सीज़र पावेसी की कविताएँ ::
अँग्रेज़ी से अनुवाद : शायक आलोक

सीज़र पावेसी | तस्वीर सौजन्य : meisterdrucke

बिल्लियाँ जान जाएँगी

फिर बरसेगी वर्षा
तुम्हारी उन प्रिय पत्थर-जड़ी गलियों पर—
हल्की-सी वर्षा
जैसे कोई साँस, या कोई पदचाप।

समीर और उषा
फिर हल्के से खिल उठेंगे
जैसे तुम्हारे क़दमों तले
जब तुम लौटोगी।

फूलों और खिड़कियों की चौखटों के बीच
बिल्लियाँ जान जाएँगी।

फिर आएँगे और भी दिन
और भी आवाज़ें सुनाई देंगी।

तुम अकेली मुस्कराओगी।
बिल्लियाँ जान जाएँगी।

तुम सुनोगी वे पुराने शब्द—
थके-हारे और कोरे शब्द—
जैसे बीत गए उत्सवों के बाद
उतार रख दिए गए लिबास।

तुम भी दिखाओगी भंगिमाएँ।
तुम भी दोगी उत्तर शब्दों में—
हे वसंत-मुख
तुम भी दिखाओगी भंगिमाएँ।
बिल्लियाँ जान जाएँगी
हे वसंत-मुख
और वह हल्की वर्षा
वह हायसिंथ पुष्प के रंग जैसी उषा
जो बिंध देती हैं हृदय उसका
जिसे अब तुम्हारी आशा नहीं रही—
वही है वह उदास मुस्कान
जिसे तुम अकेली बिखेरती हो।

फिर आएँगे और भी दिन
और भी आवाज़ें और जागरण-क्षण।
हम उषा में दुःख सहेंगे,
हे वसंत-मुख।

जिस रात तुम सोई थीं

रात भी तुम्हारे जैसी है
वह दूरस्थ रात, जो रोती रहती है
निःशब्द, हृदय की गहराइयों में
और तारे गुज़रते हैं थके हुए।
एक गाल दूसरे गाल को छूता है—
एक ठंडी सिहरन; कोई
छटपटाता है और करता है तुमसे विनती, वह अकेला
तुममें खोया हुआ, तुम्हारे ज्वर में।

रात दुःख सहती है और करती है उषा की आकांक्षा
हे अभागे हृदय, जो सिहर उठते हो।
हे भावहीन मुख, अंधकारमय संताप
हे ज्वर, जो तारों को भी विषाद से भर देते हो
कोई है जो तुम्हारी ही तरह करता है उषा की प्रतीक्षा
मौन तुम्हारा मुख निहारते हुए।
तुम रात के नीचे लेटी हो
एक अदृश्य, मृत क्षितिज की तरह।
हे अभागे हृदय, जो सिहर उठते हो
एक दूर के दिन तुम स्वयं उषा थीं।

तुम भी प्रेम हो

तुम भी प्रेम हो।
तुम भी रक्त और मिट्टी की बनी हो
दूसरों की तरह। तुम चलती हो
उसकी तरह, जो अलग नहीं हो पाता
अपने घर की दहलीज़ से।
तुम देखती हो, जैसे कोई प्रतीक्षा करता है
और देख नहीं पाता। तुम धरती हो
जो पीड़ा सहती है और मौन रहती है।
तुममें सिहरनें हैं और हैं थकानें,
तुम्हारे पास शब्द हैं—तुम चलती हो
प्रतीक्षा में। प्रेम
तुम्हारा रक्त है—और कुछ नहीं।

और तब हम कायर…

और तब हम कायर
जो संध्या के धुंधलके में उनके बारे में बातें करते थे
फुसफुसाहट में—घरों के बारे में
नदी किनारे की पगडंडियों
उन जगहों की लाल,
धुँधली रोशनियों के बारे में
और उस पीड़ा के बारे में
जो मद्धम कर दी गई थी और छुपाकर रखी गई थी—
हमने अपने हाथ छुड़ा लिए
उस जीवंत बंधन से
और चुप रहे; पर हमारा हृदय
रक्त के आवेग से थर्रा उठा,
और फिर वह मधुरता न रही,
न रहा अपने को छोड़ देना
उस नदी किनारे की पगडंडी पर—
अब हम दास नहीं रहे; हमने जाना
कि हम अकेले हैं और हैं ज़िंदा।

प्रभात

अधखुली खिड़की में एक चेहरा समाया है
समुद्र के विस्तार के ऊपर। खुले बाल
झूमते हैं समुद्र की कोमल लय के संग।

