कविताएँ ::
सुमन पांडेय

सुमन पांडेय

जनन और सृजन

मैं काढ़ती हूँ
धूप के तंतु
जैसे एक माँ अपनी कोख से
नवजीवन को जन्म देती है

सुई की हर चुभन
मानो प्रसव की पीड़ा हो
अम्बर की तह पर
मगर उस पीड़ा से ही
साकार होता है उजास का वस्त्र

मेरी गोद का आँगन
बन जाता है उदयाचल
जहाँ टाँकों की लय में
जन्म लेता है नया सूरज

सिलाई की इस यात्रा में
हर धागा मेरे विश्वास का गर्भ है
और हर बिंदीदार बुनावट
मेरे मातृत्व की साक्षी

मैंने जने हैं
सूरज अपनी हथेलियों पर
उँगलियों के पोरों से की है गुदगुदी
उसे देख इठलाता है मन।

जेन, जो वन की आत्मा थीं

वह चली गईं
जैसे पेड़ से पत्ता गिरता है
धीरे बिना शोर के
क्योंकि असली विदाई में कैमरे नहीं होते

अब हवा जानती है उनका नाम
और बंदर अब भी पहचानते हैं उनकी नज़र
बस इंसान भूल गया
क्योंकि उसके पास अब फ़ेस रिकग्निशन है

उन्होंने हमें सिखाया
कि बोलना ही बुद्धि नहीं
सुनना भी प्रेम है
पर हमने सुनने की कला
हेडफ़ोन के नीचे कहीं दफ़्न कर दी

उन्होंने दिखाया
कि हर जीव के भीतर एक भाषा है
जो शब्दों में नहीं
नज़रों, स्पर्श और धैर्य में है
और हमने उस भाषा का अनुवाद कर लिया
वॉयस कमांड में

अब जब हम जंगल में जाएँगे
तो हर पत्ती में उनका स्वर होगा
धीरे से कहता हुआ—
संरक्षण ही श्रद्धांजलि है…

पर शायद तब तक हम
कृत्रिम जंगल में ऑक्सीजन ख़रीद रहे होंगे
जहाँ जेन की मूर्ति होगी
और नीचे लिखा होगा—
उनकी स्मृति में एक पौधा लगाया गया था
जो अब पार्किंग में है

फिर भी हवा की हर लहर में
उनकी हँसी गूँजती है
मृदु, सजीव और थोड़ी-सी शरारती
जैसे कह रही हो—
मैं तो लौट आई मिट्टी में
पर तुम अब भी स्क्रीन में
जंगल खोज रहे हो।

डॉ. जेन गुडॉल को समर्पित

नदियों का सूख जाना

कितना अद्भुत है
नदियों के किनारे जन्मना

नदियाँ माँ जैसी लगती हैं
सोचकर कितना रोचक लगता है कि
पहाड़ नदियों की माँ हैं
और समुंदर नदियों का मसान
जिसे असंख्य मीठी नदियाँ
मीठा नहीं कर पाईं
जैसे कोई मृत्यु पर
प्रतिबंध नहीं लगा पाया

पर नदियों का बहना
वर्तमान का बहना है

इस वर्तमान की धारा में
हर बूँद नई है
जैसे हर क्षण
और हर साँस

पर कितना वीभत्स है
अपनी प्रौढ़ अवस्था में
नदी का सूख जाना

नदियों का सूख जाना
किनारों का विधुर हो जाना है

नदियों का सूख जाना
हमारा अनाथ हो जाना है।

पृथ्वी और मैं

मुट्ठियों में सिमटता संकोच
गदोइयों में रस भरता है
इस रस से भरी
हथेलियों के बीच घूमती लोई
पृथ्वी लगती है

मैंने अपने जीवन में
कई पृथ्वियाँ रची हैं
और कई पृथ्वियों ने मुझे

हर बार जब आटा गूँथा
मैंने जाना
सृजन किसी ईश्वर की कोई क्रिया नहीं
वह हर उस स्त्री की दिनचर्या है
जिसकी हथेलियाँ
पृथ्वी को जीवंत रखती हैं।

जो अमान्य है

जो कह दिया गया है
उसे कितना सुना गया है?

जो सुना गया है
उसे कितने ध्यान से सुना गया?

जो ध्यान से सुना गया
वह पहले से कितना अनसुना था?

सुनने और अनसुने के बीच
कितना समझा गया है?

जो समझा गया है
उसे कितना अपनाया गया है?

और जो नहीं अपनाया गया
क्या वह दूषित है?
या हमारी मान्यताओं का विरोधी?

जो सर्वमान्य है
क्या वही सत्य है?

जो सत्य है
क्या वही शिष्ट है?
या जो शिष्ट है
वही बस मान्य है?

जो अमान्य है
उसे कितनों ने सुना है?

नर्मदा कहाँ है?

नर्मदा अमरकंटक से निकलीं

किंवदंतियाँ कहती हैं
कि वह शिव की पुत्री हैं

नर्मदा तो नदी है

मेरे शहर में
नर्मदा नहर है

मेरे घर जो पानी आता है
वह नहर का पानी है
लोग उसे नल का पानी कहते हैं

मैंने नल से पानी लिया
तुलसी उबाली
वह काढ़ा बन गया

तुलसी के पेड़ में
जो पानी डाला
वह जल कहलाया

मैंने नल के पानी से
पोंछा लगाया
अब वही गंदा पानी है

बहता हुआ पानी
नाले का पानी है
और नाला
फिर नदी में मिल जाता है

तो अब नर्मदा कहाँ है?
नाले में?
नहर में?
नल में?
या
अमरकंटक में?

