कविताएँ ::
शैलेंद्र कुमार शुक्ल

मध्यमार्ग
पृथ्वी और दूर होती
या और नज़दीक होती सूर्य के
घूम रही होती
जैसी है
वैसी तो बिल्कुल नहीं
न जाने कितना कुछ घूम रहा है ब्रह्मांड में
या न जाने कितना कुछ एक अणु में
जितना घूम रहे हैं हम
उससे ज़्यादा घूम रहा है हमारे भीतर
प्रकाश और आँख के बीच
हम साक्षी हैं मध्यमार्ग के
ध्वनियों और कानों के बीच
हो सके समन्वय संतुलन भर
गाँव और शहर
ऑफ़िस और घर
दिन और रात
जीवन और मृत्यु…
हम जितना जानते हैं
उतना ही नहीं जानते
जानने और न जानने के बीच चमकता है जीवन
हम अपने ज्ञान में जितना बोलते हैं
हमारे अज्ञान पर हमारी चुप्पियाँ मुस्कुराती हैं
हम इन्हीं मुस्कुराहटों की उम्मीद हैं
जीवन को जीवन में भरते हुए
निर्गुण
वे शूद्र थे
वे शूद्रों में भी शूद्र थे
उन्होंने ही बताया पहली बार
संसार की असारता के बारे में
उन सबको जिनके वर्चस्व के नीचे पिस रही थी
सदियों की ममता
जिन्होंने बनाए थे रिश्ते-नातों के नियम
उन्हीं नियमों की नैतिकता
साँझ होते-होते ब्रह्मानंद सहोदर का लेती थी सुख
और सिसकती आवाज़ कह दी जाती थी पशुता
आत्मा की पहली खोज पीड़ितों ने की
इस ग्रह पर कितनी कितनी बार उजड़ी सभ्यताएँ
शीतयुग में रही धरती
अफ़्रीका के जंगलों में फिर उगी इक दास्ताँ
आदम का पालना फैलता गया
छितराती गई धरती
मौसमों की बदलती तासीरों के गीत हैं निर्गुण
सबसे बड़ा मुर्दों का टीला
सबसे ऊँचे पिरामिडों से कहता रहा
मृत्यु से बड़ा नहीं है कोई
आज नहीं है मेसोपोटामिया
न मोहनजोदड़ो
न उनके वर्चस्व
निर्गुनिया सारंगी पर गा रहा है निर्गुण
सबसे बड़े धनिकों का सुख
सबसे ज़्यादा लावण्यता का आनंद
सबसे कठिन पराक्रमों का गौरव
सबसे ज़ोरदार ज्ञान का प्रताप
चतुरानन तुम्हारी मृत्यु पर
कितनी बार गया जा चुका है निर्गुण!
पूछ रहा है जोगी…
कलकत्ते में अवधिया
पहली बार आया हूँ कलकत्ता
यह सोच-सोच पहेली का पहला अर्थ
रोमांचित रहा
फिर भी पता नहीं क्यों लगता रहा
जैसे अपरिचित नहीं है यह नगर
कलकत्ता जंक्शन पर मिले
भोर की शांति में गुरुदेव
तो हावड़े पर दिन की तेज़ हलचल में
आवारा मसीहा
मेरी श्रद्धा की जैसे कोई मूरत
निकलकर खड़ी हो गई हो हिये से
यह परदेसियों का स्वदेश है
मुझे याद आते हैं अपने पुरखे प्रेमी
जो इश्क़ में ईसाई हो गए थे इसी शहर में
मेरी आँखें ढूँढ़ रही हैं उन्हें बड़े आदर से
सदियों से झनकती स्मृतियों में बनिजता
विस्थापन की पीड़ा में कसक उठती है कभी कभी
अचानक एक चाय वाला भाई
पूछ बैठता है आपस में बोलते-बतियाते हमें देखकर—
काउ भइया परतापगढ़ ते अहौ!
वह था नहीं प्रतापगढ़ से
फिर भी पहचानता था अपने पड़ोस को
हम चकित थे उसके भाषाबोध पर
जैसे उसकी आँखें चमक उठी थीं
हमारे वहाँ होने से
हम पुराने मुहावरों के बाहर
ढूँढ़ रहे थे काजल लगी बड़ी-बड़ी आँखें
पिंजरे में बंद सकुचाते हुए सुग्गों को
द्वार पर बेचैन-सा कोई भेड़ा
हम खोज रहे थे मदन वणिक को
कि कलकत्ता है सो कहाँ समझ में आवे
दो दिनों के बीच बस
एक ठिठकी शाम के मानिंद
बिसातख़ाना
किसी शाम शरद में
खिली कुमुदनी-सी वह
जैसे निहारने के लिए आतुर हो उसका चाँद
कोई वसंत की एक रात
ओस से भीगती हुई
जैसे मेले में उत्सुक किशोर आँखे
चकवड़ से घिरी एक कोरी पगडंडी
कुछ सोचते हुए ठिठके हैं दोनों
जैसे हवा में नाप ले रहे हों खंजन
उतरती नदी की गहराई
काश यह दुनिया मेरी बहनों के लिए
बिसातख़ाने-सी होती!
मेरी बेटियाँ
फूल के कटोरे में
खीर-सी उतर आती हैं बेटियाँ
जितनी कोमल हैं इनकी हठताएँ
कि उछाह से भरी आत्मा
निराशा रीतने लगती है जीवन से
सावन के जन्म पर
बच्चियों ने कितने सुंदर सोहर गाए थे
करमा के गीतों पर इनके थिरकते
पैरों के करतब क्या कभी भूल पाऊँगा
जीवन को कादो में रोपते हुए
धरती की परात में इनके पैरों की छाप है
नीले आसमान की कोई साँझ
अपने माथे पर उठाए
तना है इंद्रधनुष
जनक क्या तुम अब भी विदेह हो!