इस चेहरे पर स्मृतियाँ नहीं दिखतीं।
बस है एक क्षणभंगुर छाया,
मानो किसी बादल की छाया।
नम और कोमल है वह छाया,
जैसे गोधूलि बेला में
किसी अछूते गह्वर की रेत।
स्मृतियाँ नहीं हैं। बस एक मद्धम स्वर है—
स्मृति बन चुका समुद्र का स्वर।

गोधूलि में उषा का मृदुल जल
जो भीग उठता है प्रकाश से,
चेहरे को रोशन करता है।
हर दिन समय से परे एक चमत्कार है,
सूरज के नीचे : उसमें व्याप्त है एक नमकीन उजास
और ताज़ा समुद्री खाद्य का स्वाद।

इस चेहरे पर कोई स्मृति नहीं है।
कोई शब्द नहीं है जो उसे समेट सके
या उसे बीती हुई चीज़ों से एकमेव कर दे। व्यतीत
उस छोटी-सी खिड़की से ओझल हो गया, जैसे
एक क्षण बाद फिर ओझल हो जाएगा,
बिना किसी उदासी के
या मानवीय शब्दों के—समुद्र के विस्तार पर।

वह रात

पर वह हवाओं की रात, वह निर्मल रात,
जिसे स्मृति बस छू भर पाती थी, अब बहुत दूर है—
अब बस उसकी स्मृति है। बनी रहती है
एक स्तब्ध शांति,
जो पत्तियों से बनी है और शून्य से।
उस समय का, जो स्मृतियों के उस पार था,
बस एक धुँधला-सा स्मरण ही शेष है।

कभी-कभी दिन की रोशनी में
गर्मियों के दिन की अचल उजास में
वह दूर का विस्मय लौट आता है।

सूनी खिड़की से
एक बच्चा पहाड़ियों पर उतरती रात को देखता था—
ठंडी और काली पहाड़ियों को
एक-दूसरे से घिरा देख विस्मित रह जाता था :
वहाँ होती थी एक धुँधली और निर्मल निश्चलता।
अँधेरे में सरसराती पत्तियों के बीच
उभर आती थीं वे पहाड़ियाँ,
जहाँ दिन की सारी चीज़ें—ढलानें,
पेड़ और अंगूर की बेलें—
स्पष्ट थीं, पर निर्जीव;
और जीवन कुछ और ही था—
हवा का, आकाश का,
पत्तियों का और शून्य का।

कभी-कभी लौट आती है
दिन की अचल शांति में
उस तल्लीन जीवन की स्मृति
जो डूबी थी विस्मय के उजाले में।

तोल्लेरान्त्सा*

समुद्र के विस्तार पर वर्षा निःशब्द बरस रही है।
मैली गलियों से कोई नहीं गुज़र रहा
एक अकेली स्त्री ट्रेन से उतरी है :
उसके कोट के नीचे से हल्के रंग का अंतर्वस्त्र झलक उठा
और उसके पाँव उस काले पड़े दरवाज़े में ओझल हो गए।

मानो यह कोई डूबा हुआ गाँव हो। संध्या की ठंडक
हर देहरी पर बूँद-बूँद उतर रही है और घर
छाया में नीला-सा धुआँ छोड़ रहे हैं। लालिमा रखतीं
खिड़कियाँ एक-एक कर जगमगा उठी हैं।
एक दीपक जल उठा है
उस काले पड़े घर की खिड़कियों के भीतर।

अगली सुबह ठंड है और धूप फैली है समुद्र पर।
अंतर्वस्त्र में एक स्त्री चश्मे पर अपना मुँह रगड़कर धो रही है
गुलाबी है फैलता हुआ झाग। उसके बाल
सुनहरे और रूखे हैं—जैसे संतरे के छिलके
जो ज़मीन पर बिखरे पड़े हों।
चश्मे पर झुकी हुई वह कनखियों से देखती है
एक साँवले शरारती लड़के को, जो मंत्रमुग्ध उसे ही देखे जा रहा है।
म्लान मुख वाली स्त्रियाँ चौक की ओर खुलने वाली खिड़कियाँ खोल देती हैं—
उनके पति अभी भी अँधेरे में ऊँघ रहे हैं।

