कविताएँ ::
कमल जीत चौधरी

कमल जीत चौधरी

आँखों के लिए

आँखें सभी को हासिल रहीं

तुम्हें यह भी भान रहा
आँखों को आँखें सुंदर करती हैं

एक पत्ता टूटा मेरी शाख़ से
और नज़दीक के दूर चला गया

नज़दीक के दूर जा चुकी आँखों ने
उस पत्ते में देखना देखा
देखकर कहा :
आँखों को आँखें सुंदर करती हैं
नज़दीक के दूर जा चुकी आँखों को
और भी ज़्यादा।

पहली संतान

पहला चुम्बन माथे पर लिया
दूसरा कान पर
तीसरा होंठों पर
इस तरह हमारा अज़ल हुआ
इस यात्रा का अनंत
तुम्हारी नाभि में
फूल विसर्जित करके हुआ
अब उठकर जा रहा हूँ
पीछे करुण-ममत्व सुन रहा हूँ :
मिर्ज़ा, तुम मेरी पहली संतान हो।

बात

बहुत पुरानी बात है
पुरानी बुराई से लड़ा
और
लड़कर
नई बुराई को चुन लिया

बहुत पुरानी बात है
पुरानी घृणा को छोड़ा
और
छोड़कर
नई घृणा को चुन लिया

बहुत पुरानी बात है
पुरानी ग़ुलामी से पिंड छुड़ाया
और
छुड़ाकर
नई ग़ुलामी को गले लगा लिया

बहुत पुरानी बात है
पुराने अँधेरे में
एक दीया जलाया
और जलाकर
नया अँधेरा तलाश लाया

बहुत पुरानी बात है
और
एकदम नई बात भी यही है…

आलू

इसकी क़ीमत आमतौर पर इतनी कम थी
कि यह मंडियों तक ले जाने का
ख़र्चा भी नहीं मोड़ पाया
बिना किसी आंदोलन का हिस्सा बने
यह हर साल सड़कों पर कुचला गया

आपके लिए जो आलू है
मेरे लिए एक पर्दा था
जिसे बिना दरवाज़े वाली मेरी चौखट से
एक मालिक सरकार ने गाली देते हुए खींच लिया
मेरे छोटे-छोटे बच्चों ने भी
उस गाली को साफ़-साफ़ सुना

देर रात कुंडा खड़काने वाले मेहमानो,
आपने कुछ सुना?

चुनाव

उसकी पाँच किताबें
एक ही प्रकाशक से छपकर आईं
जिसे स्वयं का भी प्रतिपक्ष बने रहना था
उसने विपक्षमुक्त होना चुना

पाँच दलों में रहकर
वह पाँच बार चुनाव जीता
हमने चुनना था लोकतंत्र
हमने बार-बार उसका जीतना चुना।

फूलों के घोड़े

मिट्टी पर मिट्टी लीपते हुए
पीठ पर पानी के भाव लिखते हुए
अपने नाक-मुँह से बहते ख़ून से बेपरवाह रहकर
गीतों की सान पर भाल तेज़ करते हुए
लौ की आँखों में सुरमा डालते हुए
घुटने टेक दिए…
उसने घुटने टेके इस तरह
कि आसमान में फूलों के घोड़े हिनहिनाए…

परछाईं

परछाई एक ही रंग की होती है :
हमारा प्रेम तो एक चित्र है
बहुत निकट
बहुत छूटा हुआ
बहुत छोड़ा हुआ
बहुत जोड़ा हुआ भी…
हम हर दिन एक चित्र के हुए
हमें हर रंग ने चुना
एक दिन हम वहाँ पहुँच गए
जहाँ देखते ही देखते आग उगलती बंदूक़
चिड़िया बनकर उड़ गई।

भटका हुआ कवि

जिस कविता पर
कवि को गोली मारी जा सकती थी
उसे सुनकर ताली बज उठी
वाह! कहने के बाद उसने कहा—
ज़रा भटक गया है
मगर लिखता बहुत सुंदर है
इसे जिस दिन भी सुन या पढ़ लेता हूँ
उस रात नींद में भी जागता रहता हूँ
यह भटका हुआ कवि मुझे
खाट पर खाँसती
मेरी पैतृक मिट्टी के पास ले जाता है।

सूचना-तंत्र

ट्रांसफ़र ऑर्डर आने वाला है
प्रधानाचार्या आज छुट्टी पर हैं
विद्यार्थियों को मास प्रोमोशन दिया जाएगा
आठवें वेतन आयोग में फ़िटमेंट-फ़ैक्टर लागू होगा
अँग्रेज़ी वाली मैडम हिंदी वाले सर की गाड़ी में आती है…
ऐसी ख़बरें बहुत बड़ी थीं

बस हत्या ही कोई समाचार नहीं थी।

पता

तुम्हारी ज़बान पर
जितनी और जैसी गालियाँ थीं
वे मेरा नहीं
तुम्हारा पता थीं
उस पते पर तुम्हें
तुम्हारे गिर जाने का तार लिख रहा हूँ
इसे
पढ़कर
मेरे बारे में
तुम्हारी जो भी राय बनेगी
वह तुम्हारा अगला पता होगी

और मेरा पता
स्मृतियों का प्रवेश-द्वार है
जिस पर लिखा है :
क़ासिद का घर।


कमल जीत चौधरी समकालीन हिंदी कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनसे और परिचय के लिए यहाँ देखिए : कमल जीत चौधरी

3 Comments

  1. Author Niena Andotra Niena अप्रैल 23, 2026 at 3:35 अपराह्न

    कमलजीत जी हमेशा की तरह शानदार लिखा है

    Reply
  2. Satish Kumar अप्रैल 24, 2026 at 3:17 पूर्वाह्न

    Bahut sunder Kamal bhai ji

    Reply
  3. प्रदीप कान्त अप्रैल 27, 2026 at 2:45 अपराह्न

    कमलजीत की यह कविताएं हमारे समय का भी बयान हैं और अपनी स्वयं की जद्दोजहद का भी

    Reply

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