कविताएँ ::
कुमार कृष्ण शर्मा

बुज़ुर्ग, राख और आग
माँ ने
हर रात चूल्हे में जले
कोयलों पर
यह कह कर चढ़ाई राख
सुबह इन्हीं से सुलगाऊँगी आग
कम से कम दियासलाई की
एक तीली तो बचेगी
पिता ने नहाने के तुरंत बाद
कभी नहीं पोंछा शरीर
सूखने दिया हवा में पहले
फिर रगड़ा तौलिए से
पूछने पर धीरे से बताया
ऐसे लंबा चलता है तोलिया
ताऊ उलझे रहते
चारपाई की ढीली रस्सियों से
कसाव बना रहे इसमें
दादा की निशानी है यह
मेरे बुज़ुर्गों ने
सारी उम्र किया सरफा
राख से
बचा ली आग
और तुम हो
जल-जंगल-जमीन लेकर भी
काँप रहे हो!
सिगरेट और चुंबन
हाथ में पकड़ी आधी सिगरेट
उसने ऐशट्रे में दबा दी
धुआँ एक पतली लकीर बन
हवा में ठहर गया
उसने मेरी आँखों में देखा और कहा :
तुम कभी सिगरेट मत पीना
बहुत बुरी आदत है ये
धीरे-धीरे जला देती है शरीर
अगले ही पल
उसने झुक कर
मेरे होंठ चूम लिए
उसके होंठों से
हल्की गंध
मेरे भीतर उतर गई
उस दिन मुझ पर
यह भेद खुला :
सिगरेट
जलाती है धीरे-धीरे
और चुंबन
एक ही बार में
पूरा।
ऊपर से ऑर्डर है
ऊपर से आर्डर है
कितनी ऊपर से
रिपोर्ट टाइप कर रहा
कंप्यूटर-ऑपरेटर नहीं जानता
बाक़ी सभी काम छोड़
यह रिपोर्ट जल्द कंपाइल करो
लंच तक हो जाना चाहिए काम
ऊपर से आदेश है
काम सौंपते समय
साहब ने कहे ये शब्द
कौन है ऊपर
जो उसके साहब को भी देता है आदेश
सोचता-सोचता कर रहा है अपना काम
यह आदेश
किसी डाक से नहीं आता
नहीं दर्ज होता
किसी डिस्पैच रसीट के रजिस्टर पर
एक आकाशवाणी-सा
सबके सिरों पर
बिजली बन गिरता है
और सब डर जाते हैं
चपरासी डरता है
नौकरी चली जाएगी
क्लर्क डरता है
ट्रांसफ़र हो जाएगा
अधिकारी डरता है
प्रोमोशन रुक गई तो
टाइप करता-करता रुक कर
सोचता है
सबसे ऊपर बैठे लोग
किससे और क्यों डरते होंगे
क्या कभी ऐसा हुआ होगा
किसी साहब को
यह सोचते-सोचते
पूरी रात न आई हो नींद
जो काम करवाया गया पूरा दिन
वह सच में ज़रूरी था ही नहीं
सबसे बड़ा सवाल
अगर वह साहब
जो सबसे ऊपर बैठा है
वह भी किसी और से
ऑर्डर ले रहा हो तो…
कुमार कृष्ण शर्मा हिंदी के सुपरिचित कवि हैं। उनकी कविताओं की एक किताब ‘लहू में लोहा’ शीर्षक से प्रकाशित हो चुकी है। वह जम्मू के पुरखू में रहते हैं। उनसे kumarbadyal@gmail.com पर संवाद संभव है।