कविताएँ ::
वियोगिनी ठाकुर

मनुष्य होना
मनुष्य होना कितना यातनामय है
फिर भी मनुष्य होते हैं संसार में
नष्ट होती मनुष्यता के बीच
बचे रहते हैं वे
भागते नहीं उल्टे पाँव
मुँह नहीं छुपाते
यातनाओं की शरणस्थली बनते हैं
जैसे दीमक की शरणस्थली बनते हैं
सूख रहे वृक्ष
किताबें और किवाड़
खोखल और चूर होकर भी
वे भरते हैं उनका सूनापन
उनकी लपलपाती जीभें महसूस करते हैं
अपने भीतर और भीतर और और भीतर
अंत तक
अभी-अभी जन्मे शिशु-सी
रक्त-गंध से सने रहते हैं।
जिसके इतने सुंदर थे स्तन
कितने वर्ष पूर्व की वह बात है
शायद पंद्रह या बीस
फिर भी भूलता नहीं है मन
नहान-घर के खुले चबूतरे पर
नहाते देखा था उस स्त्री को
बिना किसी आड़ के
थोड़ी देर पहले जो आँगन लीपकर उठी थी
जिसके इतने सुंदर थे स्तन
जैसे मूर्तियों के होते हैं
इतने गोल, भरे और कसे हुए गदबदे,
आकर्षक और गोरे
कि लगता था मानो समय भी
उन्हें छूना भूल गया हो
कहीं एक खरोंच नहीं,
छुअन का एक दाग़ तक नहीं
जिन पर
वे ऐसे सुंदर थे
जैसे होते हैं
अनछुए और भोले कबूतर
जबकि कई संतानों को जन्मा था उसने
मिटाई थी उनसे जिनकी बुभुक्षा
पोसा था बरसों तक
जिन पर अपने शिशुओं को
फिर भी वे ऐसे थे सुंदर कि
नज़र बँध जाती थी
जवान संतानों
नाती-पोतों और बहुओं से घर भरा था उसका
महज़ पेटीकोट पहने बैठी थी जो नल के नीचे
मुल्तानी मिट्टी की गंध में सने
गीले बालों का सिर पर बनाए हुए जूड़ा
कान में उँगली डाल निकालती थी
साबुन का झाग
मल-मलकर धोती थी देह
बेख़बर थी इससे कि टकटकी बाँधे
आँखों से पी रहा है कोई
वह छलकता हुआ सौंदर्य
अधेड़ उम्र को लगभग लाँघ चुकी
उस स्त्री को देखता है ऐसे
और अचरज से भर उठता है
इस पर भी कि चबूतरे पर झुके
अड़हुल के फूल-पत्तों की परछाइयाँ
उसकी देह पर तैर रही हैं
और उनसे छनकर आती
धूप के असंख्य कण
कितना अपूर्व बना रहे हैं
उसका सौंदर्य!
वह मौसम
वह मौसम खो गया
जिसमें उतरती थीं कविताएँ
कचनार के फूलों की तरह
और वह मन भी
जो प्रेम करना जानता था
आँखों को सौंदर्य
अब उस तरह नहीं बाँधता
जैसे रोक लेता था पहले
किसी चुंबकीय शक्ति-सा सहसा
कितना मगन रहता था मन
उम्र की उठान के उन दिनों में
और कितना मीठा भी
कुएँ के जल की तरह
व्याकुलताओं के अंधड़ के बावजूद
यह अलग बात कि
बाजरे के पके खेत का ताप
और उसकी गंध अब भी याद है उसे
और ज्वार की बालियों का
हवाओं में नाचना भी
बबूल के काँटों पर
ओस की बूँदों का ठहरना
मन में दीवार पर टँगे किसी चित्र-सा
दिखलाई पड़ता है अब भी
पर कौतुक नहीं रहा पहले-सा
उल्लास के क्षण
किसी और जन्म में
जिए हुए जान पड़ते हैं
स्मृतियों की भीत से टेक लगा
देखते हैं हम पीछे
यह जानते हुए भी कि
पीछे जाना क्या लौटा सकता है वापस
आदमी जब भी जाएगा पीछे
खोलेगा वह संदूक़ची
जो उसके लिए वक़्त ने जमाई है
जो पूँजी है जीवन की
पर पकड़ में नहीं आती
उड़ती रहती है मन के आसमान तले
हवा के झोंकों में जिस तरह
उड़-उड़कर आते हैं खंक हुए पत्ते
वह ऐसे ही हमसे टकराती है औचक!
