विस्वावा शिम्बोर्स्का की कविताएँ ::
अँग्रेज़ी से अनुवाद : शायक आलोक

घर लौटना
वह घर लौटा। कहा कुछ भी नहीं।
ज़ाहिर था लेकिन कि हुआ है उसके साथ कुछ तो ग़लत।
कपड़े बदले बिना ही लेट गया।
सिर तक कंबल खींच लिया।
समेट लिया घुटनों को भीतर।
उम्र है उसकी लगभग चालीस, लेकिन इस क्षण तो नहीं।
अभी तो है जैसे रहा था माँ के गर्भ में
त्वचा की सात परतों के भीतर, एक सुरक्षित अँधेरे में।
कल उसे व्याख्यान देना है
मेगा-गैलेक्टिक कॉस्मोनोटिक्स में होमियोस्टेसिस के बारे में।
फ़िलहाल तो बस गुड़-मुड़ हुआ है और सो गया है।
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मैं ट्रैंक्विलाइज़र हूँ।
मैं घर पर प्रभावी हूँ।
दफ़्तर में भी असरकारी।
मैं परीक्षाएँ दे सकती हूँ
या गवाहों के कटघरे में खड़ी हो सकती हूँ।
मैं टूटे प्यालों को भी सावधानी से जोड़ देती हूँ।
तुम्हें बस इतना करना है कि मुझे ग्रहण करो
मुझे अपनी जीभ के नीचे घुलने दो
फिर मुझे निगल लो
एक गिलास पानी के साथ।
मैं जानती हूँ कि दुर्भाग्य से कैसे निपटना है
या कैसे करना है बुरी ख़बर का सामना।
मैं अन्याय को न्यूनतम बना सकती हूँ
कर सकती हूँ ईश्वर की अनुपस्थिति के बोझ को हल्का
या तुम्हारे चेहरे पर फबने वाला ‘विधवा का घूँघट’ भी चुन सकती हूँ।
तो किस बात की है तुम्हें प्रतीक्षा—
मेरी रासायनिक करुणा पर आस्था रखो।
तुम अभी भी एक युवा स्त्री/पुरुष हो।
तनावमुक्त होना सीखने में अभी देर नहीं हुई है।
किसने कहा
कि तुम्हें सब कुछ चुपचाप सहना है?
मुझे अपना अँधेरा गर्त सौंप दो।
मैं उसे नींद का सहारा दूँगी।
तुम मेरा धन्यवाद करोगे कि मैंने तुम्हें
गिरते समय बिल्ली के चार पंजों जैसा सहारा दिया।
मुझे बेच दो अपनी आत्मा।
उसका और कोई ख़रीदार नहीं।
अब कोई और शैतान भी नहीं।
मासूमियत
मनुष्य के बालों से बने गद्दे पर गर्भ में आई।
गेर्दा। एरीका। शायद मार्गरेता।
वह नहीं जानती, सचमुच नहीं जानती इसके बारे में कुछ भी।
इस तरह की सूचना ऐसी नहीं होती
कि दी जाए या सुनी जाए।
यूनानी प्रतिशोध की देवियाँ हैं कुछ ज़्यादा ही न्यायप्रिय।
आज हमें खलती उनकी पक्षी-सरीखी अतिरंजना।
इरमा। ब्रिगिदा। शायद फ़्रिदेरिका।
उसकी उम्र बाईस है या उससे कुछ अधिक।
वह तीन विदेशी भाषाएँ जानती है, जो हैं यात्राओं के लिए आवश्यक।
जिस कंपनी में वह काम करती है, वह निर्यात के लिए अनुशंसा करती है
सिर्फ़ कृत्रिम रेशों से बने सबसे अच्छे गद्दों की।
निर्यात राष्ट्रों को निकट लाता है।
