बजना

सीटी बजना
खिड़की खुलना

चलो नज़र
अब यात्रा पर

चार

बंद दरवाज़ों के भीतर भी
उतनी ही दुनिया थी
जितनी वे बाहर से ले आए थे

बाहर से भीतर की ओर ले जाते दिखते हुए
भीतर और बाहर के दरवाज़ों के बीच
रास्ते अत्यधिक दुर्गम और दूर थे

पाँच

दुख से भरी यात्राएँ
इतना समय ले लेती थीं
कि दुख से ही ऊब हो जाए
जैसे कि बिना यात्रा किए
अत्यधिक सुख से

छह

यात्राओं में
इकट्ठा अधिक किया
छोड़ा कम
इस तरह कबाड़ ख़ूब जमा किया
पूरा जीवन ख़र्च हुआ बेहिसाब

सात

शायद वे जगहें हैं ही नहीं
जहाँ मैं नहीं गया
क्योंकर हों
जब मैं वहाँ गया ही नहीं!

आठ

कौन कर रहा है इंतज़ार
उन जगहों पर जहाँ हो आना बाक़ी है
कौन फिर से कर रहा है इंतज़ार
जहाँ हो आया हूँ

विकट दुविधा मन को बहला रही

नौ

पृथ्वी का कौन-सा हिस्सा,
वनस्पति, आकाश, जल
जहाँ तुम टिक सको
और कहो कि देखना-जानना हुआ

कौन-सा मन
जिसके भीतर टिक सको
और कहो रहना हुआ

दस

यात्रा मुझे नदी जैसी नहीं करनी थी
कि जहाँ ख़ाली जगह वहाँ बह चलूँ

झरे पत्तों जैसी भी नहीं कि
हवा कहीं भी बहा ले चले

एक जगह बनी रहने वाली
जड़ों जैसी भी नहीं
जीवन जैसी भी नहीं
कि जिसके अंत में
मृत्यु आख़िरी स्टेशन हो

क्या ब्रह्मांड से बँधी पृथ्वी की गति जैसी?
मनुष्य होकर और कौन-सी यात्राएँ संभव हैं?
सामान सीमित है।

नदी से कहा :
थोड़ा यहीं रुक जाओ
झरे पत्तों कुछ देर यहीं मँडराओ
हवा यहाँ बँधी रहो
मैं कुछ देर अपने जूतों की टेक लगाकर सुस्ता लूँ—
असीमित की कल्पना में।

ग्यारह

एक दिन फ़ीते टूट गए
मन छूटकर भागा
देह छटपटाई
अपने को वहीं पाया
जहाँ से शुरू हुआ था।

इस महानगर में

मैंने क्या सुना?

बुनावट इमारतों की
दृश्य विज्ञापनों के
इमारतों का कोई कोना न था
जहाँ विज्ञापनों की तरह
ठहाकों के कठोर चमकते दाँत
कान को काटते न हों

मैंने क्या देखा?

शिश्न को सिलाई से छेदने का करतब दिखा

यहाँ से जाने की टिकट का
पैसा माँगता हुआ माँगीलाल

मैंने क्या स्पर्श किया

शीत, कभी जो नहीं लिखी गई चिट्ठियों की
जिन पर कि आत्मा से मेरा नाम लिखा होता

मैंने क्या दिया

समय की आँखों में आँखें डालकर
अंधा हुआ किया
कि देखो ऐसे जीवन ख़र्च हुआ
फटी जेब से फिसलता हुआ

मैंने क्या खोया?

धूप—नजर जो धूप देखती
आँखें—जो नज़र सँभाल पातीं
बल—रीढ़ पर सवार होता,
विवेक जिसका वाहक होता
सत्य—जो धूप में चमकता,
नज़र बारीक होती,
विवेक की रीढ़ को बल मिलता।

