कविताएँ ::
प्रभात प्रणीत

गवाह
मेरे घर की दीवारें बहुत मज़बूत हैं
उनमें सीलन नहीं आती
आवाज़ें नहीं टिकतीं
मैंने उन्हें ख़ुद चुना था
ईंट, चूने और चुप्पी की
सही मात्रा के साथ।
हर सुबह एक चिड़िया आती है
खिड़की की चौखट पर
मैं उसे दाना डालता हूँ
उसकी चोंच में
थोड़ी देर के लिए
दुनिया निर्दोष लगती है…
यह मेरी करुणा का दैनिक अनुष्ठान है।
इसके बाद मैं अख़बार मोड़ देता हूँ
जैसे किसी घायल आदमी पर
चादर डाली जाती है।
पिछले महीने
पड़ोस में
कुछ हुआ था।
धुआँ कई दिनों तक
हवा में लटका रहा
जैसे शहर ने
अपनी ही त्वचा जला दी हो।
उस शाम
मेरी माँ का फ़ोन आया था
उन्होंने पूछा,
दूध रखा है या नहीं,
ठंड बढ़ रही है
और वह पुरानी खाँसी अब कैसी है?
मैंने लंबी बात की।
खाना ठंडा हो गया।
दुबारा गरम किया।
बाहर
कुछ था
जो ठंडा नहीं हुआ
जिसे किसी बर्तन में रखकर
फिर से आग पर
नहीं चढ़ाया जा सकता था।
रात भर
सायरनों की आवाज़
ऐसे घूमती रही
जैसे अँधेरे में
कोई लोहे की कील
धीरे-धीरे
शहर के माथे में ठोकी जा रही हो।
मैं सो गया।
सुबह
दूधवाला हमेशा की तरह आया।
मैं अपनी भाषा में
बहुत सावधान हूँ।
मैं चिंताजनक कहता हूँ,
असहनीय नहीं।
दुर्भाग्यपूर्ण कहता हूँ,
अक्षम्य नहीं।
घटना कहता हूँ,
दफ़नाना नहीं।
स्थिति नियंत्रण में है…
जैसे वाक्य
मुझे हमेशा सभ्य लगे हैं।
जैसे दूरबीन को
उल्टा करके देखने से
आदमी छोटा हो जाता है
और सहनीय…
मैं यह कला
बचपन से जानता हूँ।
शब्दों की भी
एक सुरक्षित दूरी होती है
जिसके पार
मनुष्य दिखाई देने लगता है
और मनुष्य दिखाई देने लगे
तो ज़िम्मेदारी शुरू हो जाती है।
मैं उस दूरी को
बहुत अच्छी तरह जानता हूँ।
वहाँ तक जाता हूँ,
जहाँ तक आत्मा पर
खरोंच न आए।
मेरे पुरखों में कोई था
जो किसी लड़ाई में नहीं गया
उसने घर बनाया,
बच्चे पैदा किए,
धान सुखाया
और मरने से पहले
ज़मीन का एक टुकड़ा छोड़ गया
जिस पर मैं खड़ा हूँ।
इतिहास में उसका नाम कहीं नहीं है
लेकिन उसकी सावधानियाँ
अब भी मेरी हड्डियों में चलती हैं :
धीमी और गर्म।
कभी-कभी
मैं उसे याद करता हूँ
वैसे जैसे लोग
पुराने कुओं को याद करते हैं
जिनसे पानी तो नहीं निकालते,
पर उन्हें भरते भी नहीं!
मेरे बच्चे ने
एक बार पूछा था,
उस वक़्त
तुम कहाँ थे?
