कविताएँ ::
अंजलि नैलवाल

पहाड़ की लड़कियाँ
हर शहर, हर संस्कृति, हर समाज की
अपनी-अपनी किंवदंतियाँ होती हैं।
पहाड़ों की भी हैं—अनेक, अनगिनत।
हर कहानी में घटता है कुछ अजीब।
इन किंवदंतियों में
पहाड़ की लड़कियाँ
मरने के बाद बन जाती हैं
कोई फूल
या कोई पक्षी।
पहाड़ से दूर ब्याही लड़की
पहाड़ की याद में
प्राण छोड़
बन गई फ्योंली का फूल।
भिटौली लेकर
ससुराल आए भाई के
बिना मिले लौट जाने पर
पक्षी बन गई घुघुती।
आज भी
वे रहती हैं पहाड़ों में
मनाए जाते हैं
उनके नाम से
लोक-त्योहार।
ये लड़कियाँ
पहाड़ों की बेटियाँ थीं
पहाड़ों पर ही जीवित रहीं
अन्य रूपों में,
दंतकथाओं में,
त्योहारों में।
पर उन लड़कियों का क्या हुआ होगा
जो नहीं बन पाईं
कोई फूल,
कोई पंछी?
जिन्हें जाना पड़ा
पहाड़ों से बहुत दूर
जो नहीं मिल पाईं
वर्षों तक अपने भाई से?
उन लड़कियों का क्या होगा
जो पहाड़ों से दूर हो बन गईं
शिक्षक,
डॉक्टर,
गायक?
क्या वे भी बनेंगी
कोई फूल?
कोई पंछी?
कोई कहानी?
कोई त्योहार?
कोई गीत?
क्या उन लड़कियों को भी मिलेगा
पहाड़ की किंवदंतियों में स्थान
जिन्होंने अपनी कोशिशें से जीते जी दिए
अपनी बहनों-भतीजियों को पंख
फूलों-सा सुंदर अपना अलग रंग
गीतों-सा मोहक जीवन
कहानी सुनाने-योग्य कृतत्व!
मसालदानी
मसालदानी में रखे हुए मसालों में
बाहर से ख़रीदे मसाले
दिखाई देते हैं अधिक गहरे रंगीन
और चमकदार
घर के पिसे मसाले मंद—
रंगों में भी और स्वाद में भी,
बस भीनी-भीनी गंध ने
उनका स्थान क़ायम रखा है।
लेकिन नमक का कोई रंग नहीं होता,
(पिंक और ब्लैक साल्ट
अभी मसालदानी तक नहीं पहुँचे हैं।)
उस पर दिखाई देते हैं हल्दी और
अन्य मसालों के रंगीन कण।
घर में घिरा हुआ
नित्य के कामों में
मसालों-सा पिसा हुआ दिमाग़ भी
हो जाता है हल्का,
लिजलिजा,
रंगहीन।
गूगल या AI पर सर्च करता है
देश और दुनिया में क्या चल रहा है?
वहाँ पता चलता है कि
देश में लोग गड्ढों में गिर कर मर गए
और दुनिया भर में उनके ऊपर बम गिर गए।
यह पढ़कर दिमाग़ सोचता है
उसका बस चले तो
भर दे सारे गड्ढे
मिट्टी, बजरी और सीमेंट की जगह
गड्ढों में भरे
सारी दुनिया का बारूद।
घर के दिमाग़ को
कमाल का लगता है अपना प्रस्ताव
लेकिन अब वह
घर में पिसे हुए
धनिया पाउडर की बजाय
सफ़ेद नमक बन चुका है
जिसके पास हैं हल्दी और
अन्य मसालों के उड़ते-पड़ते रंग।
अभी तो उसे पिंक और ब्लैक सॉल्ट होना है
जो रहते हैं अलग-अलग डिब्बों में बंद
मसालदानी से बाहर
अपना स्वतंत्र अस्तित्व बचाए।
बूबू1दादा के लिए कुमाऊँनी संबोधन…
एक साल की ही तो थी मैं
जब वो गुज़र गए।
अपने बूबू को आँखों से देखने की
याद नहीं है मुझे।
मैं उन्हें बूबू कहकर
धात नहीं लगा पाई कभी।
मैं नहीं सुन पाई कभी
उनकी आवाज़ में अपना नाम।
मैंने देखा उन्हें दीवार पर टँगी
धुएँ से काली पड़ी तस्वीर में
जिसमें वो पहाड़ी टोपी पहने
बहुत गंभीर दिखाई देते हैं।
मैंने देखा उन्हें
अपने बड़े भाई-बहनों के क़िस्सों में
जिनमें वे डराते थे अपने नातिन-पोतों को
लगा कि शायद वो बड़े ख़ूँख़ार रहे होंगे।
मैंने उन्हें देखा
अपनी माँ के क़िस्सों में
जिसमें भाबर से पहाड़ आई बहू को
वो पहाड़ी काम करना सिखा रहे हैं,
कुछ खाने की,
चाय पीने की इच्छा जता रहे हैं,
सोचा इतने भी ख़ूँख़ार नहीं होंगे शायद।
पिता की यादों में
वे होशियार थे,
दानी थे,
मददी थे,
शिक्षा के अति पक्ष में थे।
मैंने उन्हें कम ही देखा
अम्मा के क़िस्सों में।
कभी घी बेचकर बच्चों की पढ़ाई का
धन इकठ्ठा कर रहे,
कभी बच्चों को पढ़ाते,
पहाड़े याद कराते ही दिखाई दिए।
पर मैंने उन्हें देखा
अम्मा द्वारा पहनी हुई
उनकी बंदर-टोपी में,
उनका मोटा खादी का वास्कट और
अम्मा के दरवाज़े पर रखी