बेआता। उलरीका। शायद हिल्देगार्दा।
सुंदर उतनी नहीं, लेकिन लंबी और छरहरी।
कपोल, ग्रीवा, उरोज, उरु, उदर—
सभी अपने पूर्ण प्रस्फुटन और नवीन आभा में।
यूरोप के समुद्र-तटों पर नंगे पाँव प्रसन्नतापूर्वक घूमती हुई
वह अपने सुनहरे बाल खोल देती है जो घुटनों तक लंबे हैं।
मैंने इन्हें कटवाने की सलाह नहीं दूँगी, उसके हेयर-ड्रेसर ने उससे कहा था—
एक बार कट जाने पर वे फिर कभी इतने घने नहीं उगेंगे।
मुझ पर यक़ीन करो।
यह परखी हुई बात है—
हज़ारों-हज़ार बार।
हँसी
वह छोटी लड़की जो मैं थी—
मैं उसे जानती हूँ, निस्संदेह।
उसके छोटे-से जीवन की
कुछ छवियाँ मेरे पास हैं।
मेरे मन में स्नेह भरी दया है
उसकी इक्की-दुक्की कविताओं के लिए।
कुछ घटनाएँ भी मुझे याद हैं।
लेकिन
अपने साथ के आदमी को
हँसाने के लिए और इसलिए कि वह मुझे बाँहों में भर ले
मैं केवल एक बुद्धू-कथा खोद निकालती हूँ :
उस बदसूरत छोटी बत्तख़ के
पहले प्रेम की कहानी।
मैं उसे बताती हूँ
कि कैसे वह एक कॉलेज के लड़के से प्रेम कर बैठी थी
या यूँ कहूँ कि वह बस यह चाहती थी
कि वह लड़का उसकी ओर देखे।
मैं उसे बताती हूँ
कि एक बार वह उससे मिलने कैसे भागी गई थी
अपने बिल्कुल सही-सलामत सिर पर पट्टी बाँधे हुए
ताकि वह पूछे, बस पूछ ले उससे
कि यह हुआ क्या है।
कैसी भोली-सी बच्ची थी।
उसे भला कैसे मालूम हो सकता था
कि निराशा भी कभी-कभी तुम्हारे काम आ सकती है
यदि तुम इतने भाग्यशाली हो
कि बस टिके रहो।
मैं उसे कुछ सिक्के दे देती :
जाओ, बिस्कुट ख़रीद लो।
मैं उसे कुछ और पैसे देती :
जाओ, कोई खेल-तमाशा देख आओ।
अब जाओ, मैं इस समय व्यस्त हूँ।
क्या तुम्हें दिखाई नहीं देता
कि बत्तियाँ बुझ चुकी हैं?
क्या तुम समझती नहीं
कि दरवाज़ा बंद है?
उसकी कुंडी से खेलना बंद करो—
वह आदमी जिसने मुझे हँसाया
और मुझे बाँहों में भर लिया
नहीं है वह तुम्हारा कॉलेज वाला लड़का।
बेहतर होगा कि तुम
वापस वहीं चली जाओ जहाँ से आई हो।
मैं तुम्हें कुछ देने की भागी नहीं।
मैं तो बस एक साधारण स्त्री हूँ
जो केवल इतना जानती है
कि किसी दूसरे का रहस्य
कब प्रकट कर देना चाहिए।
हमें यूँ मत घूरते रहो
अपनी उन आँखों से
जो कुछ ज़्यादा ही खुली हुई हैं
किसी मृतक की आँखों की तरह।
लिखने का सुख
यह लिखी हुई हिरनी इन
लिखे हुए जंगलों में क्यों कुलाँचें भर रही है?
क्या वह उस लिखे हुए सोते का जल पीने जा रही है
जिसकी सतह उसकी कोमल थूथन की प्रतिलिपि उतार लेगी?
वह अपना सिर क्यों उठाती है,
क्या उसे कुछ सुनाई पड़ रहा है?