खोलेगा जब भी वह उसे
कितना कुछ पाकर भी ख़ाली हाथ ही आएगा
धूल झाड़ता हुआ।
मक़बरे की याद
कितनी उदासी थी
जो मक़बरे के ऊपर दिखती थी
दिसंबर की शामों में
कबूतरों के संग नाचती हुई
कोहरे की घिरती चादर के साथ
जो और गहराती जाती थी
उस मक़बरे का ख़याल
जब-तब चला आता था मन में
भरी जवानी के उन दिनों में
उसे देखते या न देखते हुए भी
वह बना रहता था संग-साथ
सोचती थी तब अक्सर
अगर यह मक़बरा न होता
तो इन असंख्य कबूतरों का
कहाँ होता ठौर
और कैसे होता गुज़ारा
मेरा बेचैनियों से भरे इस शहर में
जिसकी गलियों की गंध
मुझे बावरा बनाए रहती है
यों कि जैसे भीतर से
किसी से निकाल लिया हो कुछ
जिसे खोजती हूँ चौतरफ़ा
मगर थाह नहीं पाती हूँ
रातों को जागती
तो उसका चित्र उभर आता था आँखों में
कितनी शामें उसे देखकर गुज़ारी थीं तब
दिसंबर की उन कथित उदास शामों में
जो किसी बाज़ की तरह
मुझसे होकर गुज़रती थीं
मारते हुए झपट्टा
नोचते हुए मांस
किराये के उस घर में नीचे से
माँ लगाती रहती थीं टेर
रोटी खाने के लिए लगाई गई
माँ की वह पुकार
आज भी गूँजती है
मन के ख़ालीपन में
गूँजता है अपना ही नाम
जिस पर तब कान नहीं देती थी
कलेजे में बिंधे काँटों को महसूस करते हुए
बहाते हुए आँसू चाँदनी रातों में
घिरते हुए कोहरे के बीच ठंडा माथा
और अकड़ी हुई देह लिए
बैठी रहती थी घंटों
दीवार से टेक लगाए
उस मक़बरे को निहारते हुए
जो मुझे मेरे जैसा ही
उजाड़ और उदास दिखलाई पड़ता था
उजाड़ फिर भी बसा हुआ जैसे…
घर की याद
अब जब घर से इतनी दूर हूँ
तो भुने हुए आलुओं की याद आती है
और शकरकंद की मिठास भी
याद आती हैं बाजरे की रोटियाँ पकाती हुई माँ
चूल्हे की आँच में चमकती उनकी चूड़ियाँ
जिसे वह बार-बार कलाई पर कस लेती थीं
ढीली होने पर
और फूँकने लगती थी चूल्हा फुँकनी लेकर
आटा सने हाथों से
जूट के बोरे पर उनके बराबर बैठकर
पिता दिखाई देते हैं रोटी खाते हुए
दिखाई देता है उनकी थाली में परोसा हुआ साग
चौके की छत पर पड़ी टीन से टपकती ओस
गुलदाउदी के फूलों को भिगोती हुई
अब जब घर से इतनी दूर हूँ
घर कितना याद आता है
वह सब जिसे रोज़ देखा करती थी
मगर ऐसे नहीं
जैसे देख पाती हूँ अब
माँ-पिता, आँगन, घर के दर-ओ-दीवार याद आते हैं
याद आता है दीवारों से उखड़ता हुआ प्लास्टर
सूखती हुई बेल
और खिलते हुए फूल याद आते हैं
याद आता है अपना किताबों से भरा कमरा
याद आते हैं रास्ते और नदी और तालाब
खेतों में झूमते और सर्दियों की ओस से भीगे हुए
सरसों और गेहूँ के खेत
आसमान में उड़ते चरिंद-परिंद तक
किसी चलचित्र से उभर आते हैं जब-तब
याद आती है अपने गाँव की मिट्टी
तो लगता है जैसे
वहाँ की सड़कों पर उड़ती धूल
तक पुकारती होगी मुझे…
चाहने न चाहने के बावजूद
गहरी नींद में अचानक आँख खुलती है ऐसे
जैसे कोई सोया प्रेत जाग जाता है बरसों बाद
और वह जगह याद आने लगती है
दूब, उपलों, अरहर के छपरों, आम के पत्तों
और आक के पौधों से भरी हुई
जो अब महज़ स्मृति है
बिना एक इंच भी हिले-डुले
हरी है और भरी है
कैनवास पर उकेरा गया कोई चित्र जैसे
सजीव न होकर भी
उसका आभास देता हुआ भरपूर
हमारी स्मृति में जैसे बने रहते हैं
पुराने ढब के घर
उजड़ जाने या उजाड़ दिए जाने के बाद भी
बरसों-बरस
अटारी की खिड़की पर टँगा
धूल से बदरंग हुआ परदा
हिलता रहता है बरसों
अटारी, खिड़की और परदा
कहीं नहीं रहने के बावजूद
बैंजनी फूलों की छाँव तले बने
चींटियों के बिल के
आख़िर क्या मायने हैं?
