उस दिन के लिए जो कभी नहीं आता

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निकानोर पार्रा की कविता ::
अनुवाद : प्रचण्ड प्रवीर

निकानोर पार्रा

आख़िरी जाम

चाहे हम मानें या न मानें
हमारे पास केवल तीन विकल्प हैं :
कल, आज और कल
और ये तीन भी नहीं
क्योंकि सुधी जन कहते हैं
कल जो कल है
अब हमारी स्मृति में ही है

एक उखड़े हुए गुलाब से
और पंखुड़ियाँ नहीं निकाली जा सकतीं

जिन पत्तों से बाज़ी होगी
वे केवल दो ही हैं :
वर्तमान और भविष्य
और ये दो भी नहीं हैं
क्योंकि यह माना हुआ तथ्य है
कि वर्तमान कहीं नहीं है
सिवाय बीतते समय की धार पर
और यह खप जाता है—
यौवन की तरह

अंत में
हमारे पास केवल
आने वाला कल रह जाता है

मैं अपना प्याला उठाता हूँ
उस दिन के लिए
जो कभी नहीं आता
लेकिन यही सब कुछ है
जो हमारे पास है विधान के लिए

***

प्रचण्ड प्रवीर कथा और दर्शन के इलाक़े में सक्रिय हैं. हिंदी और अँग्रेज़ी दोनों में लिखते हैं. हिंदी में एक उपन्यास, एक कहानी-संग्रह और सिनेमा से संबंधित एक किताब प्रकाशित है. उनके बारे में और जानकारी के लिए prachandpraveer.com पर जाया जा सकता है.

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