कविताएँ ::
सौम्या बाजपेयी

ला इ फ़ गो ज़ ऑ न
ला इ फ़ गो ज़ ऑ न
इस वाक्य में हर शब्द
एक-दूसरे को पछाड़ना चाहता है।
इसकी स्थिर परछाईं से उपजे अर्थों में
सर्वत्र निरर्थकता की
करतल-ध्वनियों की अनुगूँज से
लगभग बधिर होकर
हर चोटिल-आतंकित शब्द
सामूहिक संकीर्णता से व्यथित
अपने रक्त से सने
एकाकी द्वीपों में चीख़ता हुआ
भाग रहा है दूर
एक-दूसरे से
समय की नब्ज़ पकड़कर।
लाइफ़ एक एलीट शब्द है
भ्रामक पर
संभावनाओं से परिपूर्ण।
लाइफ़ गोज़ ऑन
एक भयावह सांत्वना है
जो चैतन्यता को केंद्र मानकर
अपना ठंडा हृदय लिए
कँपकँपाती हुई
जिजीविषाओं की
परिक्रमा करती रहती है।
अकेलापन
मैं अपने में
अपने से
इतनी पास आ गई हूँ
कि मुझे अब अपने सिवाय
कुछ और नहीं दिखता।
मैं अपने में
अपने से
इतनी दूर आ गई हूँ
कि मुझे अब अपने से
पृथक कोई और नहीं लगता।
मैं अपने आपमें
इतनी-इतनी हूँ
जैसे नसों में
लबालबाता रक्त।
मैं अपने आपमें
उतनी-उतनी हूँ
जैसे घाव से
टपकता वक़्त।
हूँ मेरा मध्य है
मेरे होने को लगातार खोदता हुआ
मुझे ख़ाली कर-करके
मुझे मुझसे भरता हुआ।
ईश्वर
मैं इतनी बुद्धिजीवी
इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं हूँ
इसलिए ईश्वर पर
मुझे विश्वास है या नहीं
जैसे प्रश्न
मेरी सीमा से बाहर हैं।
मैं एक साधारण-सी पापिन
अपने पापपूर्ण प्रश्नों से वशीभूत होकर
अपने साधारण हाथ-पैर
हवा में मारती हूँ…
मुझे कोई उत्तर नहीं मिलता।
मैं निश्चिंतता से कह सकती हूँ—
ईश्वर है!
सौम्या बाजपेयी की कविताओं के ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह प्राथमिक अवसर है। वह ग्वालियर [मध्य प्रदेश] से हैं और वर्तमान में राजनीति विज्ञान विषय में पीएचडी शोधार्थी हैं। उनसे saumyab112@gmail.com पर संवाद संभव है।