सत्य से उधार ली गई चार पतली टाँगों पर खड़ी
वह मेरी उँगलियों के पोरों के नीचे अपने कान खड़े कर लेती है।
मौन—यह शब्द भी पृष्ठ पर सरसराता हुआ चलता है
और उन शाखाओं को अलग कर देता है
जो ‘जंगल’ शब्द से फूट निकली हैं।
ख़ाली पृष्ठ पर झपटने की ताक में, घात लगाए बैठे हैं
कुछ बदमाश अक्षर
उप-वाक्यों के झुंड इतने आश्रित कि
वे उसे कभी बचकर निकलने नहीं देंगे।
स्याही की हर बूँद में पर्याप्त संख्या में
शिकारी मौजूद हैं, जो अपनी बंदूक़ों की नालों के पीछे
आँखें सिकोड़कर देख रहे हैं
किसी भी क्षण क़लम को ढलान की ओर मोड़ने के लिए तैयार
हिरनी को घेर लेने के लिए और अपनी बंदूक़ें तान लेने के लिए।
वे भूल जाते हैं कि यहाँ जो है वह जीवन नहीं है।
यहाँ दूसरे क़ानून लागू होते हैं, श्वेत पर काले अक्षरों के क़ानून।
पलक झपकने में उतना ही समय लगेगा जितना मैं कहूँगी
और यदि मैं चाहूँ तो वह असंख्य सूक्ष्म अनंतताओं में विभाजित हो जाएगा
जहाँ गोलियाँ उड़ान के बीच ही ठहरी हुई होंगी।
जब तक मैं न कहूँ, कुछ भी कभी घटित नहीं होगा।
मेरी अनुमति के बिना एक पत्ता तक नहीं गिरेगा
न घास की एक पत्ती उस छोटे-से खुर के पूर्ण विराम के नीचे झुकेगी।
तो क्या सचमुच ऐसा कोई संसार है
जहाँ भाग्य पर मेरा पूर्ण शासन चलता है?
ऐसा समय जिसे मैं संकेतों की ज़ंजीरों से बाँध देती हूँ?
ऐसा अस्तित्व जो मेरी इच्छा से अनंत हो जाता है?
लिखने का सुख।
संरक्षित रख पाने की शक्ति।
एक नश्वर हाथ का प्रतिशोध।
एक पत्थर से बातचीत
मैं पत्थर के मुख्य द्वार पर दस्तक देती हूँ।
मैं हूँ, मुझे अंदर आने दो।
मैं तुम्हारे भीतर प्रवेश करना चाहती हूँ
ज़रा चारों ओर देखना चाहती हूँ
भरपूर तुम्हें अपनी साँसों में भरना चाहती हूँ।
चली जाओ, कहता है पत्थर।
मैं पूरी तरह बंद हूँ।
यदि तुम मुझे टुकड़े-टुकड़े भी कर दो
हम सब फिर भी बंद ही रहेंगे।
तुम हमें पीसकर रेत बना दो
तब भी हम तुम्हें भीतर नहीं आने देंगे।
मैं पत्थर के मुख्य द्वार पर दस्तक देती हूँ।
मैं हूँ, मुझे अंदर आने दो।
मैं शुद्ध जिज्ञासा के कारण आई हूँ।
केवल जीवन ही उसे शांत कर सकता है।
मैं तुम्हारे महल में टहलना चाहती हूँ
फिर एक पत्ती और जल की एक बूँद से मिलने जाऊँगी।
मेरे पास अधिक समय नहीं है।
मेरी नश्वरता को तुम्हें छूना चाहिए।
मैं पत्थर से बना हूँ, कहता है पत्थर
और इसलिए मुझे निर्विकार रहना पड़ता है।
चली जाओ।
मेरे पास हँसने की मांसपेशियाँ नहीं हैं।
मैं पत्थर के मुख्य द्वार पर दस्तक देती हूँ।
मैं हूँ, मुझे अंदर आने दो।
मैंने सुना है कि तुम्हारे भीतर विशाल रिक्त प्रांगण हैं,
अनदेखे, जिनकी सुंदरता व्यर्थ चली जाती है
निस्तब्ध, जहाँ किसी पदचाप की प्रतिध्वनि नहीं होती।
