कविताएँ ::
लवली गोस्वामी

इस वसंत
तितलियाँ ओढ़कर सोए थे तुम
तुम्हें छूने से
मेरे बदन पर कुछ रंग छूट गए
तितलियाँ उड़ीं
वहाँ बस एक आदमक़द सुगंध रह गई
तुम मुझे ख़ूब चूमो
तुम्हारे चुम्बन के निशान जोड़कर
मैं एक लिहाफ़ बनाऊँगी
उन्हें ठंड में पड़े पत्थरों को ओढ़ाऊँगी
कुछ को टाँक दूँगी
उन पौधों की फुनगियों में
जिनमें इस वसंत फूल नहीं आए
बोलो इस साल मुझे क्या मिलेगा?
लंबी सर्दियाँ?
जिन्हें घोड़े की तरह
अपने मन की बग्घी के आगे बाँधकर
मैं जीवन का बाक़ी सफ़र तय करूँ
या फिर तुम्हारी हँसी के
खनखनाते सिक्के?
जिन्हें अपनी राह में
मील के पत्थरों की तरह गिनूँ।
तुमसे मिलना
कामों की सूची में
सबसे अंतिम जगह पर होता है
तुमसे मिलना
जिससे तुम्हारे होने का सुरूर
दूसरी सुबह देर तक बना रहे
जैसे तितली के पैरों पर
दूसरी सुबह तक
अंतिम फूल का
पराग रह जाता है।
कुछ देर
बेहद सुंदर वाक्य के बाद
जल्दी से दूसरा वाक्य नहीं पढ़ना चाहिए
सुंदर वाक्यों के बाद
मामूली वाक्यों को पढ़ने से पहले रुकना चाहिए
आँखें बंद करके गहरी साँस लेकर
सुंदरता को दिल में उतरने देना चाहिए
ख़ुद के मन में सुंदर वाक्य उपजे
इसके लिए इतना जतन ज़रूरी है
गहरा हो मन में प्रेम
इसके लिए यह जतन ज़रूरी है
प्रेमी से मिलने के बाद
कुछ देर तक किसी से नहीं मिलना चाहिए।
अंतिम लहर
गर्भावस्था में आई
छोटी-बड़ी तकलीफ़ों ने
मुझे लगभग
मार ही डाला है
बस अब
अंतिम दुःख की
लहर की ही
प्रतीक्षा है
वह आए
और मृत्यु
नवजात की तरह
मेरी गोद में खेले।
न्याय का नवजात
मैं अंडे का ऐसा खोल हूँ
जिसके भीतर लगातार तीर-अंदाज़ी हो रही है
तुम नहीं चाहोगे
कि यह अंडा फूटे
तीर हर दिशा से तुम पर
एक साथ छूटें
मेरे अंदर न्याय का नवजात है
और नवजात
हिंसा-अहिंसा का फ़र्क़
नहीं समझता।
समुद्र की हथेलियाँ
क्या यह कोई अचम्भा है कि
दुनिया में कहीं
कोई भी इंसान
जब किसी को दयालुता दिखाता है
तो उसमें मुझे
तुम्हारा चेहरा नज़र आता है
जैसे तुम्हें देखते हुए मुझे लगता है
नदियाँ समुद्र की हथेलियाँ हैं
जिनसे वह पर्वतों का माथा सहलाता है।
नुचे पंख और ग़ुस्साए लोग
उन्होंने चिड़िया का एक-एक पंख नोच लिया
फिर चिड़िया को उछाला
चिड़िया नहीं उड़ सकी
धूल पर गिर गई
वे ग़ुस्सा हुए
बोले :
इस चिड़िया को उड़ना नहीं आता
फिर उन्होंने चिड़िया से अलग किए हुए
पंख और डैने अपने हाथों से उछालकर उड़ाए
पंख ज़मीं पर जा गिरे
वे फिर उड़ान नहीं देख पाए
इन पंखों में ज़रा भी उड़ान नहीं है
वे फिर ग़ुस्से से चिल्लाए
कवि वही सामने खड़ा
यह तमाशा देख रहा था
वह नहीं कह सका
मेरी एक-एक पंक्ति को तोड़कर
उसका अलग अर्थ निकालकर
आप मेरे व्यक्तित्व को नहीं समझ सकते
चिड़िया भी नहीं कह सकी
पक्षी के एक-एक पंख को उखाड़कर
उसके डैने नोचकर
आप कभी उसकी उड़ान की उँचाई
नहीं समझ सकते।
लवली गोस्वामी [जन्म : 1987] सुपरिचित-सम्मानित कवि-लेखक हैं। उनकी कविताओं की दो पुस्तकें उदासी मेरी मातृभाषा है [2019] और पंखुड़ी की ढाल [2024] प्रकाशित हो चुकी हैं। इस अवधि के बीच उनका एक उपन्यास वनिका [2023] भी प्रकाशित हुआ। उनकी यहाँ प्रस्तुत सात नई कविताएँ बार-बार पढ़े जाने योग्य हैं। यह एक सामान्य टिप्पणी लग सकती है, लेकिन कविता के भरपूर और भयावह प्रकाशन के बीच यह बात बहुत बड़ी बात हो जाती है कि कुछ कविताएँ हमें बार-बार पाठामंत्रण देती हैं। लवली गोस्वामी से l.k.goswami@gmail.com पर संवाद संभव है।