कविताएँ ::
नीरज

नीरज

त्रुटिबद्ध

हम यह भली-भाँति जानते थे कि
होने की शर्त पर
होना था केवल मनुष्य ही
और चाहते रहना था
एक भलमनसाहत भरा जीवन सबके लिए

हमें सब निगल जाने वाली भूख थी
इसके तहत
हरेक आदिम संवेदनाओं को तीरे लगा
हम हमेशा इस सोच में रहे
कि यह जो भूखा, बदहवास, बदहाल ज़मीन पर
औंधे मुँह लेटा है
अगर जगा तो
हमारा छप्पन भोग और रेशमी बिस्तर छीन लेगा

हम अपने गिरेबान से छिछियाकर भागे
आजीवन परिस्थिति-दर-परिस्थिति भागते रहे

अपार हेय महसूस करते हुए भी
हम फूलों से घिरे लिप्त रहे
और अपनी संभावनाओं को
एक तिरस्कृत महक में लपेटते रहे

जितनी देर तक हम अपनी दहलीज़ में सिमटे रहे
हमारी मूर्खताओं ने हमें पर्याप्त ख़ुशहाल रखा
और जिस रोज़ हम इस सड़ाँध से फ़ारिग़ हुए
तब तक हमारे प्रायश्चित का समय भी अपनी राह हो लिया

हमारा जीवन
हमारे लिए ही सहानुभूति भरा साबित हुआ
हमारी ग़लतियाँ
उनसे हम कुछ सीख नहीं पाए।

इतिहास

धीरे-धीरे बाहर के सारे इलाक़ों से थक कर
समवेत अंत:करण में लौट आते
संशयग्रस्त दिन डूबता
रात भी ख़ूब प्रज्वलित, चुभती…

रात के लिए
दिन की तरह ख़ुश
और अपने लिए
रात की तरह सहानुभूतिपूर्ण
फिर-फिर लौटना चाहते हैं वहाँ
जहाँ बहुत सारी हेय स्मृतियों की
ख़ोज ख़बर हो—का चलन हो

पराक्रमहीन योद्धा बग़ैर वार्तालाप
युद्धनाद चीत्कारविहीन
मौन होकर सो जाना चाहते हैं

अविजित कोढ़ से जकड़ी हुईं हड्डियों में
गिलहरियाँ महसूस करते हैं
उफ़्! यह कायर सोच
योद्धा पृथक-निरर्थक
युद्ध, मृत्यु और क़ब्रिस्तान की ओर न मुड़कर
फूलों भरे बग़ीचे में जा बैठते हैं

अब फूल मरेंगे,
मैं मरूँगा,
मेरे योद्धा मरेंगे…
निस्तेज रहेगा हमारा इतिहास
लेकिन महकती रहेंगी हमारी मौतें!

ग़फ़लत

हमारी सारी घबराहट
जीने और जीतने के लिए ही थी
वहीं मृत्यु और पराजय
वे तो आश्वस्त दौर रहे हैं
मेरी सूखी सहमति
या हरी असहमति
इनके बीच कोई पुल नहीं बना सकी
इस जीवित विज्ञापन में
मेरे जैसे बहुतेरे हैं
जिन्हें यह ‘अंत’ तक देखना पड़ेगा।

पैर-फँसे पक्षी का कथन

बहेलिये की आँखें देखो
कितनी श्रद्धापूर्ण हैं
इतनी कि
हमारी जीने की आशाओं पर
कोई नज़र न जाए

उसके भूख के प्रसंग
कितने हृदयतोड़ हैं
उसके जाल
उसके फेंके गए टुकड़े
उसकी चुनी हुई जगहें
प्रत्येक जीवित संभावनाएँ हैं
और हमारे पैर
इन सारी संभावनाओं से
आशाओं से
और जाल लिए
उड़ने की परिश्रम और कोशिश से दूर हैं
हमें ऐसी आँखों के लिए
बार-बार मरना पड़ता है—
श्रद्धांजलिविहीन!

सु-चर्चित बोध

जितने काम हैं
तुम्हारे जीवन में
उनमें
कोई
पूर्णविराम
नहीं
है।

भार

ज़्यादातर दुख मेरी कल्पनाएँ रहे
और थोड़ी बहुत ज़रूरतें भी
पर इस दौरान
मैं हल्की चीज़ों से बचता रहा
बचपन के ऊल-जलूल चलन की तरह
हथेलियों में गड़े काँटे
अपनी पलकों से उठाने की कोशिश करता
और उसे ही सबसे भारी समझता
लेकिन यह दुख, है तो दुख ही…
कल्पनाओं के साथ-साथ
आपको वर्तमान तक
कब घसीट लाएगा, तय नहीं!

