कविताएँ ::
दिनेश कुशवाह

दिनेश कुशवाह

बेटी जनम का सोहर

जग जननी को देखा भाला
एक शंका पर देश निकाला।
पति जी मेरे आप सही हैं
मेरी ग़लती कहाँ नहीं है।
बीवी हो या अम्मा-दादी
तुमने तो औक़ात बता दी।
अगर कभी जो किया स्वयंवर
उढ़री पदवी थी जीवन भर।
शादी ब्याह सभी में गाया
तिरिया जनम अकारथ पाया।
सासुर हो या होवे नैहर
बिटिया जनम का एक न सोहर
हाय शास्त्र पर वाह रे लोका
तुमने भी दे डाला धोका।

लिखनी

नियति के आगे किसका ज़ोर चलता है
होनी को कौन टाल सकता है भला?
कौन बदल सकता है
विधि का विधान, ब्रह्मा की टाँकी
ऊपर वाले का लिखना!

सुनते-सुनते पक गए कान
नहीं हुआ विपत्ति का बिहान।
इससे तो अच्छा था
नहीं होता लिपि का आविष्कार
अगर इसे ही कहते हैं लिखना
तो अच्छा था
लोग नहीं जाते पढ़ना-लिखना।

ये दिनेश नाम का आदमी

ये छंद ख़ानाबदोश थे
बंजारे, मन के गीत थे,
कुछ दूर चल के बिछुड़ गए
सैलानियों से मीत थे।

मन एक था कि अनेक था
पर चंचला यह आँख थी,
जब फूल बरसे देह पर
तब मुट्ठियों में राख थी।

ये हक़ीक़तों की जीत है
वे भावना के घेराव थे,
जहाँ घर बनाने की चाह थी
वे रास्ते के पड़ाव थे।

जो बूँद मात्र मिला नहीं
उस स्वाति नीर की आस थी,
ये तो आँसुओं ने निभा दिया
न तो आत्मा तक प्यास थी।

कभी आ सकोगी तो देखना
क्या ज़िंदगी का कमाल है,
ये दिनेश नाम का आदमी
हर हाल में ख़ुशहाल है।

पहेली

कभी-कभी प्रतिरूप तुम्हारे मिलते रहते हैं
कानों में सरग़ोशी कर कुछ कहते रहते हैं।
हर पखवारे मुझको ऐसा सपना आता है
सपने में भी अज़ब-गज़ब से जी घबराता है।

दिखता है कि गाँव तुम्हारे गया हुआ हूँ मैं
सहमा सहमा, डरा-डरा-सा, मुआ-मुआ हूँ मैं।
केवल तुम्हें देखने की अभिलाषा है मन में
साँसे उफन रही हैं भीतर, सिहरन है तन में।

लगता है कि घर के अंदर बैठी होगी तुम
जो नैहर में भाई के घर आई होगी तुम।
खड़ा मोड़ पर, दरवाज़े को देखा करता हूँ
अपनी नज़रों से ख़ुद अपना पीछा करता हूँ।

वही पुराना भय मानस में अब भी पलता है
डर-आशंका, मार-पीट का ट्रेलर चलता है।
लुकते-छिपते, दौड़-भागकर जान बचाता हूँ
बलि से बचे हुए पशु जैसा, जगकर पाता हूँ।

यह सपना बीते बरसों से बहुत डराता है
फिर भी सपनों में यह सपना बहुत लुभाता है।
सपने में भी तुमसे भेंट नहीं होती बेबी
सुनता हूँ सबला अम्मा हो, दो-दो बच्चों की।

अब मेले में मिल जाओगी भास नहीं होता
जीवन के संयोगों पर विश्वास नहीं होता।
नहीं जानता अब कितने दिन जीने वाला हूँ
मैं जीवन के साठ बरस अब छूने वाला हूँ।

तुम भी तो कर पार पचासा पचपन में होगी
तब फिर मुझको क्यों लगता है बचपन में होगी।

आदमी

हिंदू से कुछ कहता हूँ
चिढ़ता है
मुस्लिम से कुछ कहता हूँ
चिढ़ता है
सिक्ख से कुछ कहता हूँ
चिढ़ता है
चिढ़ता है ईसाई
जब उससे कुछ कहता हूँ।

सब कहते हैं
उससे कहकर देखो
बोलती बंद कर देगा
मैं खोज रहा हूँ आदमी
जिससे कुछ कहा जा सके।

फिर वही काशी फिर वही कबीर

एक ही चादर में
बिता दिया जीवन
चादर से बढ़कर पाँव
कभी नहीं फैलाए।

कितनी बार
ठिठुर रहे औरों को भी
समेट लिया अपनी चादर में
कोई न कोई चीज़ घटी ही रहती थी
घर में
पर कोई साधु कभी
घर से भूखा नहीं गया।

पर इसी काशी में
बहुत सारे लोग थे
जिन्हें न अन्न बदा था
न वस्त्र।

कहते हैं सबका पालनहार एक है
पर उनका कोई तारनहार नहीं था
सोचता था तो
रात भर नींद नहीं आती थी।

कपट की अखंड ज्योति से
जलती रहती थी छाती।

साहेब से सब होत है, बंदे से कछु नाहिं
तो फिर बंदे क्या करें, कहु कबीर कँह जाहिं
पुनि-पुनि साहेब ने कहा, क्यों न धरे तू धीर
तूँ क्यों रोता रात भर, सोता नहीं कबीर।

हँसी

कहते हैं द्रौपदी बहुत हँसती थी
बहुत हँसती थी वह भी
मिट्टी के बर्तन बनाती
तब भी हँसती।

नई नवेली गवने आयी
बहू की चर्चा पूरे गाँव में थी
हँसे तो फूल झरे
रोए तो मोती
ऐसा सुघर सुभाय।

कोई सामने पड़े
ठमक पड़े तो हँस दे
एक दिन गाँव के ही एक
दबंग ने उसकी बाँह पकड़ ली
सबके सामने
वह हक्का-बक्का
उसी के ओसारे में खींचकर ले गया
नारी देह धरने का दंड दिया
बोला थोड़ा कम हँसा करो।

सास-ससुर सिर झुकाए थे
पति को काठ मार गया था
वह हो गई थी पत्थर
फिर कभी हँसी के मौक़ों पर भी
उसे हँसते हुए नहीं देखा गया।

सादा जीवन : उच्च विचार

सब कुछ पूँजी
सब कुछ पैसा
मौसम
कभी नहीं था ऐसा!

बात करें क्या
बाप रे दादा
नरक बन गया
जीवन सादा!!

वैश्वीकरण सरासरम्
व्याप्तं येन चराचरम्
ना समझे
वो निशाचरम्।


दिनेश कुशवाह (जन्म : 1961) हिंदी-लोक-वृत्त के बेहद अनूठे कवि और गद्यकार हैं। उनका कुछ भी अप्रकाशित पा पाना और प्रकाशित कर पाना सौभाग्य है। इस अर्थ में उनकी ये बिल्कुल नई आठ कविताएँ ‘सदानीरा’ का सौभाग्य हैं। ‘इसी काया में मोक्ष’ और ‘इतिहास में अभागे’ शीर्षक से उनकी कविताओं की दो किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनसे dineshapsu@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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