नोबेल-व्याख्यान ::
चेस्लाव मीलोष
अनुवाद : उदय शंकर

चेस्लाव मीलोष (1911-2004)

एक

इस मंच पर मेरा आसीन होना उन सबके लिए एक युक्ति हो सकती है जो ईश्वर-प्रदत्त अद्भुत रूप से जटिल और सुंदर, जीवन की अनिश्चितता की प्रशंसा करते हैं।

मैं अपने स्कूल के दिनों में पोलैंड में प्रकाशित ‘नोबेल पुरस्कार विजेताओं के पुस्तकालय’ शृंखला के खंडों को पढ़ा करता था। अक्षरों की आकृति और काग़ज़ के रंग मेरी स्मृति में हैं। तब मेरी कल्पना में यह था कि नोबेल पुरस्कार विजेता वे लेखक हैं जो गद्य की मोटी पुस्तकें लिखते हैं। जब बाद में पता चला कि उनमें कुछ कवि भी हैं, तब भी मेरी पूर्व-धारणा पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। मेरे विश्वविद्यालय की पत्रिका में जब 1930 में मेरी शुरुआती कविताएँ छपीं, तब निश्चित ही ‘लेखक’ पदवी से ख़ुद को जोड़ने की आकांक्षा नहीं थी। यहाँ तक कि बहुत बाद में एकांत ग्रहण कर और अजीबोग़रीब पेशे में पड़कर, फ़्रांस और अमेरिका में रहकर पोलिश कविताएँ लिखते हुए मैंने कवि की एक निश्चित आदर्श छवि बरक़रार रखने की कोशिश की : यदि कोई कवि प्रसिद्धि चाहता है तो वह अपने पुश्तैनी गाँव-क़स्बे में ही प्रसिद्ध होना चाहता है।

नोबेल पुरस्कार विजेताओं में से एक जिन्हें मैंने बचपन में पढ़ा था, उन्होंने काफ़ी हद तक कविता-संबंधी मेरी धारणा को प्रभावित किया है, ऐसा मेरा विश्वास है। वह थीं—सेल्मा लेगरलोफ़। उनकी पुस्तक ‘नील्स् के अद्भुत साहसिक कारनामे’ मुझे बहुत पसंद है। इसमें उन्होंने नायक को दोहरी भूमिका सौंप दी है। वह पृथ्वी के ऊपर उड़ता है और वहाँ से नीचे देखता है, साथ ही साथ सारी बारीकियों पर भी नज़र रखता है। यह दोहरी दृष्टि शायद कवि-कर्म का रूपक हो सकती है। मुझे सत्रहवीं सदी के कवि माचे सरबिस्कि के, जिन्हें कभी पूरे यूरोप में कासिमिर के नाम से जाना जाता था, एक लैटिन स्त्रोत में इसी तरह का एक रूपक मिला। वह मेरे विश्वविद्यालय में काव्य-शास्त्र पढ़ाते थे। उस स्त्रोत में वह अपने कवि-दोस्तों से मिलने के लिए बिल्नियस से एंटवर्प तक पेगासस के पीठ पर बैठकर की गई एक यात्रा का ज़िक्र करते हैं। नील्स् की तरह ही वह उड़कर नीचे में बहती हुई नदियों, झीलों और जंगलों को देखता है, यानी पूरे परिदृश्य को, जो कि दूरस्थ और मूर्त दोनों है। अतः कवि की दो विशेषताएँ हैं, एक आँखों में व्याप्त उत्सुकता, और वह जो देखता है उसका वर्णन करने की इच्छा। तब भी, यदि कोई कविता को देखने और वर्णन करने की चीज़ मानता है तो उसे सावधान होना चाहिए कि एक तो वह आधुनिकतावाद के साथ कलह में संलग्न और साथ ही साथ उस पर मोहित होता है, क्योंकि यह एक विशिष्ट काव्य-भाषा के असंख्य सिद्धांतों से लैस है।

हर कवि अपने उन पुरानी पीढ़ियों पर आश्रित है, जो अपनी मातृभाषा में लिखते थे। वह उन शैलियों और रूपों का वारिस होता है, जिन्हें उसके पूर्वजों ने गढ़ा है। बावजूद, अभिव्यक्ति के वे पुराने तरीक़े उसे ख़ुद के अनुभव की अभिव्यक्ति के लिए नाकाफ़ी लगते हैं। ख़ुद को नए रूप में ढालते समय वह एक आंतरिक आवाज़ सुनता है, जो उसे मुखौटे और छद्म-वेष धारण करने के प्रति सचेत करता है। फिर भी यदि वह विद्रोह करता है, तब वह अपने समकालीनों और अवाँगार्द के विभिन्न आंदोलनों की शरण में जा पड़ता है। अफ़सोस की बात कि अपनी पहली कविता-पुस्तक का प्रकाशन ही उसके लिए काफ़ी होता कि वह ख़ुद को फँसा हुआ महसूस करता! अभी छपाई की पक्की स्याही सूखी भी नहीं थी कि जो लेखन उसे अपना सबसे निजी लग रहा था, वह दूसरे के अंदाज़ में उलझा नज़र आता है। आत्मग्लानि के इस धुंधलके से उबरने का एकमात्र तरीक़ा ‘आत्मशोध का नैरंतर्य’ और नई पुस्तक का प्रकाशन है, लेकिन यह सब अपने क्रम को फिर से दोहराने लगता है; इसलिए उबरने के इस प्रयास का कोई अंत नहीं है। यह संभव है कि पहले जो कुछ भी किया है, उससे सतत पलायन की यात्रा में अपनी पुस्तकों को साँप के केंचुल की तरह छोड़कर आगे बढ़ जाने के लिए उसे नोबेल पुरस्कार मिलता है।