ज़ुबैदा की छत

छत क्या थी, एक टीन की चादर थी जो ईंटों के सहारे टिकी थी, चौथी मंज़िल थी। ऐसा कहा जा सकता है कि लगभग एक सौ पचास साल पहले किसी हवेली के दरवाज़े जो कि मुख्य सड़क पर खुलते, के भविष्य में यह चार मंज़िलें उस दरवाज़े पर खड़ी होनी थीं और पीछे को खंडहर होना था। दरवाज़े के आस-पास रामदरस-साइकिल, चंगेज़-नज़ीर-चिकन, मियाँ असलम-दर्ज़ी, लता-कूरियर, सदाबहार-पान-सिगरेट, मोती-पतंगवाला की अँधेरे भरी छोटी-छोटी दुकानें थीं। पहली से चौथी मंज़िल तक अनेक ज़ंग लगे साइनबोर्ड थे—तारों, धागों, पतंगों, कबूतरों, न जलने वाले बल्बों से भरे जिनके पीछे दिखते कमरों में गोदाम, छोटे दफ़्तरनुमा इंतज़ाम के बीच छोटी-छोटी खिड़कियाँ, बल्ब की पीली रोशनी झाँकती और कोई चेहरा कभी-कभार शाम में और दिन की तनी पर सूखते रहते रंगहीन कपड़े। पूरे बाज़ार में ये चार मंज़िलें ऐसा नहीं कि कुछ अलहदा-सी दिखती हों, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना कि पीछे के खंडहर में कबाड़, नशा, जुआ, पतंगबाज़ों, कबूतरों और कुत्तों का अड्डा था… क्या हिंदू क्या मुसलमान, सबसे ज़्यादा यह क़िस्सों का अड्डा था। शहर का हाल, नई ख़बरें, अफ़वाहें यहाँ कटी पतंगों-सी आती-जाती रहती थीं। साल 2024 का था। क्या हिंदू, क्या मुसलमान… इशारों का न धर्म था, न कोई जात। उस छत तक जाते इशारों का मतलब एक ही था। छत क्या थी, एक टीन की चादर थी जो ईंटों के सहारे टिकी थी, चौथी मंज़िल थी—घिसी हुई भोर के गुलाबी रंग-सी। छत से आते धागे से टँगी रबर की गुड़िया, तेज़ हवा में धीरे-धीरे डोलती, साइनबोर्ड से टकराती, कपड़े घिसकर फट चुके थे। बाल झर गए थे, दूसरे धागों में उलझकर अटक गई थी। इशारों से बेख़बर एक पाँच साल की लड़की छत से उस गुड़िया पर लगातार नज़र जमाए रहती थी। ज़ुबैदा कौन थी, पता नहीं कोई जानता है कि नहीं? मैंने पूछा कि ज़ुबैदा कौन है?

वह एक साया थी अपनी-अपनी सौ फिट लंबी चादर पर इतने ही लोगों को बिठाए दिन ढलते न ढलते शहर के आसमान में मँडराती थी, अँधेरे में उसकी नग्न देह शहर के चाँद-सी चमकती थी, जिसे देखने शहर अपनी खिड़कियाँ खोल लेता था, उस ओर इशारा करता था, शहर के चारों ओर बने बड़े-बड़े दरवाज़े उसके लिए खुल जाते थे। इशारों के लिए उठे हाथों के आकार की ही शहर की बनावट हो गई थी। शहर में भरी दुपहर जब पीली आँधियाँ चलतीं, धरती अपनी जगह बदलती, ज़ुबैदा अपने सौ फिट के क़द के साथ झाड़ू लिए दिखती, बुहारते-बुहारते वह ख़ुद पाँच फिट के झाड़ू के क़द तक आ जाती। फिर बारिश आती, मौसम बदलते शहर को वीर्य से सींचा जाता, रोटियाँ तक भीग जातीं। ज़ुबैदा अपना थैला उठाए शहर में खुले पहले बालिका विद्यालय जाती हुई दिखती, उसके क़दम ईरानी क़ालीनों पर चलते-से दिखते—सब्ज़, बादामी, ज़ाफ़रानी, किरमिजी रंगों में भरे दरख़्तों, उनके सायों, उनकी ख़ुशबू से भरे। फिर वहाँ तेंदुए आए, साँप, नेवले, सियार… दरख़्त साल दर साल भरते गए सब्ज़ रंग को ओझल करते हुए… साल 1930 का होता।

इश्क़ ओस था
ओस क्षणभंगुर थी
क्षण क़ीमती न था
और इश्क़ की क़ीमत?

वह बेज़ुबान थी। नक़्क़ाशी के हुनर से भरी आँखें अंधी हो गईं, ओस ख़यालों में कहीं अटक गई।

शहर क्या था—गुलाबी पत्थरों से भरा एक चौकोर मजमा था—राधा और किशन की अनकही ठिठौलियों को अंधी आँखों से सुनते हुए भविष्य का एक इशारा था जो उस छत तक जाता था जिसके पीछे एक शराबी गुलाबी शराब के नशे में एक कटी पतंग को यूँ देखता था जैसे कि कटा हुआ शहर भटकता-सा ज़ुबैदा की छत पर रबर की गुड़िया के इर्द-गिर्द मँडरा रहा है।

छत क्या थी, एक जगह थी जिसकी ओर देखकर इशारा किया जा सकता था जिसके आगे से गुज़रते थे इमरान, मोईन, बंसीधर, विभूति, गजानंद, शकील, मुंशी, हवलदार, वकील, पेशेवर समूह। एक सामूहिक शहरी आदत की तरह देखते थे उस ओर जैसे कि मंदिर की ओर जैसे कि मस्जिद की ओर।

छत क्या थी, एक अदृश्य शव था जो कि टीन की छत पर रखा था जाने कब से, जो धूप के नीचे सूख रहा था, बारिशों में भीग रहा था, एक ओस की बूँद के सहारे अपना जीवन जी रहा था। शव के छज्जे से एक पाँच साल की लड़की रबर की गुड़िया को ताके जाती थी जिसके नीचे सड़क पर शहर की महिलाएँ राम-राम करतीं गुज़रती जाती थीं।


शिव कुमार गांधी से परिचय के लिए यहाँ देखिए : बस एक जीवन और | लीनी की डायरी | कुछ निगाहें, कुछ रेखाएँ | अरसे बाद एक दोस्त को कविता सुनाना

प्रतिक्रिया दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *