कविताएँ ::
नवीन रांगियाल

नवीन रांगियाल

पुकारना

जिसे पुकारा
वह खो गया

पुकारना
गुम हो जाना है

मैंने कहा सफ़र
सड़कें गुम हो गईं

नदी कहा
मैं डूब गया पानी में

मैं बहुत ऊपर तक उठ गया
जब मैंने कहा पहाड़

रंग कहा
मैं सिमट आया आँखों में

मैंने एक बार कहा था दिल
बहुत सारे घाव लिए खड़े थे चाक़ू

प्यार कहने पर
तुम चली गईं

मैंने कहा तुम्हारी याद
गुम हो गया मैं

मैंने सुना एक बार नाम तुम्हारा
लेकिन पुकारा नहीं

मैं नाम को तुम्हारे देखता हूँ
बस देखता ही रहता हूँ

और उसे खो देता हूँ

सारी देह को समेट कर
जब वह उठती है बिस्तर से

हेयर बैंड को मुँह में दबाए
अपने सारे बालों को बाँधती है
तो उसकी गर्दन में याद आता है
मंदिर का गुंबद

रात भर से जागी
थकी हुई उसकी मदालस आँखों में
शि‍व ने फूँक दी हो
अपनी निगाह जैसे

सोचता हूँ अपने जूड़े में
कितना कसके बाँध लेती है
वह अपनी आवारगी

अपने टूटे हुए बालों में
चुनती है एक-एक लम्हे
जो इसी रात
टूट कर बिखरे थे
इधर-उधर

जैसे शि‍व बि‍खेरते हैं
और फिर समेटते हैं ये सृष्टि
बनाते हैं
फिर मिटाते हैं

हमारी दुनिया बनती है
बनते-बनते रह जाती है

उस क्षण
कितनी चाहत भरी थी
तुम्हारी देह में

कि‍तना शोर था मेरे हाथों में
चाहत और शोर के इस द्वंद्व में
मै बार-बार बिखरता और सँभलता हूँ
उसके साथ

वहीं उसके क़रीब
इस बिखरी हुई दुनिया में
अपने आज्ञाचक्र पर
टि‍क कर बैठ जाता हूँ

उसके प्यार में
पा लेता हूँ अपना ईश्वर
उसे खो देता हूँ

एक दिल को कितने घाव चाहिए

मैं जितनी देहों को छूता हूँ
दुनिया में उतनी याददाश्त पैदा करता हूँ

जितनी बार छूता हूँ देह
उतने ही हाथ उग आते हैं
उतनी ही उँगलियाँ खिल जाती हैं

मेरी सारी आँखें रह जाती हैं
दुनिया में अधूरी

समय के पास जमा हो चुकी
अनगिनत नज़रों को
कोई अनजान आ कर धकेल देता है
अँधेरे में

सारे स्पर्श गुम हो जाते हैं
धीमे-धीमे
मैं हर बार देह में
एक नई गंध को देखता हूँ

नमक को याद बना कर
अपने रूमाल में रखता हूँ
प्रतीक्षा करता हूँ
बहुत सारे रास्ते बनाता हूँ
कई सारी गालियाँ ईज़ाद करता हूँ

मेरी दुनिया में कितने दरवाज़े
और खिड़कियाँ हैं
बेहिसाब छतें भी

बादल फिर आते हैं धोखे से
फिर से घिरती हैं घटाएँ
फूल, हवा, ख़ुशबू और प्रतीक्षाएँ दोहराते हैं
फिर आते हैं
फिर आते हैं सब
फिर एक ग़ुबार उठता है
एक आसमान उड़ता जाता है ऊपर