जब साँझ फिर उतरती है, वर्षा भी लौट आती है,
अँगीठियों पर छप-छप करती हुई। नवविवाहित स्त्रियाँ
अँगारों को हवा देते हुए उस काले पड़े घर की ओर देखती हैं
और उस सूने पड़े चश्मे की ओर। उस घर की
खिड़कियाँ बंद हैं पर भीतर एक बिस्तर है
उसी बिस्तर पर एक सुनहरे बालों वाली स्त्री अपनी रोज़ी-रोटी कमाती है।
रात में सारा गाँव आराम करता है—
सब—सिवाय उस सुनहरे बालों वाली स्त्री के, जो हर सुबह स्वयं को धोकर साफ़ करती है।

*‘Tolleranza’ इटली में लाइसेंसशुदा वेश्यालयों (“casa di tolleranza”, 1860–1958) के संदर्भ में प्रयुक्त एक शिष्ट प्रशासनिक शब्द था। इसका सामान्य अर्थ सहनशीलता या सहिष्णुता है। शीर्षक इसी व्यंग्य पर टिका है : राज्य की औपचारिक सहनशीलता बनाम समाज की ठंडी उपेक्षा।

भटकी हुई औरतें

उनके साथ ऐसा बर्ताव करना बिल्कुल सही है।
और यक़ीनन यह उससे बेहतर है कि पहले दिल से
उन पर दया की जाए और फिर बिस्तर में उनका भोग किया जाए।
“यह ज़िंदगी से भी ज़्यादा मज़बूत ज़रूरत है”—
इसके बजाय कहो : “और हम सब इसी क़िस्मत के मारे हैं
लेकिन अगर मेरी कोई लड़की कभी यह काम अपनाती
तो मैं ग़ुस्से से पागल हो जाता या बदला लेने का कोई रास्ता ढूँढ़ता।”

दया करना हमेशा व्यर्थ ही रहा है
विरोध करना कठिन है और उससे कुछ बदलता भी नहीं—
बेहतर है कि दाँत भींचकर चुप रहा जाए।
एक शाम
मैं ट्रेन में सफ़र कर रहा था, वहाँ एक औरत भी थी—
सादे कपड़ों में, मेकअप किए हुए और चेहरे से बेहद गंभीर।
बाहर की हल्की रोशनी और धूसर हरियाली ने
दुनिया को धुँधला-सा कर दिया था। हम अकेले थे
डिब्बे में—तीसरे दर्जे का वह डिब्बा—वह औरत और मैं, तब मैं युवा था।
तब मुझे बातचीत शुरू करना भी नहीं आता था
और औरतों के बारे में सोचकर भी मैं रो पड़ता था। इस तरह
मैंने पूरा सफ़र बेचैनी में उसे देखते हुए काटा और वह औरत
कभी-कभी मेरी तरफ़ देखती रही और सिगरेट पीती रही। मैंने कुछ नहीं कहा,
असल में कुछ सोचा भी नहीं, फिर भी वह सीधी नज़र
अभी भी मेरे ख़ून में जमी है—वह हल्की सी मुस्कान
उसकी, जिसने कड़ी मेहनत की हो और ज़िंदगी को
वैसे ही जिया हो जैसे जीना चाहिए : खामोशी से।
एक दोस्त—उन लोगों में से
जिनके मन में शब्द भरे होते हैं—बचाना चाहता है
एक औरत को, उसके आँसू पोंछना और उसे ख़ुशी देना चाहता है।
“नहीं, यह ज़िंदगी से भी ज़्यादा मज़बूत ज़रूरत है।
और हम—हम बदनसीब हैं, जिनकी एकमात्र ताक़त
एक ऐसे कठोर दिल में है जो किसी काम का नहीं।”

तुम हज़ारों औरतों को बचा सकते हो
लेकिन मैंने जिन बहुत-सी औरतों को सिगरेट पीते और घूरते देखा है
नफ़रत भरे चेहरों के साथ या थकी-हारी मुस्कान के साथ—
मेरी वे अच्छी सहचरियाँ—वे हमेशा बनी रहेंगी,
ख़ामोशी से दुःख सहती हुईं और हम सबकी ओर से क़ीमत चुकाती हुईं।

एकांत का उन्माद

मैं रोशन खिड़की के पास बैठा रात का खाना खा रहा हूँ।
कमरे में पहले से अँधेरा है और रंग बदलने लगा है आकाश।
बाहर निकलो तो शांत गलियाँ ले जाती हैं
कुछ ही दूर चलते खुले मैदान में।
मैं खा रहा हूँ और आकाश की ओर देख रहा हूँ—
कौन जाने कितनी स्त्रियाँ
इस समय खाना खा रही होंगी। मेरा शरीर शांत है :
श्रम सुस्त कर देता है सभी इंद्रियों को और स्त्रियों के बारे में किसी भी ख़याल को।

