कविताएँ ::
पीयूष तिवारी

पीयूष तिवारी

कर्मयोग : एक ज़रूरी सलाह

हिंसा की अतिरंजना देख जिन्हें
आती है उबकाई
वे भी नहीं बच पाते एक नज़र
उसकी ओर देखने भर के आकर्षण से

आदमी तभी तक सामाजिक रहता है
जब तक पाँव में
दमन और शोषण का काँटा नहीं चुभता

प्रत्येक रात घुटनों में सिर छिपाए
फुटपाथ पर सोने की
नाकाम कोशिश के नीचे दबे ऊब में
जब हम तलाश रहे होते हैं
मुख्यधारा से अलगाए जाने का कारण

तब पूस के दिनों में हमारे बिस्तर पर
‘कोयल-कारो’ (नदी) उतर आती है
और हम अभ्यस्त लोग इसे
समझ-समझ के फेर में समझते हैं
वॉटर कैनन का पानी
जिसे इतने सालों से संसद की गेट पर
झेलते आ रहे होते हैं

आंदोलन के दिनों में हमें
इतना पीटा गया कि
हमारी पीठ पर उत्पीड़न के थक्के जम गए
और किसी शानदार चीते की तरह
हम चमकने लगे शिकारियों की आँखों में

हर मुकम्मल दमन के नीचे
जानवरों से भरा जंगल दबा होता है

मन से ज़्यादा जहाँ दौड़ती हैं गाड़ियाँ
हमने तय किया है उन अजनबी रास्तों को
उड़ती धूल में कहीं छूटे हैं
हमारे पैरों के निशान

तय है कि कुछ भी तय नहीं
कुछ न बचाने की शर्त पर
कम से कम हमारे पगचिह्नों को तो बचाएगी
दाहिने पैर को बाएँ पैर से बदलने की युक्ति
कौंधेगा यह विचारोत्तेजक गीत की तरह—
कोई तो चला होगा इन अनचीन्हे रास्तों पर
धरती को करता हुआ लाल

पीछे छूटे इन पगचिह्नों को देख कर
आए भले न क्रांति
सोचेगा! कोई एक मन तो सोचेगा।

दुर्दिनों का आत्मकथ्य

यातायात संबंधी नियमों में उलझे लोगों के पास
नहीं होता तटस्थ रहने के नियम-कायदे
समझने भर का समय
जीवन के सबसे उदास दिनों में
निर्विकल्प झेलनी है एकाकीपन की पीड़ा

बुनना है उदासी के उघड़े हुए ऊनी रेशों से
विवशता का स्वेटर
अपनी जिजीविषा तलाशते दिनों में
अपरिहार्य दुःख की ख़बरें सुनेंगे
और खंड-खंड टूट जाएँगे
सामूहिक न होने की सामूहिकता में
आवृत्तियों के होने की गाँठ से बचना है मुझे

सबमें लगी है एक-दूसरे के कंधों पर
पाँव धर कर आगे छलाँग मार बढ़ जाने की होड़
सभी को निर्बाध ही पार करनी हैं बाधाएँ
इन दिनों सबसे ज़िम्मेदार नागरिक के
अपने सबसे ज़िम्मेदार वक्तव्य में
चलन है चुप रहने का

उम्मीदों को भी एक दिन मरना है मौत अपनी
आत्महीनता के कचरों के ढेर पर बसे
इन आत्ममुग्ध शहरी बाबुओं से
सिद्धांतों का अरण्य बचा लेने की
कोई उम्मीद नहीं मुझे

आत्ममुग्धता से पीड़ित व्यक्ति
आत्मचिंतन में कभी समय व्यर्थ नहीं करता

दिवास्वप्न कर रही है दुस्वप्न की अनुकृति
खो रही मौलिकता में याचक बन कर
भटकना है जीवन भर

इस उजाड़-ऊसर दिनचर्या में
घृणा और ग्लानि से भर देता है
ज़रूरी नहीं हर बार किसी के होने का बोध
प्रदान करे संबल बना रहे प्रेरणास्रोत।

बाँस के फूल

पानी गिरने की प्रबल संभावना देखते हुए
पीठ पर सफ़ेद अंडे लादे
चींटियों का विस्थापन शुरू हो गया

शायद उनका भी अपना मौसम विभाग था
अथवा दार्शनिकों का समूह
जो अफ़वाहों के दौर में भी दे रहा था
सटीक जानकारी
याकि कोई गुप्तचर जो बादलों की
सफल जासूसी कर रहा था

बादल गरज रहे हैं
बिजलियाँ आसमान से
चमकीले साँप की तरह लटक रही हैं
विकलता काँप रही है
पुराने लालटेन की बत्ती जैसी
यह उम्मीद और पश्चाताप की ही
मिली-जुली बेलौस भावना है
जो चींटियों के घर छोड़ने पर
पानी गिरने के प्रबल संकेत देती है
पानी गिरने के बाद का समय
त्रासदी का समय है

घर टूटी हुई छतरी का
नमूना भर होता है
पानी चूने की संभावना
बनी रहती है प्रत्येक दिन
सरल और कठिन दिनों में
भेद नहीं दिखता कुछ भी
यातनाओं के समुद्र में विलीन हो जाती है
प्रतिकार की एक नदी