पृथ्वी का साथ

मेरे चलने से
धरती नहीं चलती

पर मेरे रुक जाने से
वह मेरे साथ रुकती है

जब समय, साथी, भाग्य और कर्म
सब शिथिल पड़ जाते हैं
तब भी पृथ्वी साथ होती है

न पृथ्वी का उदय होता है
न अस्त

समय और इकाइयों का
सीमित अध्ययन
ग्रहों को श्रेष्ठ बना देता है
पर पृथ्वी के प्रति कृतज्ञता
हम भूल जाते हैं

पर पृथ्वी साथ देना
नहीं भूलती

साथ देना
किसी की धरती होना है।

मैंने तुममें पूरा जंगल पा लिया

शब्दहीन निगाहें और साँसों का यह बाग़ीपन
धमनियों में बढ़ता रक्तचाप
यह अवस्था थी तुम्हारी
मुझसे पहली मुलाक़ात में

मानो उल्लू की टकटकी
जेठ की दुपहर में बौखलाया कुक्कुर
और लू की चपेट में ऊँघता मेंढक
लगे तुम

सोचा एक पुरुष में इतने सारे जानवर
एक साथ कैसे हो सकते हैं
फिर तुम बोले
अपनी काँपती धीमी आवाज़ में—
कैसी हो?

मैंने कहा—
जैसा तुम अनुभव करो

तुम मुस्कुराए
मुस्कुराते हुए तुम मुझे कछुए लगे

तुमने मुझसे पूछा—
मुझे ढूँढ़ने में कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई?

मैंने कहा—
अब जंगल गए हो ना!
तो नहीं हुई

तुमने अपनी तिरछी निगाहों से मुझे देखा
अबकी तुम मुझे चील जैसे लगे

अब जब तुम अपनी उँगलियों को अपनी जाँघों पर
बिना मतलब घुमा रहे थे
तो मैंने झट से कहा—
कुछ पिलाओगे या पहली ही मुलाक़ात में
मणिकर्णिका ले जाओगे?

तब तुम झेंपे और झट से उठे और बोले—
चलो

और फिर तुम मुझे लंगूर जैसे लगे

हम साथ चले
तुमने मेरे क़दमों के साथ जो ताल बिठाई
कि हम दोनों जैसे झोरू के बैल हों

तब मुलाक़ात पहली थी
इसलिए इस पर हल का कोई भार न था
या कि संबंधों का कोई बोझ

घंटों से प्यासे हम दोनों
प्याऊ पर पानी पीकर ऐसे अघाते
जैसे मेंढक को निगलकर उर्ध्व लेटा साँप

ऐसे ही बातों में,
मुलाक़ातों में,
मैंने तुममें पूरा जंगल पा लिया।

आलिंगन

गिरती सूखी पत्तियों में
क्या निहारती है नज़रें

नज़र निहारती हैं
पत्तों में बसा सवेरा
पत्तों में ढलती धीमी धूप
पत्तों में बची गहरी शाम
इन सूखे पत्तों की ढेर में
सबसे ऊपर सूखे पत्ते में बची हरियाली—
बची हरियाली
जीवन के लिए बची रह गई चाह को बताती है

और इस ढेर का सबसे नीचा पत्ता
बेताब है धरती में मिलने को
क्योंकि वह जानता है कि धरती पर रहकर भी
धरती में मिल जाने की
यात्रा का सुख कितना लंबा और प्रयत्नशील है

वसंत की पाट पर निरंतर गिरते पत्ते
मिट्टी में मिलने की
धैर्य-प्रतीक्षा को जानते हैं
जैसे तुम जानते हो
मुझे देखकर भी
पास होकर भी
कितना सुख था आलिंगन में
तुम्हें गले लगाना
भुला देता है हम कितने पीले पत्ते हैं
हममें कितनी कोमलता की शांति है

और सूखेपन की खुरदुराहट को
हमने जिया है

तुम्हारा आलिंगन
मिट्टी में मिल जाने का
निरंतर धैर्यशील प्रयत्न है।

ख़ुशबू का प्रतिरोध

फूल की ख़ुशबू
उसकी ख़ुशी नहीं होती
वह तो केवल अपनी रक्षा में
एक गहरी प्रतिक्रिया होती है

जैसे मुस्कुराना
एक क्रांति है
अवसाद के विपरीत।


सुमन पांडेय की कविताओं के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। वह वाराणसी [उत्तर प्रदेश] की मूल निवासी हैं। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बी.ए. [पेंटिंग ऑनर्स] तथा बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी से एम.ए. [पेंटिंग] की उपाधि प्राप्त की है। साथ ही, टेक्सटाइल डिज़ाइन में डिप्लोमा एवं वनस्थली विद्यापीठ से पारंपरिक वस्त्राकल्प विषय में पीएच.डी. की है। गत 15 वर्षों से आप डिज़ाइन उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं तथा तितानवाला म्यूजियम, बगरू [राजस्थान] में क्यूरेटर के रूप में भी सक्रिय हैं। उनकी प्रमुख कृति Chhipa, Chhapa, Chhapai: Traditional Hand Block Printing of Bagru है तथा Cross Currents: Interdisciplinary Reflections on Art, Craft and Design पुस्तक की वह संकलनकर्ता एवं संपादक हैं। इसके साथ-साथ उनकी रुचि लेखन, कविता एवं शोध में है; और वह राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारतीय कला, डिज़ाइन एवं संस्कृति विषयों पर सक्रिय रूप से प्रस्तुति देती रही हैं। उनके कुछ लेख गए कुछ वक़्त में कुछ प्रतिष्ठित प्रकाशन-स्थलों पर प्रकाशित हुए हैं। उनसे suman.fineart@gmail.com पर संवाद संभव है।

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