बाहर, रात के खाने के बाद तारे आएँगे धरती को छूने
इस विस्तृत मैदान में। तारे जीवित हैं,
पर इन चेरी फलों इतने मूल्यवान् नहीं, जिन्हें मैं अकेले ही खा रहा हूँ।
मैं आकाश को देखता हूँ, जानता हूँ कि ज़ंग लगी छतों के बीच
दीप पहले ही जल उठे हैं और उनके नीचे लोगों के शोर हैं।
पेय की एक घूँट और मेरी देह स्वाद चख सकती है
वनस्पतियों और नदियों के जीवन का।
यह चीज़ों से स्वयं को विलग अनुभव करता है।
बस थोड़ा-सा मौन ही पर्याप्त है और हर चीज़ ठहर जाती है
अपने वास्तविक स्थान पर, जैसे कि थिर रहती है मेरी देह।

मेरी इंद्रियों के सामने सब कुछ अलग-थलग है,
जो उसे बिना विचलित हुए स्वीकार करती हैं : है मौन की एक सरसराहट।
इस अँधेरे में मैं हर चीज़ को जान सकता हूँ,
जैसे जानता हूँ कि मेरी नसों में बहता है रक्त।
यह मैदान वनस्पतियों के बीच बहते जल का एक विराट प्रवाह है,
सारी चीज़ों का एक साझा रात का खाना। हर पौधा और हर पत्थर
अचल रहकर भी जीवित है।
मैं महसूस करता हूँ कि मेरा भोजन मेरी नसों को
पोषित कर रहा है
इस मैदान की जीवित हर वस्तु से।

रात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। आकाश का चौकोर टुकड़ा
मुझसे सारे कोलाहलों की फुसफुसाहट करता है और एक नन्हा तारा
शून्य में छटपटा रहा है, सभी भोजनों से दूर,
घरों से दूर, सबसे अलग। यह स्वयं के लिए पर्याप्त नहीं,
उसे बहुत-सी संगिनियों की आवश्यकता है। यहाँ अँधेरे में, अकेले,
मेरा शरीर शांत है और अनुभव करता है स्वयं पर अपना स्वामित्व।

काम करना थका देता है

दोनों घास पर लेटे हुए हैं पूरे कपड़ों में और एक-दूसरे को देख रहे हैं
घास की पतली डंठलों के बीच : औरत उसके बालों को दाँतों से हल्के से काटती है
और फिर घास को। घास के बीच वह मुस्कराती है बेपरवाह।
आदमी उसकी दुबली बाँह पकड़ लेता है और दाँत चुभाता है,
अपनी देह उसके और क़रीब ले आता है। वह उससे कुछ दूर लुढ़क जाती है।
मैदान की आधी घास इस तरह ही अस्त-व्यस्त हो गई है।
लड़की अब उठकर बैठती है और अपने बाल ठीक करती है
अपने साथी की ओर देखती भी नहीं, जो वहीं खुली आँखों लेटा है।

दोनों एक छोटी मेज़ पर बैठे हैं, एक-दूसरे को देखते हुए
शाम की रोशनी में, जबकि लोग-बाग़ लगातार गुज़र रहे हैं।
बीच-बीच में कोई चमकीला रंग उनका ध्यान खींच लेता है।
कभी-कभी वह उस बर्बाद हुई छुट्टी के बारे में सोचने लगता है—
जो इस औरत के पीछे भागते हुए गुज़री—
हालाँकि वह उसके पास रहने और उसकी आँखों में देखने भर से ही ख़ुश है।
अगर उसका पैर कभी उसके पैर से छू जाए तो वह अच्छी तरह जानता है
कि वे विस्मय से एक-दूसरे को देखेंगे
और मुस्कुराएँगे और वह औरत ख़ुश हो उठेगी।
दूसरी औरतें, जो वहाँ से गुज़रती हैं
उसकी ओर देखती तक नहीं, फिर भी कम से कम
आज रात वे किसी आदमी के साथ अपने कपड़े उतारेंगी। या शायद हर औरत
सिर्फ़ उसी आदमी को पसंद करती है जो अपना समय बेकार की चीज़ों में बर्बाद करता है।