उसकी आँखों में
इतनी सीधी जगह थी
कि मैं उसमें
अपना चेहरा नहीं रख पाया।
मैंने उसके सिर पर
हाथ रखा…
सो जाओ… मैंने कहा,
कल स्कूल है।
वह सो गया।
बहुत देर तक
उसके कमरे में
साँसों की हल्की आवाज़ आती रही।
मैं जागता रहा
जैसे कोई आदमी
अपने दरवाज़े के बाहर
धीरे-धीरे जमा होते पानी की आवाज़ सुनता है
और कुंडी की मज़बूती पर
विश्वास करने की कोशिश करता है।
मेरे शहर की एक सड़क पर
एक पेड़ है
जिसे कुछ साल पहले
आधा काट दिया गया था
उसका खुला हुआ तना
अब भी भीतर से
काला पड़ता जाता है
लेकिन हर मार्च
उस पर पत्ते आते हैं
उस पेड़ को देखकर
मैं सोचता हूँ
जीवन सचमुच
बहुत लचीला है
फिर अचानक याद आता है
लचक
कई बार
रीढ़ टूटने के बाद भी
बची रह जाती है।
मैं घर लौट आता हूँ
धीरे-धीरे चाय पीता हूँ
कप से उठती भाप में
मुझे हमेशा
कोई चेहरा नहीं दिखाई देता।
मेरी किताबों की आलमारी में
एक किताब है
उसमें एक आदमी का नाम है
जो किसी और के लिए मरा था
मैं उसका नाम भूल चुका हूँ
लेकिन मुझे याद है
उसकी तस्वीर में
आँखें सीधी थीं
मैंने वह किताब
बहुत साल पहले पढ़ी थी…
तब से
वह आलमारी में है
दूसरी सुरक्षित चीज़ों के बीच।
मैं कभी-कभी
उसकी रीढ़ पर
उँगली फेरता हूँ
जैसे अँधेरे में कोई आदमी
मंदिर की दीवार छूकर
अपने धार्मिक होने की पुष्टि करता है।
मेरी आत्मा बहुत साफ़-सुथरी है
मैंने उसे हमेशा बंद कमरे में रखा है
धूप नहीं लगने दी
बारिश नहीं लगने दी
किसी घायल मनुष्य की छाया तक
उस पर नहीं पड़ने दी।
वह अब भी
वैसी ही है
जैसी थी
बिल्कुल नई जैसी
इस्तेमाल न की हुई।
अनुपस्थिति का विधान
यहाँ जो नहीं है
वही सबसे अधिक उपस्थित है
जैसे किसी कमरे में छूटी हुई गंध
जो दिखती नहीं
पर देर तक ठहरती है
दुपहर अभी मरी नहीं है
उसने करवट बदली है
रोशनी अब सीधे नहीं उतरती
दीवारों से मुड़कर भीतर आती है
और आँखों की जगह ले लेती है
दीवारें साये नहीं फेंकतीं
वे उँगलियाँ भेजती हैं
पड़ोस की खिड़कियों की ओर
इतनी चुपचाप
कि देखना अब जाना नहीं
पकड़ा जाना हो
दरवाज़ों पर ताले हैं
चाबियाँ कहीं नहीं दिखतीं
फिर भी खुलने-बंद होने का क्रम बना रहता है
जैसे किसी और की उँगलियाँ
हमारी जेबों में रखी हों
शहर के बीच बरगद खड़ा है
जड़ों से बँधा हुआ
और उसी से भयभीत
उसकी छाँव में खड़े लोग
ऊपर नहीं देखते
एक आदमी कुएँ में उतरा था
नीचे रस्सी नहीं थी
सिर्फ़ स्मृति…
स्मृति के सहारे उतरा जा सकता है
लौटा नहीं
जो लौटे भी होंगे
उन्होंने कुछ कहा नहीं
या कहा
तो सुनाई नहीं दिया
काग़ज़ों से कुछ नाम
बिना काटे हुए ग़ायब हैं
सूचियाँ ठीक रहती हैं
पर लोग नहीं मिलते
नामों से ज़्यादा भरोसा
सूचियों पर होने लगता है
चौराहे का बुत
हर रात अपनी मुट्ठियाँ और कस लेता है
उसके पैरों तले बीज हैं
वे मिट्टी और बारिश को पहचानते हैं
पर याद नहीं
कि ज़मीन कभी उनकी थी
याद दिलाने वाला
कभी लौटकर नहीं आया