अभिशप्त यह बाँस पर
फूल खिलने का समय है
करुणा से भरा कोई मनुष्य भी नहीं
जो सुबकते हुए हृदय से
बजा सके बाँसुरी
चूहों से कर सके उद्धार मनुष्यता का।

राँची : शहर से जाते हुए

छूटते शहर में वह इमारत
सबसे आख़िर में दिखी
जो आते हुए शहर में
दिखी थी पहली बार

शहर से अनुरक्ति शहर में रहते नहीं
शहर छोड़ने के क्रम में
उभरती है मूक रुलाई बन कर

छूटते शहर की सड़क
बिछाए रखती है अमलतास के आभूषण
जिसे देख कर हर आते हुए यात्री की
आँखों से टपकती है लिप्सा
और जाते हुए की आँखों में संतुष्टि चमकती है

छूटते शहर की ट्रेन इतनी धीमी चलती है
कि स्मृति में बैठे सारे दृश्य
रफ़्तार में चलने लगते हैं
भीतर सावधानी से
पश्चाताप करते हुए भी
काँप जाता है शिथिल प्राण

छूटता शहर हम में छोड़ जाता है
अपने गलियों-चौराहों की पीली शाम
संवाद में अपनी उपस्थिति
एक गंभीर लहज़ा एक विचित्र कोलाहल

छूटता शहर संदिग्ध परिस्थिति में झटक कर
बंद की गई खिड़की है
जिसके जालीदारनुमा वेंटीलेटर से
नहीं आती रौशनी
प्राणवायु छूट जाता है बहुत पीछे
फैल जाता है तनाव भरा सन्नाटा।

शकुन-अपशकुन

दीवार गिरने पर बस जाते हैं
कितने ही नायाब शहर
मगर अपनी ही तस्वीर गिरने पर
हम स्थगित कर देते हैं सारे प्रयोजन
बन नहीं पाता संयोग यात्रा का

गिरने का यह अपना-अपना रूपक
अपनी-अपनी सहूलियत से आता है।

मक़सद

खूँटी पर मौजूद जगह को देखते हुए
टाँगने के लिए लोकतंत्र को चुनना
तुम्हारा अब तक का सर्वश्रेष्ठ चुनाव रहा

देश के हताश और निराश नागरिकों
खेत में धान रोपती बनिहारों से
क्रांतिकारी गीत सीखने में कोई बुराई नहीं
अंतहीन आंदोलनों के नृशंस दौर में
ज़रूरी चीज़ों के अभाव की
एक लंबी फ़ेहरिस्त होती है

जिन रास्तों से आम जनों को
जाने की मनाही होती है
उन रास्तों पर लगे
दिशा-परिवर्तन के बोर्ड
हिटलर के यातना-गृह की ओर
जाने का इशारा करती हैं

ऐसा पहली बार नहीं हुआ
जब आवाज़ दबाने के प्रयास को
ख़ामोश करने से पूरा किया गया हो
पहली बारी उसी की आती है
जो एक क़दम पीछे हटना नहीं जानता

जिनके जीने का कोई मक़सद नहीं होता
उन्हें मारना किसी मक़सद से कम नहीं होता।

मर्त्य पिता

झुर्रियों के आवरण में पिता
तुम मेरी ही उम्र के लड़के लगते हो
मगर नंगी भावुकता तुम्हारी
कमज़ोरी कभी नहीं रही

चिरकाल से तुम्हें गले लगाने की लिप्सा जाती रही
हिचक और लज्जा के घने बादल
छाए रहे उजली कल्पनाओं पर

इच्छाएँ बूढ़ी होती रहीं
बढ़ती उम्र के साथ
अनुभव आस-पास के खेतों में
कपास की शक्ल में उगते रहे
दो आकाशगंगा की दूरी पर बनाया घर तुमने
हुबहू तुम्हारे जैसे ही तारे थे असंख्य
हर शाम सबको ‘तुम’ मान
तुम्हारे होने का बोध
महसूस करता रहा इन दिनों

पिता तुम हवा में जब भी खींच देते थे रेख
दुःख का तूफ़ान टेक देता था घुटने
हताशाएँ हो जाती थीं उदास

दोमुँहे साँप से तुम्हारी बचने की सीख
सीने से चिपकाए घूमता मैं
चाहा था तुम्हें क़ैद करना तिलिस्मी आईने में
पर तुम तो पंछी थे पिता
चले गए हमें दुरूह आशंकाओं के
आसमान में अकेला उड़ता छोड़ कर।


पीयूष तिवारी की कविताओं के ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह प्राथमिक अवसर है। इससे पूर्व उनकी कुछ कविताएँ ‘वागर्थ’ और ‘इंद्रधनुष’ ने प्रकाशित की हैं। उन्होंने अभी बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण ही की है, लेकिन उनकी अध्ययनशीलता और रचनात्मकता अपनी उम्र से आगे की है। उनका आगमन और उनकी उपस्थिति सुखद और तसल्लीबख़्श है। उनसे piyushtiwarii620@gmail.com पर बात की जा सकती है।

2 Comments

  1. Avneesh kumar सितम्बर 14, 2022 at 4:30 अपराह्न

    बेहद खूबसूरत👌👌

    Reply
  2. सत्यव्रत रजक जुलाई 23, 2023 at 5:31 अपराह्न

    सुंदर कविताएँ❤️👌

    Reply

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