वह गूढ़ आवेग क्या है जो हमें संपन्न, निःशेष (हो चुकी रचना) में सहज रहने नहीं देता है? मेर हिसाब से यह यथार्थ का आत्मशोध है। मैं इस शब्द को इसका एक सीधा-सादा और गरिमापूर्ण अर्थ देता हूँ; एक अर्थ, जिसका पिछली कई एक शताब्दियों की दार्शनिक बहसों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह पृथ्वी है—बतख़ की पीठ पर बैठे नील्स् और पेगासस की पीठ पर बैठे लैटिन स्रोत के लेखक के द्वारा देखी गई पृथ्वी। निःसंदेह वह पृथ्वी है, और उसकी समृद्धि किसी भी विवरण से क्षीण नहीं हो सकती है। इस तरह का दावा करना उस प्रश्न को अग्रिम रूप से नकार देना है, जिसे आजकल अक्सर सुनते हैं : कि यथार्थ क्या है? क्योंकि यह पोंशस पाइलट के प्रश्न की तरह ही है कि सत्य क्या है? विरोधों की जोड़ियों में, जिसका हम अक्सर इस्तेमाल करते हैं, जीवन और मृत्यु जैसे जोड़ी का जो महत्त्व है, सत्य और असत्य, यथार्थ और भ्रम जैसे जोड़ियों को भी कम महत्त्व नहीं मिलना चाहिए!

दो

सिमोन वेल, जिनके लेखन का मैं गहरा ऋणी हूँ, कहती हैं : ‘‘दूरी सुंदरता की आत्मा होती है।’’ फिर भी कभी-कभी दूरी बनाए रखना लगभग असंभव होता है। मैं यूरोप का एक बच्चा हूँ, जैसा कि मेरी एक कविता का शीर्षक स्वीकार करता है; लेकिन यह एक कड़वी और व्यंग्यात्मक स्वीकारोक्ति है। मैं एक आत्मकथात्मक पुस्तक का लेखक भी हूँ, जिसका फ़्रेंच अनुवाद में शीर्षक ‘एक और यूरोप’ (Une autre Europe) है। निःसंदेह दो यूरोप मौजूद हैं, हम दूसरे वाले यूरोप के निवासी के लिए बीसवीं सदी के ‘अँधेरे का हृदय’ होना नियति थी। सामान्यतः कविता के बारे में कैसे बोलना है, यह मुझे नहीं पता। देशकाल की अजीबोग़रीब परिस्थितियों से कविता की मुठभेड़ पर मुझे अवश्य बात करनी चाहिए। एक लिहाज़ से आज हम उन घटनाओं की रूपरेखा को चिह्नित करने में सक्षम हैं, जिसने अपनी मृत्यु-वाहिनी क्षमता में तमाम ज्ञात प्राकृतिक आपदाओं को धता बता दिया है, लेकिन कविता—मेरी या मेरे समकालीनों की, परंपराशील या अवाँगार्द, उन आपदाओं से निपटने के लिए तैयार नहीं थी। हम प्रलोभनों के चक्कर में अंधे आदमियों की तरह रास्ता टटोलते थे, वे प्रलोभन इस सदी में हमारे ही दिमाग़ों से उपजे थे। यथार्थ को विभ्रम से अलगाना मुश्किल है, ख़ासकर, जब कोई एक महान उथल-पुथल के युग में जीता हो—जिसकी शुरुआत तो कुछ सदियों पहले यूरोपीय-एशियाई महाद्वीप के एक छोटे से पश्चिमी प्रायद्वीप से हुई थी—जब एक व्यक्ति के जीवन-काल जितने समय में ही विज्ञान प्रौद्योगिकी की महिमा ने पृथ्वी को आच्छादित कर लिया। प्रकृति पर प्रभुत्व के विचारों के समान मानव जाति पर प्रभुत्व के पतित विचारों ने, लाखों मनुष्यों के भौतिक-आध्यात्मिक क्षति की क़ीमत पर, यूरोप के जिन क्षेत्रों में क्रांति और युद्ध का आवेग पैदा किया; वहाँ कई एक बौद्धिक प्रलोभनों का विरोध करना विशेष रूप से कठिन था।