मान लो कि तुम स्वयं भी उन्हें अच्छी तरह नहीं जानते।
विशाल और रिक्त—यह सच है, कहता है पत्थर,
लेकिन वहाँ कोई जगह नहीं है।
सुंदर—संभवतः, पर तुम्हारी
दुर्बल इंद्रियों की रुचि के अनुरूप नहीं।
तुम मुझे जान सकती हो,
पर मुझे पूरी तरह कभी नहीं जान पाओगी।
मेरा समस्त बाह्य भाग तुम्हारे सम्मुख है
और मेरा समस्त अंतरंग तुमसे विमुख।
मैं पत्थर के मुख्य द्वार पर दस्तक देती हूँ।
मैं हूँ, मुझे अंदर आने दो।
मैं अनंत काल के लिए शरण नहीं चाहती।
मैं दुखी नहीं हूँ।
मैं बेघर नहीं हूँ।
मेरी अपनी दुनिया है, जहाँ लौटना सार्थक है।
मैं भीतर आऊँगी और ख़ाली हाथ लौट जाऊँगी।
और मेरे वहाँ होने का प्रमाण
सिर्फ़ शब्द होंगे,
जिन पर कोई यक़ीन नहीं करेगा।
तुम भीतर प्रवेश नहीं करोगी, कहता है पत्थर।
तुममें सहभागिता का बोध नहीं है।
कोई दूसरी इंद्रिय उस अभाव की भरपाई नहीं कर सकती।
यहाँ तक कि यदि तुम्हारी दृष्टि सर्वदर्शी बन जाए
तब भी सहभागिता के बोध के बिना उसका कोई लाभ नहीं।
तुम भीतर नहीं आओगी,
तुम्हारे पास केवल यह बोध है
कि वह बोध कैसा होना चाहिए
केवल उसका बीज है—बस एक कल्पना।
मैं पत्थर के मुख्य द्वार पर दस्तक देती हूँ।
मैं हूँ, मुझे अंदर आने दो।
मेरे पास दो हज़ार सदियों का समय नहीं है
इसलिए मुझे अपनी छत के नीचे आने दो।
यदि तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं, कहता है पत्थर
तो पत्ती से पूछो, वह भी यही कहेगी।
जल की एक बूँद से पूछो, वह वही कहेगी जो पत्ती ने कहा।
और अंत में, अपने ही सिर के एक बाल से पूछो।
मैं हँसी से फटा जा रहा हूँ—
हाँ, हँसी से, विकराल हँसी से—
हालाँकि मुझे हँसना नहीं आता।
मैं पत्थर के मुख्य द्वार पर दस्तक देती हूँ।
मैं हूँ, मुझे अंदर आने दो।
मेरे पास कोई दरवाज़ा ही नहीं है—कहता है पत्थर।
हेराक्लिटस की नदी में
हेराक्लिटस की नदी में
मछली पकड़ती है मछलियाँ
मछली एक पैनी मछली से मछली के टुकड़े करती है
मछली सिरजती है मछली,
मछली रहती है मछली में
मछली घेराबंद मछली से भाग निकलती है।
हेराक्लिटस की नदी में
मछली मछली से प्रेम करती है,
तुम्हारी आँखें—वह कहती है—स्वर्ग की मछलियों-सी चमकती हैं
मैं तुम्हारे साथ हमारे साझा समुद्र की ओर तैरना चाहती हूँ
हे झुंड की सबसे सुंदर मछली!
हेराक्लिटस की नदी में
मछली ने मछलियों से ऊपर एक मछली की कल्पना की
मछली घुटने टेकती है मछली के सामने,
मछली गाती है मछली के लिए
मछली से आसान तैराकी की प्रार्थना करती है।
हेराक्लिटस की नदी में
मैं, एक अकेली मछली; मैं, एक अनूठी मछली
(वृक्ष-मछली या पत्थर-मछली से भी अलग)
अलग-अलग क्षणों में लिखती हूँ, छोटी-छोटी मछलियाँ
रजत शल्कों में, इतने अल्प समय के लिए कि
शायद अँधेरा ही संकोच में पलकें झपका दे?