चैत
गंदुम की पकी हुई फ़सल पर
मेरे हँसिया की धार है चैत
किसी गाँव के प्राइमरी स्कूल के पिछौरे
देसी आम के पुराने गाछ पर
टिकोरों में चोंपी बन उतर रहा है
चैत का तेज
लचक-लचक बज रही है
रहर की लाँकी
किसान के शीश पर
खेत से खलिहान तक
विराजमान है चैत
बूढ़े हो चुके नीम के चबूतरे पर
खेल रहे हैं बच्चे इतनी तल्लीनता से
कि पूरी व्यस्तता के साथ उतर आया है चैत
एक बहुत पुरानी परचून की दुकान है
जहाँ पहुँचकर
आज भी मालूम किया जा सकता है
चैत का असली पता
खेत में सैके पर लगी है थ्रेसर
पछुआ के इंतिज़ार में
हुलसेगी राशि
चैत की चाँदनी में इस बार भी
ईरानी योद्धाओं की तरह डटे हैं किसान
विनाशकारी अमेरिकी बादलों के विरुद्ध
जिजीविषा का दूसरा नाम है चैत
ग़ुलाम आज़ादी
23 मार्च 1931 की शाम
सहम गई होगी थोड़ी धरती घूमते-घूमते
थोड़ा सिहर गया होगा सूरज डूबते-डूबते
चढ़ते चाँद पर क्या बीती होगी—
एहे ठहिंया झुलनी हैरानी हो रामा…
चैत में सिसक उठा होगा खलिहान
बीती होली का मातम फूट पड़ा होगा
चैता के बोल पर लावा-सा
रात भर रोए होंगे महुए के पेड़—
किन मोर अवध उजारी हो रामा
मुझे यक़ीन है उस रात भी पंजाब के खेतों में
सियारों ने किया होगा संभोग
मुझे अंदेसा है उस रात के अँधेरे में
सरदार किशन सिंह के खेतों में ज़रूर घुसे होंगे
कुछ मनहूस साँड़
कहीं दूर गाँव से सहमी हवा में मंथर उदासी-सी
लड़खड़ाती आवाज़ आई होगी
विद्यावती कौर के कानों तक
घहरा कर बैठ गया हो दिल—
तेरे महलां दे विच-विच वे बाबुल डड्डियाँ जड़ीयाँ…
साम्राज्यवाद मुर्दाबाद
इंक़लाब ज़िंदाबाद
फाँसी के तख़्ते पर चढ़ते हुए
कितनी ताक़त से बुलंद हुई होगी आवाज़
सोचता हूँ
जिस खेत से आया होगा कपास
जिसने भी बुना होगा फाँसी का फंदा
उन सब मजबूर ग़ुलामियों ने ज़रूर कहा होगा
आज़ाद कामनाओं के सबसे पवित्र कानों में—
इनते न सम्हरी अजदिया की थाती इनका गुलमिया सुराज…
आज जब अमेरिकी नव साम्रज्यवाद के सम्मुख
देखता हूँ झुका हुआ शीश
हे विश्वगुरु!
क्या तुम्हें कुछ भी याद नहीं!
लोकप्रिय
प्रियताओं के कई लोक थे
उन लोकों के लोगों में
सबसे लोकप्रिय था परलोक
जातियाँ थीं
जैसे अब अमूमन वे हों ही ना
जाति थी कि वह जाती ही नहीं थी
इतना लोकप्रिय था दर्प
कहते हैं कि वे मध्य एशिया से आए थे
क्यों छोड़ा होगा उन्होंने अपना देस
कितनी हरामज़ादी रही होगी
भूख की लोकप्रियता अफ्रीका में
गिरिडीह में मोंगिया सरिया सीमेंट वाले सरदार जी ने
रामनौमी के सुअवसर पर पुलिस थाने के बग़ल में
लगवाई है एक बड़ी-सी होर्डिंग
विराजमान हैं अवधेश कुमार
धनुष बाण के साथ मुस्कुराते हुए
इतनी लोकप्रिय है संस्कृतिकरण में
आस्था की लोकप्रियता
वे व्यापारी थे उन्होंने मंदिर बनवाया
ईश्वर ने उनकी उँगली पकड़ ली
कि भटक न जाए कहीं रस्ता
वे आइलैंड जाते थे
लेकिन लौट आते थे
काशी की प्रजा के निमित्त
सचमुच इतनी लोकप्रिय थी वणिकता
ज़बान पर रही होगी
कल्पों-सदियों पहले उकेरी गई होगी
शिलाओं पर
किस नाज़ुक दीर्घता ने उकेरा होगा
भोजपत्र पर पहली बार
मैं रेडियो पर सिनेमा के गीत सुनकर
अंतिम बार जवान हुआ था
फ़ेसबुक पर कवियाया मैं
रीलों की लोकप्रियता में रेला जा रहा हूँ
शैलेंद्र कुमार शुक्ल [जन्म : 1986] सुपरिचित कवि-लेखक हैं। सावन सुआ उपास शीर्षक से उनका एक काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुका है। उनकी कविताएँ हमारे समकालीन लोक-जीवन, उसके संघर्ष और विपर्यास को एक प्रकार की संयत प्रतिरोधधर्मिता में बरतती हैं। शैलेंद्र काव्य-मर्म को विषय के विस्तार में बहुत कुशलता से बचाते हैं। वह हमारी पीढ़ी के बहुत मँझे हुए, जानदार और अपने विषय के जानकार कवि हैं। उनसे shailendrashukla.mgahv@gmail.com पर संवाद संभव है।