बावजूद इसके हमारे पास शायद सबसे क़ीमती संचयन वे विचार नहीं हैं, जिन्हें हमने उनके सबसे मूर्त रूप में छुआ है; बल्कि कुछ चीज़ों के प्रति हमारा सम्मान और हमारी कृतज्ञता है जो आंतरिक विघटन और अत्याचार से लोगों की रक्षा करती है। ठीक इसी कारण से जीवन जीने की कुछ पद्धतियाँ, कुछ संस्थाएँ और सबसे अधिक लोगों के आवयविक संबंध, जो ख़ुद को देखने के नज़रिए, परिवार, धर्म, पड़ोस, साझा विरासत से निर्मित हैं; बुरी ताक़तों के प्रकोप का निशाना बन गए। दूसरे शब्दों में सभी तरह की बेतरतीब और अतार्किक मानवता को, संकीर्ण आसक्तियों और वफ़ादरियों के कारण, अक्सरहाँ उपहास-योग्य पदवी दी जाती है। कई देशों में नागरिकता के पारंपरिक बंधन धीरे-धीरे क्षरण के कगार पर पहुँच गए हैं, और इसके पहले कि उन्हें पता चलता; मूल निवासी प्रवासी बना दिए गए। हालाँकि यह उन जगहों के लिए अलग बात है, जहाँ अचानक से उपजी ख़तरे की स्थिति में उन संबंधों का रक्षात्मक और जीवनदायिनी मूल्य सामने आता है। मेरी पुश्तैनी जगह का मामला यही है।

यह उचित अवसर है कि मैंने और मेरे दोस्तों ने यूरोप के अपने हिस्से में जो उपहार ग्रहण किए, मैं उनका ज़िक्र करता और आशीर्वचन बोलता हूँ।

एक छोटे-से देश में जन्म लेना अच्छा है, जहाँ प्रकृति मानवीय है और सदियों से जहाँ विभिन्न भाषाओं और धर्मों का सहअस्तित्व रहा है। मैं लिथुआनिया की बात कर रहा हूँ, जो मिथकों और कविताओं का देश है। मेरा परिवार पहले से ही, सोलहवीं शताब्दी में, पोलिश बोलता था—ठीक वैसे ही जैसे फ़िनलैंड के कई परिवार स्वीडन और आयरलैंड में—अँग्रेज़ी बोलते हैं; इसलिए मैं पोलिश कवि हूँ, लिथुआनियाई नहीं। लेकिन लिथुआनिया की प्राकृतिक छटाओं और शायद, लिथुआनिया के भूतों (आत्मा!) ने मुझे कभी नहीं छोड़ा। रोमन कैथोलिक आस्था-तंत्र और दर्शन में पारंगत होने के लिए बचपन में गिरजाघर के अंदर लैटिन में प्रवचन सुनना और हाई स्कूल में ओविड (रोमन कवि) का अनुवाद करना अच्छा है। जिसके भाग्य में बिल्नियस जैसे शहर में स्कूल और विश्वविद्यालय की पढ़ाई करना लिखा है, उसे इसे आशीर्वाद समझना चाहिए! पत्थर-दर-पत्थर इतिहास से लैस बरोक वास्तुकला का यह विचित्र शहर, चालीस रोमन कैथोलिक गिरजाघरों और यहूदियों के कई एक मंदिरों का शहर, उत्तर के जंगलों में स्थापित है। उन दिन यहूदी लोग इसे उत्तर का येरूसलम कहते थे।

अमेरिका में अध्यापन के दौरान ही मुझे अंततः एहसास हुआ कि अपने प्राचीन विश्वविद्यालय की मोटी दीवारों से, दिल से सीखे रोमन क़ानून के सूत्रों से, पुराने पोलैंड के इतिहास और साहित्य से मैंने कितना कुछ आत्मसात् किया था, यह सब युवा अमेरिकियों को अपनी-अपनी विशिष्टताओं से आश्चर्यचकित करते हैं : एक क़ाबिल-ए-बर्दाश्त अराजकता, भयंकर झगड़ों को निपटाने वाला हास्य, आवयविक समुदाय की भावना, किसी भी केंद्रीकृत सत्ता पर अविश्वास।

इस तरह की दुनिया में पले-बढ़े कवि को चिंतन के माध्यम से यथार्थ का साधक होना चाहिए था। एक पितृसत्तात्मक व्यवस्था, घंटियों की आवाज़, दबावों और साथियों के दृढ़ आग्रह के फलस्वरूप उपजे अलगाव, एक मठ-कक्ष की चुप्पी उसे प्रिय होनी चाहिए थी। यदि किताबें मेज़ के ऊपर रखने के लिए थीं, तब उन्हें ईश्वर द्वारा निर्मित वस्तुओं, मुख्यतः सत् (being), के अकल्पनीय गुणों के बारे में निबंध होना था। लेकिन अचानक यह सब इतिहास की राक्षसी गतिविधियों द्वारा नकार दिया जाता है, जो एक रक्तपिपासु देवता के सारे लक्षणों से लैस होता है। कवि ने अपनी उड़ान में जिस पृथ्वी को देखा, वह वास्तव में रसातल से पुकारती है और ख़ुद को ऊपर से देखने की अनुमति नहीं देती है। जिस पृथ्वी को कवि ने अपनी उड़ान में देखा था, वास्तव में वह रसातल से पुकारती है और ख़ुद को ऊपर से देखने की इजाज़त नहीं देती है। एक असाध्य अंतर्विरोध प्रकट होता है, बहुत ही वास्तविक, जो न दिन को चैन से रहने देता है न रात को, जो भी कहते हों, यह सत् और कार्रवाई के बीच का अंतर्विरोध है, या, दूसरे स्तर पर, कला और जनता के साथ एकजुटता के बीच का अंतर्विरोध है। यथार्थ ख़ुद को शब्दों में परिभाषित होने की माँग करता है, लेकिन यह असहनीय है, यदि उसे स्पर्श करते हैं और आस-पास की एक क़रीबी आकृति उभरती है तो कवि की ज़ुबान ‘अय्यूब की शिकायत’ भी नहीं कर सकती है : कार्रवाई (एक्शन) की तुलना में सारी कलाएँ तुच्छ साबित होती हैं। दूसरी ओर, यथार्थ को—जो बुराई और अच्छाई, निराशा और आशा की अपनी सभी शाश्वत जटिलताओं में संरक्षित है—इस तरह से गले लगाना सिर्फ़ दूर से ही, केवल उससे ऊपर उठकर ही संभव है; लेकिन वापस मुड़ते ही यह नैतिक विश्वासघात लगता है।