कुछ भी दो बार नहीं
कुछ भी कभी दो बार नहीं घटता।
फलस्वरूप, दुखद सचाई यह है
कि हम यहाँ बिना तैयारी के आते हैं
और अभ्यास का अवसर पाए बिना ही चले जाते हैं।
भले ही तुमसे अधिक मूर्ख कोई न हो
भले ही तुम इस पृथ्वी के सबसे बड़े बुद्धू हो
तुम ग्रीष्मकालीन कक्षा को दुहरा नहीं सकते :
यह पाठ्यक्रम केवल एक बार ही उपलब्ध है।
कोई दिन बीते कल की प्रतिलिपि नहीं होता
कोई दो रातें यह नहीं सिखातीं कि परम आनंद क्या है
ठीक उसी तरह
ठीक उन्हीं चुंबनों के साथ।
एक दिन, शायद, कोई निष्क्रिय जिह्वा
संयोगवश तुम्हारा नाम ले लेती है :
मुझे ऐसा लगता है मानो एक गुलाब कमरे में
उछाल दिया गया हो अपने पूरे रंग और सुगंध के साथ।
लेकिन अगले दिन, जबकि तुम मेरे पास ही हो
मैं घड़ी की ओर देखे बिना नहीं रह पाती :
एक गुलाब? गुलाब? वह क्या होता है?
वह एक फूल है या एक पत्थर?
हम इस क्षणभंगुर दिन को
इतने अनावश्यक भय और शोक से क्यों जोड़ते हैं?
उसका स्वभाव ही है ठहरकर न रहना :
जो आज है वह हमेशा ही कल के आते बीत जाता है।
मुस्कानों और चुंबनों के साथ, हम
अपने सितारे के नीचे सामंजस्य खोजने की कोशिश करते हैं
हालाँकि हम भिन्न हैं (इस बात पर हम सहमत हैं)
उतने ही भिन्न जितनी जल की दो बूँदें।
बैबेल की मीनार
“क्या समय हुआ है?”—“ओह हाँ, मैं कितनी ख़ुश हूँ;
मुझे बस अपने गले में एक छोटी-सी घंटी चाहिए
जो तुम्हारे ऊपर झनकती रहे तुम्हारी नींद में।”—
“क्या तुमने तूफ़ान की आवाज़ नहीं सुनी? उत्तरी हवा ने
दीवारों को हिला दिया; मीनार का फाटक, सिंह के जबड़ों की तरह,
अपनी चरमराती कुंडियों पर खुलकर फैल गया था।”—“तुम यह कैसे भूल
सकते हो? मैंने वही सादी धूसर पोशाक पहन रखी थी
जो कंधे पर बंद होती है।”—“उसी क्षण असंख्य विस्फोटों ने
आकाश को हिला दिया था।”—“मैं कैसे भीतर आती? आख़िर तुम
अकेले तो नहीं थे।”—मैंने उन रंगों की झलक देखी
जो स्वयं दृष्टि से पुराने थे।”—“अफ़सोस कि तुम मुझसे कोई
वायदा नहीं कर सकते।”—“तुम ठीक कहती हो, वह शायद एक सपना
ही रहा होगा।”—“ये सारे झूठ क्यों? तुम मुझे उसके नाम से
क्यों पुकारते हो? क्या तुम अब भी उससे प्रेम करते हो?”—“निश्चय ही,
मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे साथ रहो।”—“मैं शिकायत नहीं
कर सकती, मुझे स्वयं ही समझ लेना चाहिए था।”
—“क्या तुम अब भी उसके बारे में सोचती हो? ”
—“लेकिन मैं रो तो नहीं रही।”—
“बस इतना ही?”—“तुम्हारे सिवा कोई नहीं।”
—“कम-से-कम तुम ईमानदार तो हो।”—“चिंता मत करो,
मैं यह शहर छोड़ रही हूँ।”—“तुम चिंता मत करो,
