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ज्योति रीता

ज्योति रीता

सम्मानित आलोचक महोदय!

देश के अलग-अलग कोनों से आई स्त्रियाँ
अपना दुःख साझा कर रही थीं
इस यात्रा के लिए उन्होंने क्या-क्या पीछे छोड़ा
इस यात्रा तक आने में
कई कंकड़ उनके तलवों में धँसे हैं
कोई पीठ पर कुहनी मार देता है
कोई छाती पर हाथ रख देता है
स्त्रियों की आँखें लाल हैं
वे चाहती हैं गले लगकर फफक पड़ना
उनके तालू में अनेकों कहानियाँ चिपकी हुई हैं
उनकी नाभि में अनगिनत विषयों पर कविताएँ छुपी हुई हैं

औरतें कहना चाहती हैं कि
कुछ है जो उनके गले में अटक गया है

वे आकाश में कितने सारे फूल उगा लेना चाहती हैं
कितनी सारी फ़सलें उनकी हथेलियों पर उगी हैं

धूप, हवा और पानी उन्हें समय से मिले
समय से मिले उन्हें चुटकी भर नमक
उनके बाल थोड़े कम बेतरतीब हों
चेहरे पर ताज़गी रहे
कविता की पंक्ति लिखते वक़्त दूध न उबले
बेटे को भूख की दरकार न हो

औरतें ख़ुश थीं
उन्होंने रोटी बेलते,
कपड़े धोते,
साफ़-सफ़ाई करते हुए
परचा तैयार किया था

वे पहली बार निकली थीं घर से
घर की देहरी पर ही
उनकी चप्पल की बद्धी टूट गई थी

औरतें जिन्होंने अभी-अभी
पोडियम के सामने खड़े होने का शऊर सीखा था
वे बोलते हुए कई बार लड़खड़ा रही थीं

औरतों ने आत्मविश्वास की रस्सी ज़ोर से पकड़ रखी थी
वे वक्तव्य के अंतिम मिनट तक उस रस्सी को पकड़े रहीं

आलोचक उनकी भाषा पर बात कर रहे थे
उनके सतही वक्तव्य की आलोचना कर रहे थे
उच्चारण से लेकर शब्द-विन्यास तक पर बात हो रही थी
उनके कपड़े, जूते और खड़े होने के ढंग पर चर्चा हो रही थी

क्या था जो छूट गया था
क्यों था जो छूट गया था

आलोचकों ने चाय और नाश्ते के लिए
पंद्रह मिनट का ब्रेक दिया है
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सम्मानित आलोचक महोदय,
चाय और नाश्ते के इस पंद्रह मिनटीय विराम में
यदि संभव हो तो
उन स्त्रियों के तलवों में धँसे कंकड़ों पर भी बात कीजिए
उनकी लड़खड़ाती आवाज़ के पीछे छिपे साहस को पढ़िए
उनके गले में अटके शब्दों को सुनने की कोशिश कीजिए
भाषा, उच्चारण और शब्द-विन्यास से आगे बढ़कर
उनकी यात्रा का व्याकरण समझिए
जहाँ रोटी बेलते हुए भी एक वक्तव्य तैयार होता है

इंतिज़ार कीजिए, हम फूल लेकर पुनः लौट आएँगे!

तुम बड़े आलोचक हो!

अभी आँखें खुली भी नहीं थीं
कि तुमने स्वप्न तोड़ दिया

तुम्हारे पास एक चश्मा है
उस चश्मे से तुम दुनिया देखते हो

तुम दुनिया को वैसा ही देखना चाहते हो
जैसी दुनिया तुमने बना रखी है

तुम कुछ बदलाव नहीं चाहते
या बदलाव को अपनाना
तुम्हारे शऊर में नहीं है

तुम आत्ममुग्धता के मारे हुए हो
तुम्हें जी-हुजूरी बेहद पसंद है

तुमने साहित्य की सेवा की
या साहित्य की सारी मलाई खा ली

तुम खाए-अघाए हो

तुम साहित्यकार पर बातचीत नहीं
मुजरा करते हो

तुम हर बात पर नाख़ुश रहने की
एक अजीब-सी बीमारी से पीड़ित हो

तुम्हें संतुष्टि-लेप आज तक नहीं मिला

तुम इशारा समझते नहीं
तुम्हें कौन बताएगा
कि तुम्हारी ग़लतफ़हमियाँ क्या हैं

हम मार खाए-पिटे-भोथड़े लोग हैं
तुम्हारी सभ्यता में हम असभ्य हैं

एक सत्ता सरकार की है
एक सत्ता साहित्य की है

सत्ता के आस-पास
बहुत सारे चींटों का घूमना आम बात है
यह तुम्हारी दरियादिली है
कि तुम उनके लिए कुर्सी लगाते हो

तुम्हारा दरबार कभी ख़ाली नहीं रहेगा
चौंधियाई आँखें उस ओर हमेशा देखती हैं

हम तुम्हें अपना प्रणाम भेजते हैं!

हम

हम चूके हुए थे

दो वक़्त की रोटी तलाशने में
हम पूरा दिन खा जाते
प्यास लगने पर हम छक कर पी लेना चाहते थे
कोई ज़हरीली शराब
और कोस लेना चाहते थे
मनुष्य रूप में मिले जीवन को

जून की धूप भी
हमें उतना नहीं जला पाती
जितना हम लोगों के तानों से जल गए थे
उनकी नज़रों से बचने की कोशिश में
हम तलहटी तक धँसते जा रहे थे

मन में कितनी ही लालसाएँ थीं
जिनको असमय ही मौत के घाट उतार देना पड़ा

रेत पर बैठे-बैठे हमने बना लिया था
अपना एक महल
महल के बीचोबीच खोद ली थी
अपने लिए एक क़ब्र

दुख से भरे कंठ में मार जाए लकवा…
हम दुआ में ऐसा चाहते रहे
चाहते रहे खुल जाएँ ईश्वर के अर्द्धनयन

आधी रात गए
भूल जाएँ
हम घर का रास्ता
पड़ोसी कहें—
यह पागलपन है
और हमें मिले थोड़ा सुकून

तपाने के लिए जली हुई आग ठंडक दे रही है
डूबने भर का पानी हमारे तैरने का सहारा है

तथ्य और सच्चाई का
समर्थन करने वाला व्यक्ति
हमारा प्रेमी हो सकता है
घबराए हुए व्यक्ति से
हमारा कोई संबंध नहीं

हम लाँघ आना चाहते थे वह पूरी ज़मीन
जिस पर हमारे लिए बनाए गए थे कई रिवाज

इन दिनों आसमान की तरफ़ देखना भी दुखद है

दुनिया ख़त्म होने से पहले बस एक जगह चाहिए
जहाँ पहले से रखे जा सकें ट्यूलिप के कुछ फूल
और बुदबुदाए जाएँ आत्मा की शांति के लिए दो शब्द…


ज्योति रीता की कविताओं के ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह दूसरा अवसर है। उनके दो कविता-संग्रह—मैं थिगली में लिपटी थेर हूँ और अतिरिक्त दरवाज़ा—प्रकाशित हो चुके हैं। उनसे और परिचय तथा संवाद के लिए यहाँ देखिए : औरतों का उग्र होना उनके जीने का नमक है

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