वारसन शायर की कविता ::
अँग्रेज़ी से अनुवाद : तरुण त्रिपाठी

वारसन शायर (जन्म : 1988) सोमाली-केन्याई-ब्रिटिश कवयित्री हैं। Teaching My Mother How to Give Birth उनकी पहली कविता-पुस्तिका है, जिसमें महज़ 20-22 कविताएँ हैं। उसमें In Love and In War शीर्षक से दो पंक्ति की एक कविता है : 

To my daughter I will say,
‘when the men come, set yourself on fire’…

वारसन शायर ने Brave Girl Rising नाम की एक शॉर्ट फ़िल्म भी लिखी है, जो अफ़्रीका के सबसे बड़े शरणार्थी शिविर की सोमाली लड़कियों की आवाज़ बनी। Bless the Daughter Raised by a Voice in Her Head इनका पहला कविता-संग्रह है। 34 Excuses For Why We Failed at Love भी उनकी एक विशेष कविता-कृति है। यहाँ अनूदित Home शीर्षक कविता अन्य कई कविताओं सहित कवयित्री की आवाज़ में यू-ट्यूब पर भी उपलब्ध है।

वारसन शायर

घर

कोई नहीं छोड़ता घर
जब तक कि
घर किसी शार्क का जबड़ा नहीं हो जाता
तुम तभी भागती हो सरहद की तरफ़
जब देखती हो पूरा शहर भागता हुआ उधर

तुम्हारे पड़ोसी—भागते हुए तुमसे तेज़
उनके गले में लहूलुहान साँसें
जिस लड़के के साथ तुम स्कूल जाती थीं
जिसने तुम्हें चूम कर बेसुध कर दिया था—
पुराने टीन कारख़ाने के पीछे,
वह लिए हुए है अपनी देह से बड़ी एक बंदूक़;
तुम घर तभी छोड़ती हो
जब घर तुम्हें अब रहने नहीं देता

कोई नहीं छोड़ता घर
जब तक कि
घर तुम्हें खदेड़ने नहीं लगता,
पाँवों तले आग,
अंतर में खौलता ख़ून

ऐसा करने का तुमने कभी नहीं सोचा था
जब तक कि जलता हुआ ख़ंजर
तुम्हारी गर्दन में डर नहीं भर देता
और तब भी तुम अपनी साँसों में अपना राष्ट्रगीत जीवित रखती हो,
किसी हवाई अड्डे के टॉयलेट में फाड़ते हुए अपना पासपोर्ट
सिसकती हुई,
जबकि काग़ज़ का हर निवाला
यह स्पष्ट करता है कि
तुम नहीं जाने वाली वापस

आपको समझना होगा कि
कोई भी अपने बच्चों को नाव पर नहीं भेजता
जब तक कि
समंदर धरती से ज़्यादा महफ़ूज़ न लगने लगे,
कोई भी अपनी हथेलियाँ नहीं जलाता
ट्रेनों तले
सवारी गाड़ियों की तह
कोई भी अपने दिन और रातें किसी ट्रक की कोख में नहीं बिताता
अख़बारों पर भोज-आश्रित,
जब तक कि वे तय की गई दूरियाँ
महज़ सफ़र से कहीं ज़्यादा अर्थ नहीं रखतीं…
कोई भी कँटीली बाड़ों के नीचे से नहीं रेंगता,
कोई भी नहीं चाहता पीटा जाना,
बेचा जाना,
किसी रोगी पशु की तरह गोली से उड़ा दिया जाना सरहद पर,
नहीं चाहता दया का पात्र होना…

कोई नहीं चुनता शरणार्थी शिविर
या निर्वस्त्र कर की जाने वाली जाँचें
जहाँ छोड़ दी जाती है तुम्हारी देह पीड़ा में
या जेल;
क्योंकि जलते हुए शहर से ज़्यादा महफ़ूज़ है जेल,
और एक जेलर
रात में,
बेहतर है ट्रक भर आदमियों से
जो तुम्हारे बाप की तरह दिखाई देते हैं;
कोई यह सब नहीं झेल सकता
कोई नहीं सह सकता ये सब
किसी की चमड़ी न होगी इतनी सख़्त…

‘अश्वेतों वापस जाओ’
‘शरणार्थी’
‘गंदे अप्रवासी’
‘शरण के भिखारी’
‘चूस कर बंजर करते हमारे देश को’
‘नीग्रो हाथ फैलाए हुए’
‘अजीब-सी गंध आती उनसे’
‘जंगली’
‘अपने देश को कर चुके बर्बाद और अब वे हमारा देश बर्बाद करना चाहते हैं’

किस प्रकार ऐसे शब्द
वे अश्लील निगाहें
धड़ल्ले से निकलती जाती हैं तुम्हारे पीछे
क्योंकि उनका आघात मद्धम है शायद
विदीर्ण कर दिए गए हाथ-पैरों से

या वे शब्द मृदुल हैं
तुम्हारी टाँगों के बीच चौदह आदमियों के होने से
या उन अपमानों को पचा लेना आसान है
कंकड़ पत्थर के मलबे से
हड्डी से
या टुकड़ों में
अपने बच्चे की देह से
मैं घर जाना चाहती हूँ
लेकिन घर किसी शार्क का जबड़ा है
घर कि एक बंदूक़ की नली है

और कोई नहीं छोड़ेगा घर
जब तक घरों ने उसे ख़ुद न खदेड़ दिया हो
समुद्र-तटों की ओर
जब तक कि घरों ने ख़ुद न कहा हो
तेज़ी से बढ़ाने को कदम
कि पीछे छोड़ दो अपने वस्त्र
कि मरुस्थलों में रेंगों
कि सागरों में संघर्ष करो
डूब जाओ
बचो-बचाओ
भूखे रहो
भीख माँगो
स्वाभिमान भूल जाओ
तुम्हारा ‘ज़िंदा रहना’ ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है

छोड़कर कोई नहीं जाता घर
जब तक कि
घर नहीं हो जाता कोई लथपथ स्वर,
कहता हुआ―
चले जाओ,
भाग जाओ अब मुझसे दूर
नहीं पता कि मैं क्या हो गया हूँ
पर मैं जानता हूँ कि कोई भी जगह
यहाँ से ज़्यादा महफ़ूज़ है…


तरुण त्रिपाठी (जन्म : 2000) जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में परास्नातक (लिंग्विस्टिक्स) के छात्र हैं। उनसे taruntrip@gmail.com पर बात की जा सकती है। कवयित्री की आवाज़ में मूल कविता यहाँ सुनी जा सकती है : 

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