बीसवीं शताब्दी में उत्पन्न संघर्षों के मूल में यही अंतर्विरोध जड़ जमाकर बैठ गया, जिसे जनसंहार के अपराध से दूषित पृथ्वी पर कवियों द्वारा खोजा गया। ऐसे ही कवियों में से एक, जिसने कुछ कविताएँ लिखीं, क्या वह अपने समय की याद-दहानी के बतौर, एक साक्ष्य के बतौर उपस्थित होता है? वह सोचता है कि वे एक दर्दनाक अंतर्विरोध से पैदा हुए थे, काश वे उसे हल करने में सक्षम होते; ताकि अपने काव्य को अलिखित छोड़ देते।

तीन

निर्वासन में रहने वाले सभी कवियों के, जो सिर्फ़ स्मृति में अपने शहरों और प्रांतों का दौरा करते हैं, संरक्षक ऋषि हमेशा दांते हैं। लेकिन फ्लोरेंस की संख्या कैसे बढ़ी! आज एक कवि का निर्वासन अपेक्षाकृत हाल की खोज की एक सामान्य प्रक्रिया हो : कि जिसके पास ताक़त है, वह न सिर्फ़ सेंसरशिप का निषेध कर, बल्कि शब्दों के अर्थ को बदलकर भी भाषा को नियंत्रित करने में सक्षम है। एक अजीबोग़रीब घटना सामने आती है : एक बंदी समुदाय की भाषा कुछ टिकाऊ आदतों में रूढ़ हो जाती है; यथार्थ के सभी क्षेत्रों का अस्तित्व सिर्फ़ इसलिए समाप्त हो जाता है, क्योंकि उनका कोई नाम नहीं है। ऐसा लगता है कि साहित्य के सिद्धांतों (as Écriture), भाषण—जो ख़ुद के ही उगले को खाता है, और अधिनायकवादी (सर्वसत्तावादी) राज्य की बढ़त को कोई छुपी हुई कड़ी जोड़ती है। कहीं कोई कारण नहीं दिखता है कि गद्य-पद्य लिखने जैसे रचनात्मक गतिविधि को, यदि वह अपने संदर्भों की स्वायत्त-प्रणाली की उपज और अपनी सीमाओं में बँधे हैं, राज्य-सत्ता को क्योंकर बर्दाश्त नहीं करना चाहिए! यदि हम सिर्फ़ यही मान लें कि एक कवि यथार्थ की खोज में उधार की शैलियों से ख़ुद को मुक्त करने का निरंतर प्रयास करता है, तो क्या वह ख़तरनाक है। जहाँ कमरे के अंदर लोग चुप रहने की साज़िश में सर्वसम्मत हैं, वहाँ सच का एक शब्द पिस्तौल से निकली गोली-सा आवाज़ करता है। और यह दुखद है कि इसे उच्चरित करने का लालच, जो कि खुजलाहट की तरह, हमें ग्रस लेता है, जहाँ कुछ और सोचने का अवकाश नहीं होता है।

इसीलिए, एक कवि आंतरिक या बाह्य निर्वासन को अंगीकार करता है। हालाँकि यह ज़रूरी नहीं है कि वास्तविकता के प्रति अपनी चिंता-विशेष की वजह से ही यह हो। शायद वह इससे और अन्य जगहों से, अन्य देशों में, अन्य तटों पर, मुक्त होने की कामना रखता है; ताकि कुछ लम्हों के लिए ही सही वह अपनी सच्ची वृत्ति-सत्-चिंतन (to contemplate Being) को पा सके।