क्या मायने हैं कि
वे याद आएँ अधरात
याद आए मूँगफली के खेत के
बीचो-बीच बैठा हुआ खरहा
याद आएँ उसके कान या हवा में हिलते रोएँ
या याद आए सिर के ऊपर गुज़रते कौवे की उड़ान
न कि नीले आसमान तले बगुले की
भरी हुई नाली से उठती
दुर्गंध के भभके की याद आए
न कि भुनी हुई शकरकंद की
या ज़ंग लगे बेकाम हुए उस नल की
जिसके पानी की याद
अभी तक गले को तर किए है
जबकि उजाड़ हुए उस नल के चारों ओर
न जाने कबकी उग आई है जंगली घास
बरसों पहले खो गए हँसिए की याद
जिसे माँ पत्थर से धार देती थीं
और पाँव के पंजे में दबाकर
काटा करती थीं साग
(माँ भी तो अब वैसी नहीं हैं—
गुलाबी किनोर की साड़ी पहने गदबदी और युवा)
या घर के खोए हुए सबसे धारदार खुरपे की याद
धरती में जिससे सूरजमुखी के बीज बोए थे अंतिम बार
बंदगोभी या गाजर के खेत की याद
याद हवा में फ़स्ल के झूमने की
या कि नीम से पीले पत्ते झरने की
या कि बरसों पहले चोरी हुई खटारा साइकिल की
बताती है—
जीवन ऐसी तमाम चीज़ों से ही नहीं भरा
जिन्हें मन भीतर सँजोए रहते हैं हम
देते हैं ठौर बड़े मन से
बल्कि अनगिन ऐसी चीज़ों से भी भरा हुआ है
जिन्हें हम देखते हैं
उथली आँख और उथले मन से
बरतते हैं ऐसे
जैसे स्वार्थ के लिए
इंसान होकर भी इंसान को बरतते हैं
और बढ़ जाते हैं जीवन में आगे
फिर भी वे हैं भरपूर अपने होने में
घेरती हैं जगह हमारे जीवन में
बनी और बची रहती हैं
हमारे चाहने न चाहने के बावजूद!
प्रेम से भरा मन
प्यार करने का कोई कारण न था
कोई चेहरा नहीं था
कोई शक्ल-सूरत
कोई आवाज भी नहीं
महज़ एक परछाईं थी धुँधलाई हुई
जो साथ-साथ चलती थी
उठाती थी मन में हूक
बेचैन किए रहती थी
उम्र का वह उठान
आवेग से भरा वह मन
बेचैनियों की वह नदी
अब सब कितने पीछे छूट गए हैं
इतने कि पलटकर देखने पर
मन में हौल उठता है
जो गँवा आए बढ़ती उम्र के साथ
उसे कभी पाया नहीं जा सकता है दुबारा
सिवाय स्मृतियों के
और स्मृतियों में भी वे दिन
उस तरह कहाँ लौटते हैं!
सूरज को ताकने के दिन
साँझ को रात में बदलते देखने के
दिन परछाइयों के पीछे भागने के
किशोर-वय के वे तमाम दिन पीछा करते हैं ताउम्र
हर बार लौटते जाड़ों में लौट आते हैं वे भी
गहन रात्रि सिरहाने रखे सेब से महकते हैं
बीते दौर की शामें फिर जाग जाती हैं
जीवन और स्मृतियों में
जीवंत हो उठती हैं
कैसे!