नीले दुपट्टे उड़ते हैं हवा में

कितनी ही दुनियाएँ पुकारती हैं
मुझे अपनी तरफ़

कितने ही हाथ इशारा करते हैं
कितनी ही बाँहें बुलाती हैं

एक आदमी के दिल को कितने घाव चाहिए
कितनी याददाश्त चाहिए

फिर भी इस दुनिया में
मैं एक पूरा आदमी नहीं
मैं बहुत सारे टुकड़े हूँ

जितनी बार मिलता हूँ तुमसे
उतनी बार अकेला रह जाता हूँ

गुमनाम पुल अच्छे थे

गुमनाम पुल सबसे अच्छे थे
जिन्होंने सबसे जर्ज़र और ख़तरनाक होते हुए भी
उन्हें सुरक्षित रखा जो यहाँ आए
और अँधेरों में घंटों बैठे रहे
उनके वादों को याद रखा
उन्हें अपनी आदिम दीवारों से सट कर
खड़े रहने के मौक़े दिए

ज़ंग लगी लोहे की कमज़ोर जालियाँ अच्छी थीं
जिनसे उड़ कर ज़्यादातर मुर्ग़ियाँ
भागने में कामयाब रहीं

वे सारी बरसातें अच्छी थीं
जिनके थमने पर
मज़दूर काम के लिए निकले
और लड़कियाँ अपने प्रेमियों के साथ
भीग कर घर लौटीं

सारे बेनाम पेड़ सबसे सुंदर थे
जिनकी टहनियों पर हमने
कुरेद कर अपने नाम लिखे

वे सब जगहें अच्छी थीं
जहाँ-जहाँ हमने हाथ पकड़े

अँधेरे अच्छे थे
जिन्होंने पहली-पहली बार
चूमने के मौक़े दिए

सारे फूल अच्छे थे
जिन्हें उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़
कभी अर्थियों पर रखा गया
कभी देवताओं के सिर पर

सबसे अच्छा था
तुम्हारा निर्ममता के साथ चले जाना
और पीछे मुड़ कर नहीं देखना

तुम्हारे जाने के बाद ही मैंने इंतज़ार सीखा
देर तक एक ही जगह पर खड़े रहना सीखा

मुझे पसंद है
तह करके टेबल पर रखे हुए रूमाल
जिन्हें देख कर मैं सोचता था
तुम वापस आओगी
और मेरी ज़िंदगी को ठीक करोगी

अगर तुम पूछो मुझसे
मुझे सबसे ज़्यादा क्या पसंद है
मैं कहूँगा
मुझे सबसे ज़्यादा
तुम्हारी पीठ अच्छी लगती है

मैं जानता हूँ
मुझे सबसे ज़्यादा
जी भर कर उसी ने चाहा

सबसे ज़्यादा पसंद है
तुम्हारी चुप-चुप आँखें
और कुछ भी नहीं सुनता हुआ तुम्हारा दिल

जिस वक़्त तुम्हारी आँखें कुछ नहीं कहती हैं
और दिल चुप रहता है
उस वक़्त मैं अपने हाथ में
प्यार की लकीर ढूँढ़ता हूँ

सोचता हूँ तुम्हें प्यार है या नहीं
प्यार है भी या नहीं

दिल जानता है
वह प्यार करते वक़्त नहीं
सबसे ज़्यादा
प्यार को ढूँढ़ते हुए धड़कता है

मीटर गेज की रेल

हुज़ूम भर कर लोगों को खा जाती है रेल
अबूझ और गड्डमड्ड शब्दों की एक लंबी फ़ेहरिस्त है

आवाज़ों के साथ ऐसे चलती है रेल
जैसे किसी कारख़ाने में शब्दों की छपाई हो रही है

समुद्री सतह से चालीस हज़ार मीटर ऊपर
चलता-फिरता छापा-ख़ाना है रेल का चलना

अर्थहीन शोर का शब्दकोश तैयार हो जाता है कंपार्टमेंट में
अजीब-अजीब आवाज़ें उफनती हैं
फिर खिड़कियों के बाहर गुम हो जाती हैं हवा में
जैसे ज़िंदगी की तरह सफ़र भी बोझ है कोई
उन्होंने यूँ पटक रखा है ख़ुद को सीट पर