यह उम्मीद ‘दूसरे यूरोप’ से संबंधित लोगों के लिए भ्रामक है। वे जहाँ कहीं भी रहते हैं, उनका अनुभव नए परिवेश से उन्हें किस हद तक पृथक करता है, यह ध्यातव्य है। और संभव है कि यह उनकी नई सनक (obsession) का कारण बन सकता है। जनसंचार के शानदार प्रचार के साथ निरंतर छोटा होता हुआ हमारा यह ग्रह एक ऐसी प्रक्रिया का साक्षी बन रहा है जो—याद करने से ही इनकार की तर्ज़ पर—ख़ुद को परिभाषित होने से पलायन करता है। यह सच है कि पिछली शताब्दियों के अनपढ़, जो आबादी में बहुसंख्यक थे, अपने-अपने देशों और अपनी सभ्यता के बारे में बहुत थोड़ा जानते थे। आधुनिक निरक्षरों के दिमाग़ में, जो पढ़ना-लिखना जानते हैं, यहाँ तक कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाते हैं, इतिहास उपस्थित है—लेकिन धुंधले रूप में, अजीब भ्रम की स्थिति में, जहाँ मोलिए (Molière) नेपोलियन के तो वॉल्तेयर लेनिन के समकालीन हैं। साथ ही, पिछले दशकों की घटनाएँ, जो मुख्यतः इस पर निर्भर थीं कि ज्ञान या अज्ञान ही मानव जाति के निर्णायक तत्त्व हैं, दूर होती जाती हैं, फीकी पड़ती जाती हैं, अपनी स्थिरता खोती जाती हैं, जैसे फ़्रेडरिक नीत्शे की यूरोपीय शून्यवाद (nihilism) की भविष्यवाणी अपनी सटीक पूर्णता को प्राप्त करती है। 1887 में उसने लिखा, ‘‘एक शून्यवादी की आँख अपनी ही स्मृतियों के प्रति उसका विश्वासघात है : वह उन्हें नग्न, पत्रहीन होने देता है : वह जो ख़ुद के लिए नहीं करता, वही मानवजाति के संपूर्ण अतीत के लिए भी नहीं करता है : वह उसे रसातल में जाने देता है।’’ आज हम सहजबोध और अच्छाई-बुराई की आधारभूत धारणा के विपरीत अतीत की (के बारे में) कपोल-कथाओं से घिरे हुए हैं। ‘द लॉस एंजिल्स टाइम्स’ ने हाल ही में लिखा कि विभिन्न भाषाओं में नरसंहार (होलोकास्ट) को कपोल-कल्पित बताने वाली, और यह यहूदी प्रोपेगेंडा है, पुस्तकों की संख्या एक सौ से अधिक हो गई है। यदि इस तरह की विक्षिप्तता संभव है तो क्या मस्तिष्क की स्थायी अवस्था के रूप में स्मृति का संपूर्ण विनाश क्या असंभव है? और क्या यह आनुवंशिक अभियांत्रिकी (जेनेटिक इंजीनियरिंग) या प्राकृतिक वातावरण को दूषित करने से कहीं ज़्यादा गंभीर ख़तरा पेश नहीं करेगा?

नरसंहार (होलोकास्ट) के नाम से अंकित घटनाएँ ‘दूसरे यूरोप’ के कवियों लिए एक यथार्थ हैं, समय में इतने समीप कि स्मृति में उनकी सतत उपस्थिति से वह, शायद, डेविड के स्तोत्रों का अनुवाद करके ही मुक्त हो सकता है। वह व्यग्र हो उठता है, जब देखता है कि होलोकास्ट शब्द का अर्थ उत्तरोत्तर संशोधनों से गुज़रता है; ताकि यह शब्द यहूदियों के इतिहास संबंधी लगने लगे, जैसे कि पीड़ितों में लाखों पोलिश, रूसी, यूक्रेनियन और अन्य राष्ट्रीयताओं के क़ैदी थे ही नहीं। वह व्यग्र हो उठता है, जब उसे निकट भविष्य का पूर्वाभास होता है कि टेलीविजन पर प्रसारित बातों को ही इतिहास समझ लिया गया है; सच्चाई जो कि बहुत जटिल है और यदि उसे पूरी तरह नष्ट नहीं किया गया है तो उसे अभिलेखागारों में दफ़ना दिया जाएगा। अन्य तथ्य भी, जो कि उसके लिए समीपी तथ्य; लेकिन पश्चिम के लिए दूर की कौड़ी, यथा टाइम मशीन वाले एच.जी. वेल्स की समझदारी की विश्वसनीयता उससे संलग्न हो जाती है : लापरवाह, स्मृति से वंचित—इसी तरह इतिहास से वंचित, निहत्थे, दिन के बच्चों की जमात पृथ्वी पर रहती थी जो भूमिगत गुफाओं में रहने वाले रात के नरभक्षी बच्चों की जमात से भीड़ गई।

तकनीकी-परिवर्तन के आंदोलन के चलते हम महसूस करते हैं कि हमारे ग्रह के एकीकरण की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है और हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय की धारणा को महत्त्व देते हैं। वे दिन जब राष्ट्र संघ और संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई थी, याद किए जाने की हैसियत रखते हैं। दुर्भाग्य से वे तारीख़ें एक अन्य तारीख़ की तुलना में अपना महत्त्व खो देती हैं, जिसे हर साल शोक-दिवस के रूप में मनाना चाहिए, जबकि युवा पीढ़ी को यह शायद ही पता हो। यह तारीख़ 23 अगस्त 1939 है। तब दो तानाशाहों ने एक गोपनीय समझौता किया, समझौते के एक अनुच्छेद के आधार पर अपनी राजधानियाँ, अपनी सरकारों, अपने संसद वाले पड़ोसी मुल्कों को उन्होंने आपस में बाँट लिया। उस समझौते ने न केवल एक भयानक युद्ध छेड़ा; बल्कि एक औपनिवेशिक सिद्धांत को पुनर्स्थापित किया कि राष्ट्र मवेशियों से अधिक नहीं हैं, जिन्हें ख़रीदा गया, जिन्हें बेचा गया और जो पूरी तरह से अपने तात्कालिक स्वामी की इच्छा पर निर्भर हैं। उनकी सीमाएँ, आत्मनिर्णय का उनका अधिकार, उनके पासपोर्ट का अस्तित्व समाप्त हो गया। चालीस साल पहले इस सिद्धांत को तानशाहों द्वारा लागू किए जाने के बारे में आज लोग जब फुसफुसाकर, होंठों पर उँगली रखकर बात करते हैं तो इसे देखकर कोई सिर्फ़ चकित ही हो सकता है। मानवाधिकारों के ख़िलाफ़ अपराध, जिसे न कभी स्वीकार किया गया और न ही जिसकी सार्वजनिक रूप से निंदा की गई, एक ज़हर है जो राष्ट्रों के बीच दोस्ती की संभावना को नष्ट कर देता है।