उनकी लाठी में।
मैंने उन्हें देखा
एल्बम में रखी कुछ और तस्वीरों में
जिनमें वो चीड़ जैसे लंबे और
बांज जैसे कड़क दिखाई दे रहे हैं।
मैंने उन्हें देखा
उनके फैलाए हुए संसार में,
संसार के लोगों की आदतों में ,
शारीरिक बनावट में,
चेहरों पर बनी कई-कई धारियों में
जैसे पहाड़ों पर छोटे-छोटे
बारिश के पानी के नौले
अपने निशान बनाते जाते हैं।
अब बूबू देखते होंगे
बंद पड़े अँधेरे कमरे को
तस्वीर से
जिसका जमा धुआँ
कभी मैं पोंछा करती थी
गीले कपड़े से।
अब दीवार से चुँगता
बरसात का पानी
बहा ले जाता होगा
उनकी तस्वीर के पिछले भाग का धुआँ।
बूबू देखते होंगे
अब ख़ाली घर को
जिसमें एक छोटी-सी क़द-काठी की बुढ़िया
दिख जाती है कभी-कभी घर के
मिट्टी-लकड़ी-पत्थर को घिसती
आँगन का झाड़ निकालती
जिन्हें कभी बूबू ने अपनी लंबी-सपाट
पीठ पर उठाया था
और बनाया था एक घर
जिसकी पिछली देहली से
आँगन के आख़िरी छोर तक
कभी वो देखना चाहते होंगे
हम सबको एक साथ…
सड़क
मेरे गाँव में अब सड़क आ गई है।
सोच रही हूँ
नई सड़क से जाना कैसा होगा
असली सड़क तक
अब यह भी एक आदत डालनी होगी नई।
अठारह साल लगातार मैंने
हाँफते-बेदम होते स्कूल का बस्ता ढोया
और पाँच मिनट में पहुँचती रही
पुरानी मुख्य सड़क तक।
पैंतीस साल मेरी माँ ने आटे के कट्टे,
सिलेंडर और न जाने
कितनी ज़िम्मेदारियों के बोझ ढोए
सड़क तक।
पिता की,
गाँव वालों की
और भाई-बहनों की
पुरानी सड़क से जुड़ी बात बताते-बताते
नई सड़क शायद पूरी बनकर ही तैयार हो जाए।
अब नई सड़क गाँव तक आ गई है।
पत्थर के मकानों ने,
पत्थर के आँगनों ने
सड़क को कभी नहीं देखा था
उन्होंने तो चौथर पर रखे बोझ के नीचे
सिर लगाते,
बोझ उठाते लोगों को देखा था
अब नई सड़क को भी देख लिया
पर उतने लोग नहीं दिखाई दे रहे
शायद चढ़ाई चढ़कर
बहुत पहले
पुरानी सड़क
उन्हें
कहीं
ले
गई
है।
प्रकृति के सवाल
फूल मुरझा नहीं रहे आजकल
दम तोड़ रहे हैं
झुलसकर सूर्य के अग्निकुंड में।
कैसा होगा वह फूल जो
खिल जाता होगा
अग्निकुंड के बीचोबीच
चुनौती देता सूर्य को
विद्रोह करता
झुलसी पड़ी बगिया की
शोभा बढ़ाता होगा।
कैसे होंगे वो पेड़ जो
हरे-भरे दे रहे हैं अब भी फल
ये जानते हुए कि
ये ज़मीन बिक गई है लाखों में
और इस पर करोड़ों की बिल्डिंग बनेगी
जिसके बैठक के ओने-कोने रखे जाएँगे
प्लास्टिक के सुंदर प्लांट।
कैसा होगा वह पौधा जो
फूट पड़ता होगा
बारूद से सनी धरती की छाती से
चिथड़े हुए बच्चे के अवशेषों के बग़ल से
बनना चाहता होगा एक विशाल पेड़
जिसने इतिहास देखा हो।
कैसी होंगी वो कलियाँ
वो शाखाएँ जो
फिर निकल आती हैं
नंगे कर दिए गए
कमर से नीचे तक काट दिए गए
कई सौ साल पुराने पेड़ से
जो किसी धार्मिक भीड़ की
अड़चन बनने वाले थे।
ये फूल-पौधे-शाखाएँ भी गिने जाते होंगे
प्रदर्शनकारियों में?
क्या ये माने जा सकते होंगे
प्रकृति के सवाल?
अंजलि नैलवाल की कविताओं के प्रकाशन का यह प्राथमिक अवसर है। उनकी यहाँ प्रस्तुत कविताएँ ‘सदानीरा’ को सुपरिचित कवि-लेखक शिरीष कुमार मौर्य के सौजन्य से प्राप्त हुई हैं, इस परिचय के साथ—“अंजलि नैलवाल ने अँग्रेजी में एम.ए. किया है और अभी इग्नू से अनुवाद का डिप्लोमा कर रही हैं। वह कुमाऊँ के ग्रामीण अंचल की रहवासी हैं। इससे पूर्व ‘विश्वरंग’ में उनके किए कुछ अनुवाद छपे हैं और कुछ ‘अनुनाद’ पर। ‘जानकीपुल’ पर उनका एक समीक्षात्मक लेख भी प्रकाशित हुआ है। वह हिंदी की युवतर पीढ़ी की अनाम-सी प्रतिनिधि हैं। वर्ष 2024 में नैनीताल में उन्होंने ‘हिन्दवी’ के कैंपस कविता आयोजन में कविता-पाठ किया और पुरस्कृत भी हुईं। इन कविताओं की यह कवि साधारण को जीती और लिखती है।” अंजलि से nailwal.anju04@gmail.com पर संवाद संभव है।