एक आवाज़ है
जो कभी सुनी नहीं गई
पर उसी के अनुसार
वाक्य रुकते हैं
और एक दिन
गले भी
एक ख़ाली फ़्रेम दीवार पर टँगा है
कोई तस्वीर नहीं
पर उसी के हिसाब से
नज़र ठहरती है
किताबों में कुछ पन्ने नहीं हैं
पर कथा चलती रहती है
नदी बह रही है
पर उसकी सतह पर कोई लहर नहीं
एक पत्थर फेंका जाता है
डूबने की आवाज़ नहीं आती
यहाँ गिरना भी दर्ज नहीं होता
किनारे पर एक बच्चा मुट्ठी खोलता है
उसे बताया गया है कि इसमें पानी है
वह अपनी सूखी हथेलियों को देखता है
फिर उस बहाव को
और इस बार
अपनी मुट्ठी बंद कर लेता है
रात आती है
बिना अँधेरे के
गली में भारी जूतों की ध्वनि है
उन्हें यहाँ शांति कहा जाता है
और कुछ दरवाज़ों के पीछे
अब भी जाग रही है
एक ऐसी नींद
जो टूटने से इंकार करती है
और फिर भी कुछ ऐसा है
जो अब भी बचा हुआ है
जिसे हमने कई नाम दिए
पर वह हर बार
बिना नाम के लौट आता है
वही
धीरे-धीरे
अपनी जगह पहचान रहा है।
धुँध का व्याकरण
एक दिन
शब्द के पाँव के नीचे से
ज़मीन इस तरह सरकी
कि बस चलने की लय बनी रही।
उसे लगा वह यात्रा में है।
पर वह शून्य नहीं
शून्य का अभ्यास था।
वे रोशनी नहीं बुझाते
बस हवा में
उतनी जगह छोड़ते हैं
कि लौ काँपती रहे
जलती तो दिखे
पहुँचे कहीं नहीं।
उनकी हँसी
ठंडी धातु में फँसी गूँज की तरह गिरती है
ठीक वहाँ
जहाँ अर्थ आकार लेने ही वाला होता है।
वे अर्थ नहीं बदलते
बस उनके बीच की दूरी
इतनी-सी खिसका देते हैं
कि अर्थ वहीं रहता है
और पहुँच से बाहर हो जाता है।
विस्तार के नीचे
एक कील है आधी
पूरी प्यास वाली।
ऊपर सब मख़मली है
नीचे हर क़दम
ज़रा-सा टेढ़ा।
इतिहास उन्हीं का होता है
जो लँगड़ाकर चलने को
नृत्य कह देते हैं।
आईने टँगे हैं इस तरह
कि चेहरा नहीं
चेहरे के पीछे की जगह दिखती है
धीरे-धीरे
वही जगह चेहरा हो जाती है।
सत्य निर्वासित नहीं
बस इतना घिरा हुआ है
कि अपनी ही आवाज़
इशारों से पहचाननी पड़ती है।
कमरा अब ख़ाली नहीं
वह हँसी से भरा है
पर वह हँसी किसी की नहीं
उस सन्नाटे की परछाईं है
जिसे बार-बार सुख कहा गया।
और अंत में
वे तुम्हारी ज़बान नहीं काटते।
वे पास बैठते हैं
तुम्हारे शब्दों के बीच
हल्की-सी जगह बदल देते हैं।
तुम चीख़ते हो
और उन्हें
एक सुंदर प्रार्थना सुनाई देती है।
प्रभात प्रणीत [जन्म : 1977] सुपरिचित कवि-लेखक हैं। उनके दो उपन्यास—यही इंतिज़ार होता और वैशालीनामा तथा एक कविता-संग्रह प्रश्नकाल प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी यहाँ प्रस्तुत तीन नई कविताएँ सत्ता, भाषा और नैतिकता के अदृश्य तंत्रों की पड़ताल करती हैं। कवि ने यहाँ बहुत सजगता से स्वयं को अभिधा, सपाटपन और प्रवचनात्मकता से बचाया है। यह कवि-विशेषता यहाँ ध्यान, रेखांकन और उल्लेख-योग्य है। प्रभात प्रणीत पटना में रहते हैं। उनसे prabhatpraneet.com | prabhatpraneet@gmail.com पर संवाद संभव है।