मैं ही जा रहा हूँ।”—“तुम्हारे हाथ कितने सुंदर हैं।”
—“वह बहुत पुरानी बात है; कटार आर-पार चली गई थी
लेकिन हड्डी को नहीं छू सकी।”—“कोई बात नहीं प्रिय,
कोई बात नहीं।”—“मुझे नहीं मालूम
क्या समय हुआ है और मुझे इसकी परवाह भी नहीं।”
बहुत पास हूँ उसके…
मैं उसके इतने पास हूँ कि उसके स्वप्न में नहीं आ सकती।
मैं उसके ऊपर नहीं मँडराती, उससे नहीं भागती
वृक्षों की जड़ों के नीचे। बहुत पास हूँ मैं।
जाल में फँसी मछली मेरी आवाज़ में नहीं गाती।
मेरी उँगली से लुढ़कती नहीं कोई अँगूठी।
बहुत पास हूँ मैं। जल रहा है वह बड़ा घर
सहायता के लिए मेरी किसी पुकार के बिना। इतने पास
कि मेरा एक बाल भी चेतावनी-घंटी की रस्सी में नहीं बदल सकता।
इतने पास कि मैं प्रवेश नहीं कर सकती
एक अतिथि की तरह जिसके सामने दीवारें स्वयं खुल जाती हैं।
अब मैं फिर कभी इतनी आसानी से नहीं मरूँगी,
इतना अधिक मेरे शरीर से बाहर, इतना असजग,
जैसे कभी उसके स्वप्न में मरी थी। बहुत पास हूँ मैं,
बहुत पास। मैं एक फुफकार सुनती हूँ
और इस शब्द की चमकती हुई शल्कें देखती हूँ,
निश्चल उसके आलिंगन में।
वह सो रहा है,
इस क्षण वह अधिक सुलभ है
एकल सिंह वाले घूमंतू सर्कस की उस टिकट-विक्रेता औरत के लिए
जिससे जीवन में बस एक बार मिला
बजाय मेरे जो उसके बग़ल में लेटी है।
अब उसी के लिए उसके भीतर उग रही है एक घाटी
लाल-भूरी पत्तियों वाली, एक हिमाच्छादित पर्वत से घिरी हुई
नीलवर्णी हवा में। बहुत पास हूँ मैं
कि उसके लिए स्वर्ग के उपहार की तरह आकाश से नहीं गिर सकती। मेरी चीख़
उसे केवल जगा सकती है। और कैसा
तुच्छ उपहार हूँ मैं : अपनी ही आकृति में सीमित
जबकि कभी मैं एक बर्च-वृक्ष थी, एक छिपकली
समयों और रेशमी खालों को उतारती हुई
असंख्य झिलमिलाते रंगों में। और मेरे पास था
विस्मित आँखों के सामने से ओझल हो जाने का वरदान
जो है सभी वरदानों में सबसे सबल। बहुत पास हूँ मैं
इतने पास कि उसके स्वप्न में नहीं आ सकती।
मैं उस सोए हुए के सिर के नीचे से अपना हाथ खींचती हूँ,
सुन्न पड़ा हुआ हाथ, काल्पनिक सुइयों से झनझनाता हुआ।
उनमें से हर एक की नोक पर बैठे हैं स्वर्ग से गिरे फ़रिश्ते
गिने जाने की प्रतीक्षा में।
यहाँ प्रस्तुत सभी कविताएँ अँग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद करने के लिए Wislawa Szymborska : Poems New and Collected : 1957-1997 [अनुवादक : स्तानिस्वाव बरान्चाक और क्लेयर कैवनॉ] से चयनित।
‘सदानीरा’ पर विस्वावा शिम्बोर्स्का : कविताएँ | गद्य | वक्तव्य
‘सदानीरा’ पर शायक आलोक : कविताएँ | अनुवाद