सिर के ऊपर से गुज़रते हैं परिंदे
अबाबील और बगुले
गाढ़ी होती साँझ को
उदासी और अधूरेपन से भर देते हैं
हवा भी लौट आती है बार-बार
बीते दिनों की याद लिए
सहलाती और छूती है
उस तरह कभी
जैसे बरसों पहले छुआ था
दिलाती है याद
कि जीवन पाने से अधिक खोने के लिए है
और जो खोते जाते हैं हम हर क्षण
हर बीतते दिन के साथ
उनमें सबसे पहले खोता है प्रेम
प्रेम से भरा वह मन
जिससे न्यारा इस जीवन
इस संसार में
और कुछ भी नहीं हुआ है।
उन्होंने भी दिए
उन्होंने भी दिए कुछ सुंदर पल
कुछ सुखद स्मृतियाँ
अपनत्व से भरा मन
भले ही क्षणिक
कभी-कभार नमक की डली
और गुड़ की भी
जल-सा निर्मल मन लेकर आए
वे भी कभी-कभी
सुबह की धूप-सा उजला
फूल-सा खिला
वर्षा-सा धुला
आसमान में उड़ते परिंदों की उजली डार-सा
विस्मय की तरह कौंधते हैं
वे क्षण
वे स्मृतियाँ
जिसमें तरल था मन
यहाँ से वहाँ तक
और कितना निष्पाप
कि लेने की नहीं
देने की चाहना से भरा था
गले तक
उलीच देने की चाहना से भरा था मन
वह कोमलता याद करती हूँ किसी-किसी क्षण
छज्जे पर फड़फड़ाते परिंदे-सी चली आती है
याद…
काटती है चक्कर
यहाँ से वहाँ तयशुदा दायरे में
दिलाती है याद कि
वे भी तो मनुष्य ही हुए
अपनी तरह के
जिन्होंने तोड़ा मन
घाव दिए जिन्होंने
उन्होंने प्रेम भी तो दिया था कभी
भले ही क्षण भर को अनजाने में
प्रेम से भरे मन को
प्रेम की ही याद आती है जाने क्यों
घाव की नहीं आती है उस भाँति
जो बैठी रहती है काँधे पर
सफ़ेद कबूतर-सी देर तलक।
मार्च की दुपहर
मार्च की एक दुपहर भोजन करते हुए
अचानक से एक दृश्य उभर आता है अतीत का
और उँगलियों में फँसा रह जाता है निवाला
जाने वह अतीत का है भी या नहीं
मगर दिखलाई पड़ने लगता है
कलेजे में हूक उठाता हुआ
पेड़ों से पत्ते झर रहे हैं नीम के
कुआँ जो लबालब भरा था कभी
उसमें अब भी जल बचा है थोड़ा-सा
बची है शीतलता अब भी उसके इर्द-गिर्द
किसी कृत्रिम झरने से उठने वाली पानी की गंध
पूरे चेहरे पर महसूस होती है ऐसे
कि उसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता
कबूतरों की फड़फड़ाहट और बढ़ती उमस
पेड़ों की बड़ी होती परछाइयाँ
और छोटी होती हुई भी
उड़ती हुई धूल चौरस्तों पर
पैरों तले कुचली हुई घास जो अब भी हरी है
घायल परिंदा और घायल स्त्री देह
पड़े हैं ज़मीन पर चुआते हुए लहू
जो हिल-मिल गया है आपस में
मिट्टी में पसरी है उनकी चौतरफ़ा गंध
चल रहा है संसार का कारोबार बिना रुके
उसे इनकी भनक तक नहीं है
दृश्य अधूरा है
यह कहीं कुछ भी साफ़ नहीं
मगर मथता है मन को
और कौर छूट जाता है!