उन्होंने एक-दूसरे के पीछे भागते हुए दिन बिताया है और औरत के गाल
अभी भी धूप से लाल हैं। औरत के दिल में उसके लिए शुक्रगुज़ारी है।
उसे जंगल में किया गया उन्मत्त चुम्बन याद आता है—
जो किन्हीं क़दमों की आहट में अधूरा रह गया था—
जो आज भी उसके बदन को सुलगाता है।
वह गुफ़ा की चट्टान से चुने गए ‘मेडनहेयर फर्न’ के गुच्छे को
अपने सीने से लगाए रखती है—और अपने साथी की ओर
करुण नज़रों से देखती है। वह गहरे रंग के उन डंठलों
के उलझाव को घूरता है
काँपती हुई हरियाली के बीच
और एक और उलझाव की कामना के बारे में फिर से सोचता है—
जो उसके हल्के रंग की पोशाक के भीतर महसूस होती है—
जिसके बारे में वह औरत पूरी तरह अनजान है। यहाँ तक कि उसका उन्माद भी
उसके किसी काम नहीं आता, क्योंकि वह लड़की, जो उससे प्यार करती है,
उसके हर उग्र आवेग को चुम्बन तक रोक देती है और उसके हाथ पकड़ लेती है।
लेकिन आज रात, उसे छोड़ आने के बाद, वह जानता है कि वह कहाँ जाएगा :
वह घर लौटेगा, टूटी हुई कमर और सुन्न दिमाग के साथ,
फिर भी—अपनी तृप्त देह में—वह कम से कम
ख़ाली बिस्तर पर नींद के सुकून का आनंद लेगा।
बस—और यही उसका प्रतिशोध होगा—वह कल्पना करेगा
कि जिस स्त्री-देह को वह अपनी बाँहों में लिए होगा
वह, बिना किसी लज्जा के और कामना से भरी हुई, इसी स्त्री की देह हो।

पुराना अनुशासन

शराबी नहीं जानते कि औरतों से कैसे बात करें
और वे भटक गए हैं; कोई उन्हें नहीं चाहता।
वे सड़क पर धीरे-धीरे चलते हैं, सड़क और सड़क की बत्तियाँ
मानो कभी ख़त्म नहीं होतीं। कोई-कोई लंबा चक्कर लगाकर जाते हैं :
पर डर की कोई बात नहीं, कल वे घर लौट आएँगे।

लड़खड़ाता हुआ शराबी समझता है कि वह औरतों के बीच है
—सड़क की बत्तियाँ हमेशा वही रहती हैं और औरतें भी रात में हमेशा
वही रहती हैं : कोई उसकी बात नहीं सुनता।
शराबी तर्क करता रहता है और औरतें सुनना नहीं चाहतीं।
इन्हीं हँसती हुई औरतों की बात वह बुदबुदाता रहता है :
आख़िर औरतें इतना हँसती क्यों हैं या रोती हैं तो चीख़ती क्यों हैं?
शराबी चाहता है एक शराबी औरत
जो चुपचाप उसे सुन ले। पर वे तो अपने शोर से बस उसे बहरा कर देती हैं—
“यह बच्चा पाना है तो हमारे पास से होकर गुज़रना होगा।”

शराबी क़रीब आता है एक शराबी साथी के
जो आज रात उसका बेटा है—वह जिसका जन्म उन औरतों से नहीं हुआ।
भला एक छोटी-सी औरत, जो रोती और चिल्लाती है,
कैसे दे सकती है ऐसा बेटा जो साथी हो?
वह जो शराबी है, याद नहीं रखता औरतों को
अपने डगमगाते क़दमों में और दोनों शांति से आगे बढ़ते हैं।
जो बेटा सच में मायने रखता है
वह जन्मा नहीं है किसी औरत से—वरना वह भी
एक औरत ही होता। वह पिता के साथ चलता है और तर्क करता है :
सड़क की बत्तियाँ जलती रहती हैं उसके लिए पूरी रात।


सीज़र पावेसी [9 सितंबर 1908—27 अगस्त 1950] बीसवीं सदी के समादृत इतालवी कवि-गद्यकार-अनुवादक हैं। वह कविता और डायरी में ग्रामीण जीवन की स्मृतियों, शहरी अकेलेपन, प्रेम की विफलताओं, मिथकों, निर्वासन-बोध और मनुष्य के अस्तित्वगत विषाद की अभिव्यक्ति के लिए चिह्नित किए जाते हैं। यहाँ प्रस्तुत उनकी कविताएँ हिंदी अनुवाद के लिए https://it.wikisource.org/wiki/Disciplina_antica से चुनी गई हैं। शायक आलोक से परिचय के लिए यहाँ देखिए : लिखने का सुख

प्रतिक्रिया दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *