कविताएँ ::
रुस्तम

रुस्तम

एक

पत्थरों की दीवार है।
उससे आगे मैदान है
जिसमें घास उगी हुई है।
उससे आगे पेड़ हैं
और फिर पहाड़ियाँ

जिन पर मैं कभी नहीं चढ़ूँगा।

दो

उस दिन
पहली बार जब मैंने तुम्हें देखा
बहुत दूर उस
अजनबी प्रदेश में,
मैं तुम्हारे प्रेम में बँध गया।

कितनी बार हम मिले,
पास-पास बैठे,
हमने बातें कीं।

लेकिन वह रहस्य
मेरे हृदय में ही दबा रहा।

तीन

मैं उठना नहीं चाहता था,
लेकिन तुम उठ पड़ीं।

साथ-साथ चलते हुए
हम सड़क पर निकल आए।

बाहर
घनी काली रात थी।

इमारतें सुनसान खड़ी थीं।

दूर तक
कोई रोशनी नहीं थी।

हमें कहीं जाना था,
तब भी बहुत देर तक
हम वहीं पर खड़े रहे।

चार

घुप अँधेरे में भी
तुम चल पड़ीं।

मैं भी तुम्हारे साथ था।

मद्धिम-सी
दो रोशनियाँ
हमारे आगे-आगे चल रही थीं।

मुड़कर मैंने देखा कि
वे
तुम्हारी ही आँखों से
निकल रही थीं।

पाँच

उसे बताना कि मैं आया था,
कि मैं बंद उसके द्वार के बाहर खड़ा रहा।

ये कंकड़ उसे देना।
उसे बताना कि ये मैं उसी के लिए लाया था।

छह

और उसे बताना कि वह कोई फ़क़ीर था
जो खिंचा चला आया था उसके द्वार की ओर।
कि वह कुछ लेने नहीं आया था,
भिक्षा माँगने।
बस कोई कशिश थी
उस द्वार में
या उसके पीछे।
वह उसे रोक नहीं पाया।

सात

धीरे-धीरे कम होती जा रही थी रोशनी।
उसी में मैं बढ़ रहा था।
मुझे पता था कि कुछ समय बाद मैं दिखूँगा नहीं

किसी को भी,
लेकिन उस अँधेरे में मैं तब भी बना रहूँगा।

आठ

तुम कहाँ-कहाँ से गुज़रे।
लेकिन तुम्हारे पैरों के निशान
मैं ढूँढ़ नहीं पाया।
पानी ने उन्हें धो दिया
या मिट्टी ने उन्हें ढक दिया।

या वे थे ही नहीं
शुरू से ही।

नौ

तीन नीले फूल,
दो काली तितलियाँ,
छोटा-सा एक लाल पत्थर।

कितनी बार
ये बिम्ब
पुनरावृत्त होते हैं किसी ख़ला में।

दूर से
धुँधली एक छवि
उनकी ओर बढ़ती है।

दस

पहाड़ी पर मैं झुका
और भूल गया कि मुझे क्या उठाना था।
कोई फूल या कोई कंकड़ या कोई पत्थर वहाँ नहीं था।
मैं वापिस उठ खड़ा हुआ।
मेरे सामने एक राह थी।
मैं उस पर उतर गया और चलता चला गया।
जहाँ मैं रुका, वहाँ सूखी एक नदी थी।

ग्यारह

मैंने लाल एक पत्थर को क़रीब से देखा।
वह हिल रहा था।
मैंने उसे उठाने की कोशिश की।
मेरी उँगलियों में से सरक कर
वह वापिस ज़मीन पर जा बैठा।

बारह

बर्फ़ पर
काले-काले शब्द बिखरे पड़े हैं।
ज़रूर यहाँ कोई फिसला होगा।
जाते हुए
वह अपने शब्द लेना भूल गया।

तेरह

मैं तुम्हें रोज़ मिलने आती हूँ।
तुम रोज़ मुझे भूल जाते हो।

तुम्हारी आँखें मुझे देखती हैं
जैसे वे
किसी अजनबी को देख रही हों।

कल मैं यदि
आऊँगी नहीं,
तुम्हें पता कैसे चलेगा
कि मैं नहीं आई?

तब भी,
मैं आऊँगी,
तुम्हारे पास बैठूँगी,
बातें करूँगी,

यूँ कि जैसे
तुम मुझे पहचानते हो,
बहुत समय से जानते हो।

चौदह

आज फिर मैं वहाँ गया था।
आज फिर वह वहाँ नहीं थी।

कुछ काँटे वहाँ थे,
कुछ सूखे हुए फूल
और रेत पर कुछ पैरों के निशान
कहीं जाते हुए…

पंद्रह

वह चली गई।

जाते हुए
अपना कोई चिह्न तक
न छोड़ गई।

मैं वैसे ही खड़ा था—
उतना ही वंचित—
जैसे उस दिन जब वह मिली थी।

सोलह

तुम्हें भूल जाऊँ।
तुम्हें ढूँढूँ भी तो तुम मुझे नज़र नहीं आओ।
मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी स्मृति के सबसे दूर वाले कक्ष में चली जाओ,
इस तरह
कि मैं तुम्हारी छवि को भी
गढ़ नहीं पाऊँ।
या फिर
तुम मेरी विस्मृति में विलीन हो जाओ।

सत्रह

कल फिर उसे देखा।
देहविहीन वह वहाँ पर घूम रही थी।
कैसे वह हँस रही थी, बोल रही थी, सुन रही थी!
उसने मेरे हाथ को छुआ—हवा का
हल्का-सा एक झोंका
जैसे उसे छू गया।
मेरी भी बस रूह मात्र वहाँ थी।

अठारह

वह लौट आई है।
कितने वर्षों बाद!
मरु में गुलाबी एक फूल की तरह।
वह चली गई थी।
लेकिन मेरी स्मृति में वह थी,
कई बार बिल्कुल मेरे पास।

देखो वह वही है!
अब भी फूल चुन रही है!

रेत में झुककर
कुछ देख रही है!

उन्नीस

यूँ ही पड़ी रहेगी यह राह
इस वीराने में।

फिर धीरे-धीरे मिट जाएगी।


रुस्तम हिंदी के समादृत कवि-लेखक-अनुवादक हैं। उनके हिंदी में नौ कविता संग्रह प्रकाशित हैं, जिनमें से एक संग्रह किशोरों के लिए है। ‘सदानीरा’ पर इस प्रस्तुति से पूर्व प्रकाशित उनकी कविताओं, गद्य और अनुवाद-कार्य के लिए यहाँ देखिए : रुस्तम

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