प्राकृत से पंद्रह कविताएँ ::
अनुवाद : कुमार मंगलम

एक

क्या देवताओं ने मुझे शापित कर डाला है?

दरवाजे के बाहर
किसी ने
आम का पेड़ लगाया है
जिसके पत्ते विषैले हैं

जब आम में बौर आते हैं
उसकी मादक सुगंध से
मेरा गर्भ प्रेम के लिए
बेइंतहा तड़पने लगता है।

— विकटनितंबा

दो

काले धुएँ से भरी रात अमा की
धरती पर पसरा हुआ अँधेरा
बादल बेतरतीब
कामाग्नि भड़काने को उद्धत
घास पर
बर्फ़ से बिखरे मोती
बारिश के इस मौसम में
जब लोग अँधेरी रात में प्रेमालाप करते हों
ऐसे में प्रेमी से धोखा खाई स्त्री के लिए
मौत ही पनाह है।

— विज्जा

तीन

मैं उस ख़ामोश श्रोता की शुक्रगुज़ार हूँ
जिसने शरीर की सिहरन को सुना
कवि जिसने शब्दों की अटूट लय को एक संगति दी
उसने ही छुआ : रूह की आग को।

— विज्जा

चार

अँधेरी बारिश की रात
और शहर की सड़कें बारिश से धुली हुईं
ऐसे में दूर देश यात्रा पर गया हुआ पति

जघनचपला ख़ुश है
वह प्रेमियों के साथ संसर्ग कर सकती है।

— जघनचपला

पाँच

वह जो अपनी पुरानी खोई स्मृतियों में
प्रेम को याद करते हुए
एक पुराना विरह-गीत गुनगुना रहा है

मेरा दिल उससे छलनी हुआ है
जो अब मेरी स्मृतियों में भी नहीं आता।

— केशव सतसई

छह

कड़कती बिजली से भरी हुई रात
चमेली की फूलों को बिखेरती हुई
कदंब की शाखाएँ हवाओं से जूझ रही हैं
कुछ भी नहीं बदला बस
हम थोड़े और बूढ़े हो गए
और वसंत आ गया
नर्मदा के किनारे गन्ने के विशाल खेत में
तुमने मेरा कौमार्य भंग कर दिया

मैं आज भी उस रात के लिए तड़पती हूँ
जब पानी के सानिध्य में
हम केलिरत थे।

— शिलाभट्टारिका

सात

सघन वन में
सुदूर एकांत में
छिप कर
पतझड़ के पत्तों से ढकी राह पर
किसी के आने की
प्रतीक्षा करती है वह।

— मध्य सतसई

आठ

थाम लो उसे
उसके गर्भ में नहीं है
कोई बुरी आत्मा

उसका पति दूर है
और वह है बेचैन

बारिश के सघन मेघ
उसे रात की ओर धकेल रहे हैं।

— दुर्धरा सतसई

नौ

कँपकँपाते होंठों से
जो अस्फुट बात निकली है
साहस की सहसा
निदाग श्वास पर अटके हुए कुछ रह गई बात
दिया जो अभी बुझने को है

सैकड़ों क़समें होंठों के भीतर ही क़ैद रह गईं
ओह, अँधेरे ने फिर उसे चुरा लिया।

— वज्रदेव सतसई

दस

जब तक उसकी बाँसुरी बजती है
मैं नाचती हूँ।

एक लता
एक विशाल पेड़ की बाज़ुओं में लिपट जाती है।

पर मेरा दिल
अस्थिर है।

— शशिप्रभा सतसई

ग्यारह

भेद दो उसे
अपने क्षिप्र शरों से
उसकी प्रेम-ग्रंथियों को
बेचैन कर दो
जैसे मैं हूँ।

इस जन्म में
और अगले जन्म में
और आजन्म
जहाँ से तुम्हारे चरण गुज़रेंगे
वहीं शीश झुकाऊँगी
मेरे देवता!

— अज्ञात सतसई

बारह

हाँ, वे ज़रूर बातचीत करेंगे
और ग़लतबयानियाँ करेंगे
ये केवल शब्द हैं—

मेरे पास आकर सो जाओ
भले तुम रजस्वला हो

मैं सो नहीं पा रहा हूँ।

— अज्ञात सतसई

तेरह

तुम भले ही रोओ
और चाँदनी से मुँह फेर लो
पर जानो कि प्रेम
खीरे की खूँट की भाँति नाज़ुक
और बाँका है।

— अलका सतसई

चौदह

उन्होंने पूछा
कि तुम्हारे वक्ष पर
केसर के धागे चिपके रह गए थे

और
तुम्हारे हाथ वक्ष की ओर बढ़ गए अनायास
उस प्रेम दग्ध खरोंच की ओर

वे हँस पड़े।

— वालादित्य सतसई

पंद्रह

आज सुबह ही जब तुम चले गए
सूरज के उगते ही

मैं जहाँ गई
मंदिरों में, शहर की गलियों में
सभी ओर वीरानी-सी वीरानी थी।

— अमृता सतसई


कुमार मंगलम नई पीढ़ी के कवि-लेखक-अनुवादक हैं।

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