पोलिश कविताओं के संकलन में मेरे दोस्तों वुअदिस्वाव सेबीवा और लेह पिवोवार की कविताएँ छपती हैं, और उनकी मृत्यु की तारीख़ देते हैं—1940। यह लिखने में सक्षम नहीं होना कितना बेतुका है कि वे कैसे मारे गए, हालाँकि पोलैंड में हर कोई जानता है कि उन्होंने उन हज़ारों पोलिश अधिकारियों की नियति से ख़ुद को साझा किया, जिन्हें उस समय के हिटलर के सहयोगियों द्वारा निहत्था और नज़रबंद किया गया और वे सब एक सामूहिक क़ब्र में आराम फरमाते हैं। और क्या पश्चिम की युवा पीढ़ी को, जो इतिहास पढ़ते हैं, वारसा शहर में हुए दो लाख लोगों के क़त्लेआम के बारे में नहीं सुनना चाहिए, जिस शहर को दो साथी सहयोगियों द्वारा नेस्तनाबूत करने की सज़ा सुनाई गई थी।

दोनों नरसंहारक तानाशाह अब नहीं रहे, पर कौन कह सकता है कि उन्होंने अपनी सेनाओं की जीत से ज़्यादा स्थायी जीत अर्जित न की हो? जब, अटलांटिक चार्टर के अस्तित्व के बावजूद भी, यह सिद्धांत कि राष्ट्र, अगर वे ताश की पत्तियाँ या चौसर के पासे न भी हों, विनिमय की वस्तु हैं, यूरोप के दो भागों में विभाजन से यह सिद्ध हुआ। संयुक्त राष्ट्र से तीन बाल्टिक राष्ट्रों की अनुपस्थिति दोनों तानाशाहों की विरासत का स्थायी स्मृति-पट है। युद्ध से पहले वे देश राष्ट्र संघ के थे, लेकिन 1939 के समझौते में गुप्त अनुच्छेद के परिणामस्वरूप वे यूरोप के मानचित्र से ग़ायब हो गए।

मुझे उम्मीद है कि स्मृतियों के ज़ख़्म को इस तरह कुरदने के लिए आप क्षमा करेंगे! यह विषय मेरे ‘यथार्थ’ शब्द संबंधी, जिसका बहुत ही दुरुपयोग हुआ है; लेकिन हमेशा सम्मान के योग्य है, चिंतन से एकदम कटा हुआ नहीं है। लोगों की शिकायतें, उन लोगों की तुलना में अधिक विश्वासघाती हैं जिनके बारे में हम थ्यूसीदाइदीज में पढ़ते हैं, मेपल के पत्ते का आकार, समुद्र के ऊपर सूर्योदय और सूर्यास्त, कार्य-कारण संबंध का पूरा ताना-बाना, चाहे हम इसे प्रकृति कहें या इतिहास, एक और छिपे हुए यथार्थ की ओर इशारा करता है—अभेद्य, हालाँकि एक शक्तिशाली आकर्षण है और यही सभी कला और विज्ञान की केंद्रीय प्रेरक शक्ति है। ऐसे क्षण आते हैं, जब मुझे लगता है कि ‘अन्य यूरोप’ पर पड़ने वाली यातनाओं को मैं समझता हूँ, और इसका अर्थ है उन्हें स्मृतियों का वाहक बनाना, ऐसे समय में जब बिना विशेषण वाले यूरोप में और अमेरिका में यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी छीजता जा रहा है। यह संभव है कि ज़ख़्म भरे स्मृतियों के अतिरिक्त कोई और स्मृति हो ही नहीं, जैसा कि बाइबल और इजराइल-संबंधी विपत्तियों के बारे में एक किताब हमें बताता है। उस पुस्तक ने लंबे समय तक निरंतरता की भावना को—जो कि आजकल का चलताऊ (फ़ैशनेबल) पद ऐतिहासिकता नहीं है—बनाए रखने में यूरोपीय राष्ट्रों को सक्षम बनाया।