डिब्बों में आते रोशनी के धब्बों में
ऊबड़-खाबड़ चेहरे उभर आए हैं

रात पीछे छूटती है
और चाँद सिर पर आता है
तब मुक्तिबोध याद आते हैं

पेशाबख़ाने के पास अपनी ही देह में
छुप कर बैठे हैं बेटिकट लोग
वे दुबक कर बैठे हैं
वे रेल को अपने ऊपर एहसान मानते हैं
लोग उन्हें उलाँघ कर जाते हैं
फिर आते हैं
हथेलियों के पीछे छिप कर पसर जाती हैं उबासियाँ
सुस्त चेहरों पर उतर आती हैं थकी हुई आँखें
गर्दनें झुक कर झटके खाती हैं बार-बार
देह और ज़्यादा लिप्त हो जाती है
भोर के आलस्य में

लोहे की गंध के साथ
मैं उस औरत को देखता हूँ
जिसने अपना आँचल छुपाने के लिए
साड़ी को दाँत में दबा रखा है
वह एक आँख से बहती नदी को देखती है बाहर
एक आँख से झपकी लेती है

कल रात आया था
अधूरी नींद का देवता
और शाप दे कर गया था :
यात्रा में इतनी ही नींद प्राप्त हो सकेगी तुम्हें
रूमाल रख कर बचानी होगी अपनी जगह
या कुली को देना पड़ेगा सीट रोकने का ठेका
इस यात्रा में कम होते जाओगे तुम दिन-ब-दिन
एक शहर पीछे छूट जाएगा
एक मिलेगा नया-नया
आधा और अधूरा होगा सब कुछ
आधी-आधी रोटी
टिफ़िन से छलकती हुई आधी दाल
थोड़ा-सा अचार
सीट पर ज़रा-सी जगह
सिर टिकाने के लिए एक अनजान कांधा
और आधा कप चाय
दुनिया उतनी ही मिलेगी
मीटर गेज की रेल की खिड़की के फ़्रेम जितनी
उतनी ही ज़िंदगी
जितनी एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन की दूरी

थोड़े-थोड़े अंतराल पर
हम्मालों की तरह खड़े स्टेशन आते हैं—
पीरझालर
नौगावाँ
फ़तेहाबाद

रेल आते ही कोयलों की तरह
झोंक दिए जाते हैं आदमी
फिर उतार दिए जाते हैं
किसी गुमनाम स्टेशन पर

दिल

दिल कोई घोड़े की नाल नहीं
कि हर वक़्त टक-टक टक-टक करता रहे

उसे नाज़ुक टहनियों की तरह होना चाहिए
ठीक उन पेड़ों की तरह
जो तमाम घावों को भूल कर
कुल्हाड़ियों के हत्थों में तब्दील हो जाते हैं

जो प्यार नहीं मिल सका
उसे किताब की तरह बरतना ही ठीक है
उसके पन्नों को मोड़ कर सिरहाने रख लेना चाहिए
अधूरे स्वप्न ऐसे ही
तकिये के नीचे दबा कर रखे जाते हैं
उन्हेंस आँसुओं से हरा-हरा
नर्म-नर्म किया जा सकता है

ऐसे सपनों को सुबह-सुबह
हेयर ड्रायर से सूखने के लिए
तैयार रहना चाहिए

टूटे हुए रिश्ते ऐसे साथ रखना चाहिए
जैसे देवता रख लेते हैं
दुनिया भर की प्रार्थनाएँ अपने ड्रॉअर में

कोई औरत तह करके अलमारी में रख लेती है
अपने मर चुके आदमी की बुशर्ट

लिफ़ाफ़े कभी नहीं जानते
कि उन्हें किसलिए इस्तेमाल किया जाएगा
उनमें प्यार के इज़हार भी हो सकते हैं
और मृत्यु की सूचनाएँ भी

दिल को भी लिफ़ाफ़ों की तरह
ख़ाली-ख़ाली होना चाहिए

आँख को हमेशा राह देखनी चाहिए
यह मान कर चलना चाहिए
कि कोई फड़कता हुआ परिंदा नहीं
दिल एक मरून रूमाल है
प्यार करते वक़्त
उसे सिर पर भी बाँधना चाहिए
और घावों पर भी

