रज़ी अख़्तर शौक़ की नज़्में ::
उर्दू से लिप्यंतरण : ज़ुबैर सैफ़ी

एज़ाज़
मुद्दतें बीत गईं गो मुझे चलते-चलते
किसी एज़ाज़ की दस्तक मेरे ख़ेमे पे नहीं
मैं नवा-गर, किसी मंसब, किसी रुतबे पे नहीं
कोई भी मुहर-ए-सताइश मेरे नग़मे पे नहीं
फिर भी ये कम तो नहीं कि मुसाफ़त का ग़ुबार
मेरे क़दमों में रहा है मेरे चेहरे पे नहीं।
शनाख़्त
सारे खोल नए चेहरों के
कॉफ़ी हाउस और
बुक-स्टॉल पे मिल जाते हैं
जो चेहरा जिस को लग जाए
औरों के चेहरों को पहन के
लोग अमर हो जाते होंगे
मैं अपने चेहरे में ख़ुश हूँ।
एग्ज़िट
सब झूटे-सच्चे लोगों के सारे नाटक ख़त्म हुए हैं
सब उजली-पीली राहों के सारे फाटक बंद हुए हैं
मंदिर-मस्जिद और गिरजा की रौशनियाँ वीरान पड़ी हैं
एक नीली-ज़हरीली चादर ओढ़ के सारे शहर, दरीचे, तहज़ीबें बे-जान पड़ी हैं
हर बस्ती के दरवाज़े पर एक आसेब सदा देता है
लोग अब अपने सारे
रंग, दीये, क़िंदीलें, नग़में वापस कर दें
सब माँओं को ख़ुशख़बरी हो
अब धरती की कोख के अंदर सन्नाटे का बीज पड़ेगा
अब स्कूल के दरवाज़े पर सूरज की घंटी न बजेगी
अब कोई पर्दा न उठेगा
अब कोई मंडली न सजेगी
ये इस खेल का आख़िरी दिन है।
ब्रेन-वॉश
मुर्दाख़ाने की एक खिड़की शहर की जानिब भी खुलती है
जिस से कुछ दानिशवर रूहें,
कुछ आदम-बेज़ार मुफ़क्किर कॉफ़ी हाऊस तक आ जाते हैं
एक सर ख़ाली कासे जैसा अफ़लातून का चेहरा पहने
दुनिया के असरार बता कर ख़ाली सर को लहराता है
शेक्सपियर को दोहराता है
ये दुनिया एक नाटकघर है
तुम भी अपना बंदर लाओ
तुम भी नाचो और नचाओ
एक ज़बान मजरूह-ओ-दीदा हिटलर की बत्तीसी पहने सरगोशी करने लगती है
ताक़त दहर का पहला सच और आख़िरी सच है
कोई माने या नहीं माने, तहज़ीबों के सब अफ़साने काग़ज़ पर अच्छे लगते हैं
वो जाता है रास्पुतिन की आँखें ले कर एक साया सा, ये कहता पाया जाता है
दुनिया भर के सब मक्कारों एका कर लो
रास्पुतिन की इस तक़रीर एक पंडित दौड़ा आता है, फ़रमाता है
राम-राम पर घुटना छोड़ो
जाने कितने जुग बीते हैं
जाने कितने जुग बीते हैं हम तुम सब एक सपने में हैं
जुग बीतेगा तो देखेंगे
राम-राम जपो, सो जाओ
वो जाता है, एक साया फन फैलाता है
फिर कुछ सर्द-ओ-बरहना ढाँचे
सब मुर्दा थिंकर्स का भेजा अपनी आवाज़ों पर छिड़क के
विज़्डम का कोरस गाते हैं फ़रमाते हैं
तुम जिस को दुनिया कहते हो एक बड़ा मुर्दा-ख़ाना है
जिस में हम सब ज़िंदा मुर्दे अपने कफ़न
और अपनी क़ब्र के तूल-ओ-अर्ज़ से ना-आसूदा भाग रहे हैं
ख़्वाहिश की हर ताल पे रक्साँ भाग रहे हैं
वो सब ढाँचे भागते हैं और जल जाते हैं
आस-पास के सारे मंज़र सन्नाटों में बदल जाते हैं
रौशनियाँ गुल हो जाती हैं
लम्हा भर को ये लगता है एक बुज़दिल दानिशवर जैसा