अपने तीस साल के प्रवास में मैंने महसूस किया है कि अपने पश्चिमी सहयोगियों की तुलना में, चाहे लेखक हों या साहित्य के शिक्षक, मैं अधिक विशेषाधिकार प्राप्त हूँ, क्योंकि हाल की घटनाएँ हों या सुदूर अतीत की, दोनों की तीव्र और सटीक छाप मेरे मन-मस्तिष्क पर पड़ी है। पश्चिमी दर्शकों को पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया या हंगरी में लिखी गई कविताओं या उपन्यासों से जूझना पड़ा, या वहाँ निर्मित फ़िल्मों के समक्ष संभवतः उसी तीव्र चेतना का सामना करना पड़ा, सेंसरशिप की सीमाओं से निरंतर संघर्ष के बावजूद। स्मृति हमारी शक्ति है, यह आइवी (पौधा/लता) की तरह, जब उसे किसी पेड़ या दीवार पर समर्थन नहीं मिलता है तो ख़ुद से ही ख़ुद को जकड़ता है, उलझाऊ भाषणबाज़ी से हमारी रक्षा करती है।
अभी कुछ मिनट पहले जनता के साथ एकजुटता की भावना और कवि की पेशेवर तटस्थता के बीच के अंतर्विरोध के ख़ात्मे की सदिच्छा मैंने व्यक्त की। कवि के पेशेगत रूपक के बतौर यदि हम धरती से ऊपर उड़ान भरते हुए तो तत्काल ही ध्यान में आ जाता है कि एक तरह का अंतर्विरोध निहित है, उन युगों में भी जब कवि इतिहास के फंदे से अपेक्षाकृत मुक्त था। धरती से ऊपर उड़ान में होते हुए धरती को संपूर्ण बारीकियों में देखना, यह दोनों कैसे संभव है? विरुद्धों के बीच के संदिग्ध संतुलन में काल-प्रवाह द्वारा प्रदत्त मानसिक अंतराल से एक नियत संतुलन संभव है।

‘देखने’ का अर्थ केवल अपनी आँखों के समक्ष पाना नहीं है। इसका अर्थ स्मृति में संरक्षित करना भी हो सकता है। ‘देखने और वर्णन करने’ का अर्थ अपनी कल्पना में पुनर्निर्मित करना भी हो सकता है। समय के रहस्य से प्राप्त मानसिक अंतराल द्वारा घटनाओं, परिदृश्यों, मानवीय चेहरों को तेजी से लुप्त होती छाया की एक उलझन में नहीं बदलना है। इसके विपरीत, यह उन्हें पूर्ण प्रकाश में दिखा सकता है, ताकि प्रत्येक घटना, प्रत्येक तिथि अर्थपूर्ण बन जाए और मानवीय नीचता और मानवीय महत्ता के शाश्वत यादगार के रूप में क़ायम रहे। जो जीवित हैं, वे हमेशा के लिए चुप रहने वालों से आदेश प्राप्त करते हैं। वे अपने कर्तव्यों को तभी पूरा कर सकते हैं जब वे, और अतीत को कल्पनाओं और किंवदंतियों से हटाकर, चीज़ों को ठीक वैसे ही फिर से बनाने की कोशिश करें जैसे वे थीं। इस तरह, इस शाश्वत क्षण में ऊपर से दृष्ट एवं चिर विद्यमान धरती दोनों ही काव्य के हेतु हो सकते हैं।

चार

मैं यह धारणा नहीं बनाना चाहता कि मेरा मन अतीत में रमता है, क्योंकि यह सच नहीं है। अपने सभी समकालीनों की तरह मैंने निराशा और आसन्न बर्बादी के दबाव को महसूस किया है और एक शून्यवादी (निहलिस्ट) प्रलोभन के आगे घुटने टेकने के लिए ख़ुद को फटकार लगाई है। फिर भी, मेरा मानना है कि गहरे स्तर पर मेरी कविता स्वस्थ बनी रही और एक अँधेरे युग में शांति और न्याय के राज्य की तड़प व्यक्त करती रही। एक ऐसे व्यक्ति का नाम यहाँ लेना चाहिए, जिसने मुझे निराश न होना सिखाया। हमें न केवल अपनी जन्मभूमि से, इसकी झीलों और नदियों, इसकी परंपराओं, बल्कि लोगों से भी उपहार मिलते हैं, ख़ासकर जवानी के शुरुआती दिनों में मिले शक्तिशाली व्यक्तित्व से। यह मेरा सौभाग्य था कि रिश्तेदार ऑस्कर मीलोष, जो कि एक पेरिसियन वैरागी और दूरद्रष्टा थे, ने मेरे साथ लगभग अपने बेटे जैसा व्यवहार किया। वह एक फ़्रांसीसी कवि क्यों थे, इसे एक परिवार की जटिल कहानी के साथ-साथ ग्रैंड डची ऑफ़ लिथुआनिया कहे जाने वाले देश की जटिल कहानी से स्पष्ट किया जा सकता है। हाल ही में पेरिस के प्रेस में पश्चाताप के शब्दों को पढ़ना संभव हुआ कि आधी सदी पहले एक कवि को सर्वोच्च अंतरराष्ट्रीय सम्मान नहीं दिया गया था, और उनका उपनाम मेरे अपने परिवार के नाम से है।

मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। उन्होंने पुराना विधान (ओल्ड टेस्टामेंट) और नया नियम (बाइबल) से संबद्ध धर्म के संदर्भ में मुझे एक गहरी अंतर्दृष्टि दी, उन्होंने बुद्धि के सभी मामलों, जिनमें कला भी शामिल है, में एक सख़्त, सिद्ध पदानुक्रम की आवश्यकता को मेरे मन में बैठा दिया, जहाँ उन्होंने दूसरे दर्जे को पहले दर्जे में रखने को सबसे बड़े पाप की संज्ञा दी। मुख्यतः मैंने उन्हें एक नबी के रूप में सुना, जो लोगों से प्यार करते थे, जैसा कि वह कहते हैं, ‘‘दया, अकेलेपन और क्रोध से छीजते पुराने प्यार के साथ’’, और इसीलिए उन्होंने तबाही के रास्ते पर चल पड़ी दुनिया को चेतावनी दी। मैंने उनसे सीखा कि एक आपदा अपरिहार्य थी, लेकिन मैंने यह भी सीखा कि जिस महान विस्फोट की उन्होंने भविष्यवाणी की थी, वह अंत तक खेले जाने वाले एक बड़े नाटक का केवल एक हिस्सा होगा।