बादल हमारे लिए टहलते हैं

तुम्हारा हाथ पकड़ कर चलते हुए
मैंने यह जाना
कि आकाश में बादल
बरसातों के लिए नहीं
मेरे और तुम्हारे लिए टहलते हैं

कोई दिन उग कर वापस आता है
तो उसका मतलब मैं यह निकालता हूँ
कि वह हमारे लिए लौटा है

रात हम दोनों को बाँधने आती है

इतनी बड़ी दुनिया में
मैं सिर्फ़ बादलों के आने-जाने
दिन के उगने और डूबने के बारे में सोचता हूँ
धूप और बारि‍श के बारे में सोचता हूँ
यही वह सब है जो हमारे लिए होता है
दुनिया सिर्फ़ इसलिए है
कि हर शाम को मैं तुमसे मिलने आता हूँ
अगर मैं तुमसे मिलने आता
और तुम मुझे वहाँ नहीं मिलतीं
जहाँ हमारा मिलना तय था
तो भीड़ और आतंक से भरी यह दुनिया
कबसे ख़त्म हो चुकी होती

मिलते रहने से ही दुनिया चलती है

जब घास को धूप से मिलते देखता हूँ
और पत्तों को हवाओं से
जब छाँव मिलने आती है गलियों से
और आकाश को पृथ्वी पर झुकते हुए देखता हूँ
तो सोचता हूँ यह दुनिया तब तक रहेगी
जब तक हम किसी से मिलने जाते रहेंगे

हमारे साल

मैं नहीं चाहता
कि सात जन्मों के फेर में
उलझे प्रेम

मैं फिर से आऊँ
तुम फिर से मिलो मुझे
और हम अनंत तक करें
एक दूसरे की प्रतीक्षा

यह बहुत ख़राब दिखेगा
कि मेरे मर जाने के बाद
मेरी क़ब्र पर तुम
गुलदस्ते रखने आओ हर साल
और कैलेंडर पर चिपकाओ
हमारे पहले चुम्बन की तारीख़ें
डायरी में दर्ज करो मुलाक़ातें

मैं नहीं चाहता
कि तुम याद रखो
सितंबर की किसी शाम में
मेरी हथेली तुम्हारे गाल को
छू गई थी धीमे से

दुनिया में किसी पवित्र अमर-कथा की तरह
न ढोया जाए हमारा प्रेम

—इतना भर चाहता हूँ—

मेरे कमरे के फ़र्श पर बिखरी हो
तुम्हारे नाख़ूनों से कुतरी हुई नेल-पॉलिश
दीवार पर तुम्हारे हाथ के निशान गहरे होते जाएँ
आईने पर चिपकी हों तुम्हारी मरून बिंदियाँ
दराज़ में रखे तुम्हारी आँख के काजल की तरह
कभी ख़त्म न हों हमारे साल

नाख़ून

मैं जिस वक़्त कविताएँ लिखता
वह अपने नाख़ूनों में नेल-पॉलिश लगाती थी

उसने ठीक इसी तरह सीखा मेरी प्रतीक्षा करना
और फिर नाउम्मीद भी इसी तरह हुई

हमने नाख़ूनों से नेल-पॉलिश की ही तरह
आँखों से खुरची उम्मीदें

दोनों के दिल इसी तरह महके
और बुझ कर बेरंग भी हुए

हमने इसी तरह प्रेम किया
नाख़ूनों को रँगने और खुरचने की तरह
लिखने और मिटाने की तरह
किसी दिन मैं लिखता था
किसी दिन वह मिटाती थी

आँगन

कुछ फूल गुलाब के लाए जाएँगे
थोड़ा घी और कर्पूर आएगा
गुलाल उड़ाया जाएगा
चलन से बाहर हो चुके
कुछ सिक्के इकट्ठे किए जाएँगे
आँगन में जलते हुए उपले रह जाएँगे