कॉफ़ी हाऊस के रिज़्क़ पे ख़ुद को पालने वाला
मैं भी किसी मुर्दा-ख़ाने का भागा हुआ ज़िंदा मुर्दा हूँ
फिर एक चीख़ निकल जाती है
तुम झूठे हो, मैं ज़िंदा हूँ।
एटम
इतनी तहक़ीर से मत देख कि हम ज़र्रे हैं
टूटते हैं तो ग़ज़ब से अपने शहर के शहर जला देते हैं
कई नस्लों को सज़ा देते हैं।
तिलिस्मात
मैंने बचपन में सुना था कि इसी दुनिया में
जिस में हम रहते हैं परियों के तिलिस्मात भी हैं
जिन के बारे में बुज़ुर्गों की रिवायात भी हैं
ऐसी परियाँ कि जो ख़्वाबों में सफ़र करती हैं
चाँद में फिरती हैं ख़ुशबू में सफ़र करती हैं
उन को मिल जाए जो दरमांदा मुसाफ़िर कोई
उस को फिर अपने शबिस्तान में ले जाती हैं
रेशम-ओ-अतलस-ओ-किमख़्वाब उसे पहनाती हैं
उस की दिलजोई के सामान बहम करती हैं
मेहरबाँ होती हैं दिलदारी-ए-ग़म करती हैं
मैं बड़े शौक़ से बचपन में सुना करता था
उन्हीं गलियों में वो पोशीदा ज़ख़ीरे भी हैं
जिन में नीलम भी हैं, अलमास भी और हीरे भी हैं
बे-सदफ़ राह में मोती भी पड़े मिलते हैं
रेत की तह में जवाहर भी दबे मिलते हैं
जिन को हर शख़्स उठा सकता है, पा सकता है
अपनी रातों को चराग़ाँ भी बना सकता है
ये रिवायत भी सुनी थी कि कोई मर्द-ए-ख़ुदा
राह-ए-गुमकर्दा मुसाफ़िर को परेशाँ पा कर
ग़ैब से उक़्दा कुशाई के लिए आता है
मैं बड़ा हो के जब इस शहर-ए-फ़ुसूँ गर में चला
मैंने चाहा कि मुझे राह में परियाँ मिल जाएँ
एक शबिस्तान में तक़दीर की कलियाँ खिल जाएँ
किसी सूरत मिरी दिलजोई का सामाँ हो जाए
मेरे ज़ख़्मों का मदावा किसी उन्वाँ हो जाए
मुझे परियाँ तो क्या शहर में साया न मिला
मैंने चाहा मुझे पोशीदा ज़ख़ीरे मिल जाएँ
वही नीलम, वही मोती, वही हीरे मिल जाएँ
ख़ैर वो नीलम, वो पुखराज तो क्या मिल सकते
कोई पत्थर न मिला जिस से सर फोड़ सकूँ
उम्र भर दश्त-ओ-बयाबाँ में भटकता ही फिरा
और फिर चाहा कि दुख अपने, किसी से कह लूँ
राह में कोई भी ‘अल्लाह का बंदा’ न मिला।
कैंसर
ज़र्द पत्ते लिए टहनियाँ हर शजर की
नदामत से सर को झुकाए खड़ी हैं
शहर-दर-शहर अनफ़ास की खिड़कियों पर सलीबें गड़ी हैं
शहसवारों के सब हौसले, मशअलें, कारवाँ और
दुआओं के सब बादबाँ बे-जिहत, बेयक़ीं
बस्तियाँ वार्ड बनने लगी हैं
और मसीहा हवा हैं
कहीं भी नहीं हैं
मछेरे
इस मह-ओ-साल के समंदर में कितने हाथों ने जाल फेंके हैं
और सब के सब मुंतज़िर हैं कि अब किस के पासे में क्या निकलता है
कश्तियाँ भर के कौन चलता है
और पहरों के इंतिज़ार के बाद कौन ख़िफ़्फ़त से हाथ मलता है
कैसी अंधी फुज़ूल काविश है?
रज़ी अख़्तर शौक़ [1933-1999] पाकिस्तान के समादृत कवि हैं। ज़ुबैर सैफ़ी से परिचय के लिए यहाँ देखिए :ज़ुबैर सैफ़ी