उन्होंने अठारहवीं सदी में विज्ञान द्वारा ली गई ग़लत दिशा के गहरे कारणों को देखा, एक ऐसी दिशा जिसने भू-स्खलन जैसे दुष्प्रभाव छोड़े। जैसे कि विलियम ब्लेक ने उनसे पहले नए युग की घोषणा की थी, कल्पना का दूसरा पुनर्जागरण जो अब एक निश्चित प्रकार के विज्ञान से प्रदूषित है, लेकिन उसका भी मानना था कि विज्ञान ज्ञान का स्थानापन्न नहीं है और भविष्य का ज्ञान तो क़तई नहीं है। और इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मैंने उनकी भविष्यवाणियों को किस हद तक हूबहू लिया है : एक सामान्य समझदारी पर्याप्त थी।

विलियम ब्लेक की तरह ऑस्कर मीलोष ने एमैन्यूल स्वीडनबर्ग के लेखन से प्रेरणा ली, एक वैज्ञानिक जिसने ब्रह्मांड के न्यूटोनियन मॉडल में छिपे हुए मनुष्य की हार का पूर्वाभास सबसे पहले कर लिया था। अपने रिश्तेदार की कृपा से जब मैं स्वीडनबर्ग का एक चौकस पाठक बन गया, उन्हें व्याख्यायित नहीं कर रहा था जो कि उस रोमांटिक युग में एक सामान्य बात थी, मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि मैं इस तरह के अवसर पर, जो कि पेश है, पहली बार उनके देश का दौरा करूँगा।
हमारी सदी क़रीब आ रही है और मोटे तौर पर उन प्रभावों के लिए धन्यवाद, मैं इसे शाप देने की हिम्मत नहीं कर सकता, क्योंकि यह विश्वास और आशा की सदी भी रही है। एक अथाह रूपांतरण जिसके बारे में हम शायद ही जानते हैं, क्योंकि हम इसके हिस्से हैं, समय-समय पर सतह पर घटना (phenomena) के रूप में आ रहा है जो कि सामान्य विस्मय को उत्तेजित करता है।

इस रूपांतरण का संबंध ऑस्कर मीलोष के इन शब्दों से है : ‘‘मेहनतकश अवाम का सबसे गहरा रहस्य कि वह पहले से कहीं अधिक जीवित, जीवंत और संतप्त है।’’ उनके रहस्य, सच्चे मूल्यों की एक अपुष्ट आवश्यकता, की कोई भाषा नहीं है जिसमें ख़ुद को व्यक्त किया जा सके और यहाँ न केवल जनसंचार माध्यमों बल्कि बुद्धिजीवियों पर भी भारी ज़िम्मेदारी है। अल्पकालिक भविष्यवाणियों को धता बताते हुए रूपांतरण जारी है, यह संभव है कि सभी भयावहताओं और ख़तरों के बावजूद, एक नई जागरूकता की ओर मानव-जाति के बढ़ने से पहले हमारे समय को श्रम-पीड़ा के आवश्यक एक अपरिहार्य चरण के रूप में आँका जाएगा। तब योग्यताओं का एक नया पदानुक्रम सामने आएगा, और मुझे विश्वास है कि सिमोन वेल, ऑस्कर मीलोष और जिन लेखकों के स्कूल में मैंने एक आज्ञाकारी की तरह अध्ययन किया, उन्हें उनका हक़ मिलेगा। मुझे लगता है कि हमें कुछ नामों के प्रति अपने लगाव को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि इस तरह हम अपनी स्थिति को अधिक मज़बूती से परिभाषित करते हैं; न कि उन नामों का उच्चारण कर जिन्हें हम एक हिंसक ‘नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त’ पद से संबोधित करना चाहते हैं।

मुझे उम्मीद है कि यह व्याख्यान, विचारों के भटकाव के बावजूद जो कवियों की पेशेवर आदत है, कम से कम उत्तराधिकार के चयन पर बात करते समय स्पष्ट रूप से मेरी ‘हाँ’ और ‘नहीं’ को उद्धृत करता है। हम सभी जो यहाँ हैं—वक्ता और श्रोता—अतीत और भविष्य के बीच की कड़ी के सिवा कुछ नहीं हैं।

मूल स्रोत : Czeslaw Milosz – Nobel Lecture. NobelPrize.org. Nobel Prize Outreach AB 2022. Wed. 6 Jul 2022. <https://www.nobelprize.org/prizes/literature/1980/milosz/lecture/>


यह नोबेल-व्याख्यान ‘सदानीरा’ के पोलिश कविता अंक में पूर्व-प्रकाशित। उदय शंकर से परिचय के लिए यहाँ देखें : मीठे आतंक की शुद्ध भाषा

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