पंक्ति

एक पंक्ति दूर तक जाती है
किसी नदी
किसी शहर के उस तरफ़
किसी याद के पास
किसी कविता तक

अक्सर भविष्य को लाँघ जाती हैं पंक्तियाँ
जहाँ लहूलुहान पड़ा होता है अतीत
वहाँ तक भी जाती हैं

उस तक नहीं पहुँचती कोई पंक्ति कभी
जिसे प्यार करते हैं हम
बग़ैर किसी भाषा के
बग़ैर किसी दूरी के

सबसे अच्छी कविताएँ
नहीं लिखने में ज़िंदा रहीं
सबसे अच्छा प्यार
नहीं कहने में रहा

टहनी

टहनी से उड़ती है चिड़िया
और गुम हो जाती है बादल में

लोग धीमे-धीमे होते हैं दूर
इसी तरह

गर्म हो कर खिर चुके
पंख की तरह

एक याद रह जाती है
हमारे पास

दिल धड़कता रहता है
जैसे पंजों से धक्का खा कर
टहनी धड़कती रहती है
देर तक


नवीन रांगियाल (जन्म : 1977) की कविताओं के प्रकाशन का ‘सदानीरा’ पर यह पहला अवसर है। उनका गद्य उनकी कविताओं से ज़्यादा उपस्थित और मुखर रहा है। ‘सदानीरा’ पर भी उनके गद्य के दो उदाहरण पढ़े जा सकते हैं। नवीन ज़िंदगी और अदब दोनों में संगीत के समीप रहना पसंद करते हैं। उन्हें हिंदी के चालू संसार ने अपने फूहड़ इशारों से अब तक खींचा नहीं है, जबकि वह लगभग इस सदी के शुरू से पढ़-लिख रहे हैं। वह अपने दुखों में रहते हैं और इस रहने में दुनिया के दख़ल को कम से कम चाहते हैं। उनकी कविताएँ विषय के व्यभिचार से बचकर अपने रचयिता के निजी का पीछा करती रहती हैं। ‘‘इंतजार में ‘आ’ की मात्रा’’ शीर्षक से उनका पहला कविता-संग्रह इस वर्ष संभवतः सेतु प्रकाशन से आना तय हुआ है। उनसे navin.rangiyal@gmail.com पर बात की जा सकती है।

3 Comments

  1. प्रमोद जून 10, 2022 at 5:49 पूर्वाह्न

    अच्छी कविताएँ हैंl भाषा ने कवि की उँगली थाम रखी हैl

    Reply
    1. Navin rangiyal जून 10, 2022 at 9:58 पूर्वाह्न

      बहुत शुक्रिया आपका प्रमोद जी.

      Reply
  2. chandan shrivastava जून 10, 2022 at 1:37 अपराह्न

    कहन का बड़ा संकट है कविताओं में अविनाश! और, अविनाश! ये कह लेने दो कि तुम्हारी ही तरह नवीन रांगियाल का कवि भी कहन के संकट को दूर करने की संभावनाओं से भरा हुआ, उम्मीद जगाता कवि है. राजनीति में अब कविता के लिए जगह नहीं है, पहले जब वहां चोर-उचक्के और लंपट हुआ करते थे तो कविताओं के लिए राजनीति में उपदेश होने या कोसने-कराहने भर को एक जगह थी लेकिन अब राजनीति में चोर-उचक्के, लंपट वैगरह नहीं बल्कि तांत्रिक हैं,मांत्रिक हैं, जादूगर और संपेरे हैं, राजनीति में आदमी यों तो पहले से ही सांप था लेकिन अब संपरे भी हैं.. तो राजनीति में कविता के लिए जगह नहीं है.. वह सांपों को पकड़ रखने की झंपोला नहीं हो सकती. प्रेम में अब भी एक संभावना है कविता के लिए क्योंकि वह हमेशा होने और ना होने के बीच रहता है. नवीन इस अधबीच को ही कविता बनाते हैं और अधबीच के लिए भाषा गढ़ते हैं. बहुत शुक्रिया नवीन…चिरजीवी भव

    Reply

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