बचपन की भरपूर जिज्ञासाओं से
वर्तमान की विसंगतियों तक
मुझे यह पूरा जनम लगेगा
यह समझने और महसूस करने में
कि मैं इन सबके बीच खड़ा हूँ
या साथ खड़ा हूँ
या इन सबके ऊपर एक अतिरिक्त भार हूँ।

प्रेत

कहने में इतनी अतिशयोक्ति
और अंधश्रद्धा होने के बावजूद
भीड़ की झुकी इतनी सारी गर्दनें होने के बावजूद
प्रेत उन एकाध गर्दनों से थर्राता है
जिन्हें सिर हरदम उठाना आता है

वह लगातार एक पुरानी अ-घटना गाता है
जिसमें उसकी उपजाई कहानियाँ हैं
जिनके पात्र नहीं हैं जीवित

प्रेत रोते हुए बताता है
कि वह प्रेत कैसे बना?
था वह निरापराध (झूठ! झूठ!)
कैसे उसकी कमतर समझ में लोग
उसे मृत्यु तक घसीट लाए (फिर-फिर झूठ)
लेकिन बीच इन वाक्यों के
वह कुछेक ज़रूरी वाक्यों को
जीभ के नीचे दबाता जाता है
भक्त-भीड़ औंधे मुँह समर्पित—
पूर्ण ज्ञापित, आदेशाकांक्षी
मलते हुए आँख रोती है
प्रेत मन में मुस्कुराता है
जानता है—यहाँ कौन ही खोजी है!

शक्ति किसी मठ से आती है
मठ का मिज़ाज काला है
मठ का नाम काला है
मठ में नहीं है ईश्वर
प्रेत ही मठोत्तर है
प्रेत ही मठवाला है

प्रेती-विश्वास अभिव्यक्तियों से डरता है
हमारी जीने की कला के सबसे मज़बूत रंग (सच!!)
उसी रंग के बचे-खुचे लोग…

बची आवाज़ें जाती हैं भीड़ में
एक-दो सुबकती हैं फिर आवाज़ें
कान खड़े होते हैं
प्रेत को अपने नाम की पुनरावृत्ति का ही
डर सताता है
प्रेत जानता है
जो उसे ‘महराज’ के बजाय नाम से पुकारता होगा
वह उसकी सत्ता क्या ही स्वीकारता होगा
फिर प्रेत बदलता है दिनों-दिन नए पैग़ाम
राष्ट्रद्रोह है अब लेना सरेआम उसका नाम

उसको उसकी कल्पनाएँ सताती हैं
उसे उसका राजयोग डिगता हुआ लगता है
फिर उसे चाहिए नवजात अभिव्यक्तियाँ,
युवा अभिव्यक्तियाँ
जिनकी बलि से
उसके भविष्य-स्वप्न सुनिश्चित होते हैं

उसकी कोमल चाहत है—
उसकी भीड़ हो
और उसकी ही हो आवाज़

प्रेत को पता है
कि उसको मारने के लिए
किसी को बहुत बड़े हथियार की आवश्यकता नहीं
उसे तो उँगलियों के ज़ोर से ख़त्म किया जा सकता है
इसीलिए उसने मौजूद ज़्यादातर हाथों में
चमचमाते हथियार थमा डाले हैं
ताकि लोग एक-दूसरे की गर्दनें काटते रहें
और उँगलियों की धार से हमेशा अनजान रहें
फ़िलहाल सिर्फ़ प्रेत जानता है—
उँगलियों की उपयोगिता।


नीरज की कविताएँ ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह दूसरा अवसर है। ‘सदानीरा’ पर पहली बार प्रकाशित होने से ज़्यादा मुश्किल है, ‘सदानीरा’ पर दूसरी बार प्रकाशित होना। इसके बाद ‘सदानीरा’ पर बार-बार प्रकाशित होना सरल हो जाता है और इसके बाद ‘सदानीरा’ से रचनाएँ हटवाकर शहीद हो जाना भी। बहरहाल, नीरज की यहाँ प्रस्तुत कविताएँ जीवन-संघर्ष और प्रतिकार के वास्तविक अर्थ के साथ इस काव्य-दृश्य में प्रकट हैं। कवि से और परिचय के लिए यहाँ देखिए : पुरातत्त्ववेत्ता भरभराकर रो पड़ेगा उसमें बची जीवटता देखकर

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