लौटना
कौन पुकारता है पीछे से
किसी अदृशय डोर-सा खींच लेता है
अचानक
दृश्य पर दृश्य नाच उठते हैं ऐसे
मूँदने पर आँखें जैसे रंग नाचते हैं
कड़ी धूप में
पेड़ पर फड़फड़ाती कोई अटकी हुए पतंग
चाहती है कि पलटकर देखो तुम पीछे
बीच वसंत में ठहरकर देखो
पाकड़ के शुआपंखी पात
सीने के आस-पास मचलती
गरम हवा को महसूस करो
महसूस करो उसके थपेड़े अपने गालों पर
और क्षण भर को छुरछुरी से भर जाओ
देखो पैरों तले गरम होती हुई रेत
चलती हुई दुनिया को ठहरकर
देखने की बात कौन करता है
जबकि कोई नहीं करता
कौन कहता है कि रुको-थमो कुछ देर
जबकि कोई नहीं कहता
कोयल की करुण पुकार-सा
कौन मन को भीतर तक बींध लेता है
यह सम्मोहन कहाँ से जागता है
मनुज के मन में
घेरता है, टेरता है, बाँथता है अचानक
जैसे कोई ख़ज़ाना गड़ा हो पीछे
जिसे देखना ज़रूरी है
और उस तक लौटना भी बार बार।
पीड़ा-प्रेत
स्त्री जितनी जल्दी जवान होती है
उतनी ही जल्दी ढल जाती है काया
बता देना चाहती हूँ तुम्हें
सत्यानाशी के रास्ते से गुज़रते हुए कि
सबसे मीठी हवा के बीच झर जाएँगे वे फूल
जो कुछ दिनों पहले सबसे अधिक कोमल थे
और भारहीन तितली के नाज़ुक पंखों-से
बिखर जाएगी पंखुड़ी-पंखुड़ी
रक्त में सने काँटे-सी चुभती है यह रात
हर रात, कल की और बीते कल की भी
और उससे भी कई-कई रोज़ पहले की
मुँह बाए खड़ी है समक्ष
निविड़ एकांत में उठ बैठते हैं सहसा
कलेजे से लगकर सोए पीड़ाओं के प्रेत
और कर लेते हैं
अबोध प्रेम के शावकों का भक्षण
चरते हुए नरम दूब जो नहीं देख पाते हैं
अपनी भोली आँखों से
मृत्यु का चरम क्षण
और उनका ग्रास बन जाते हैं
मेरे भीतर जन्मते हैं दोनों
हर अर्धरात्रि घटता है
यह रक्तरंजित दृश्य
यह जो इतना दैनिक है
कि मैं इसे अधूरा छोड़ देखती रहती हूँ
समय किस तरह भोगता है मुझे
कैसे गुज़रता है जीवन का हर दिन
देखती हूँ निरावरण होकर
कि किस तरह बनते
और छूटते जाते हैं
भीतर-बाहर उसके चिह्न
दृश्य, स्वप्न, कल्पना, उम्मीद, अवसाद, प्रेम
और बाँकपन की सबसे नरम स्मृतियाँ
पाकड़ के नवजात पत्तों-सी
सुकोमल और तोतारंगी
पीछे छूट रही हैं
और छूट रहा है स्मृति-वन भी
जिसने मुझे जीवन से भरा
और गहरे मृत्युबोध से भी
किस तरह गुज़रती है जीवन की रेल
सुनाई पड़ती है उसकी
धड़-धड़-धड़-धड़-धड़-धड़…
मुँदी आँखों में सिर्फ़ एक चाहना जागती है
जबकि मेरे पास अब कोई गुलाबी गद्य नहीं है
जो प्रेम और उम्मीद से भरे
और काट सके अवसाद के पारदर्शी और घने जाले
फिर भी हूँ ऐसी मोह से भरी कि चाहती हूँ
सूखे पपड़ाए होंठों पर गिरे वर्षा की एक बूँद
फिर भले मर जाऊँ प्रेम की प्यास लिए समूची!
वियोगिनी ठाकुर [जन्म : 1992] की कविताएँ ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह दूसरा अवसर है। आज से लगभग साढ़े चार वर्ष पूर्व उनकी ग्यारह कविताएँ ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित हुई थीं। इस अंतराल में उन्होंने उस टिप्पणी को पूरी तरह बदल दिया है, जो तब उनकी कविताओं के अंत में ‘सदानीरा’ पर दी गई थी। उस हो चुकी टिप्पणी और इस हो रही टिप्पणी के बीच वियोगिनी ठाकुर का लेखन हिंदी-दृश्य में भरपूर प्रकाशित हुआ है। उनके नाम तीन कविता-संग्रह—‘लड़की कैक्टस थी’, ‘मैं किसी कालिदास की मल्लिका नहीं’, ‘किसी परिदृश्य में नहीं हूँ’; ‘दूसरा प्यार’ शीर्षक से एक उपन्यास और कथेतर गद्य की एक पुस्तक ‘नीम के झरते हुए फूल’ दर्ज है। उनकी यहाँ प्रस्तुत ग्यारह नई कविताएँ उन्हें एक विशिष्ट कवि के रूप में सामने लाती हैं। उनसे viyoginithakur@gmail.com पर संवाद संभव है।