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अमिताभ घोष
से
जे सुशील

अमिताभ घोष (जन्म : 1956) वर्तमान समय के उन लेखकों में से हैं जो हमारी इतिहास और पर्यावरण की समझ पर गहरी चोट करते हैं—अपने कथाकथ्य और कथेतर के ज़रिए। उनके उपन्यासों में जहाँ जलवायु-परिवर्तन से पैदा होने वाले संकट को दर्ज किया गया है, वहीं उनकी पुस्तक ‘द ग्रेट डिरेंजमेंट’ में जलवायु-परिवर्तन और उपन्यास एवं लेखन-विधा पर बात कही गई है। अमिताभ घोष के अनुसार पश्चिमी उपन्यास जो मूल रूप से नायक-प्रधान है, उस पर भी सोचने-विचारने की ज़रूरत है। इसके साथ ही जलवायु-परिवर्तन के अपने निजी अनुभवों को लेखन में न शामिल कर पाने की कमज़ोरियों को रेखांकित करते हुए वह कहते हैं कि यह दौर ख़तरनाक है और इस पर सवाल उठने चाहिए। वह मानते हैं कि उपन्यासकारों ने ये सवाल उतनी गंभीरता से नहीं उठाए हैं। अमिताभ घोष से यह बातचीत उनकी तमाम व्यस्तताओं के मध्य ई-मेल के माध्यम से मुमकिन हुई है।

अमिताभ घोष │ तस्वीर सौजन्य : amitavghosh.com

‘अगर तथ्यों ने लोगों का दिमाग़ नहीं बदला है तो’

एंथ्रोपोसीन या जलवायु-परिवर्तन हमारे साहित्य में क्यों नहीं दिखता है, जबकि इस समय पृथ्वी के सामने यह सबसे बड़ा मुद्दा है?

यह समझना बहुत ही मुश्किल है कि हम अपने चारों तरफ़ हो रहे बदलावों की भयावहता और जिस तेजी से यह सब घटित हो रहा है, उसे क्यों नहीं देख-समझ पा रहे हैं। भारत के मामले में तो यह और भी सटीक बैठता है, क्योंकि हम एक ऐसा क्षेत्र हैं जो जलवायु-परिवर्तन से बुरी तरह प्रभावित है। पर हमें फ़र्क़ नहीं पड़ रहा है तो उसका कारण हमारी असमानता भी है, जो यह भ्रम पैदा करती है कि अगर आपके पास पैसा है साधन हैं तो आप जलवायु-परिवर्तन के भयावह प्रभाव से किसी तरह सुरक्षित बच पाएँगे। लेकिन यह ख़ुद को पूरी तरह अँधेरे में रखने जैसी बात है। तथ्य यह है कि जलवायु-परिवर्तन से न तो मिडिल क्लास बचेगा और न ही धनी लोग। इस प्रसंग में हालिया दो उदाहरण लीजिए—मौसम में हुए भीषण बदलावों के, इन्हें हम जलवायु-परिवर्तन से जोड़ सकते हैं : मुंबई में जो बारिश हुई थी 2005 में और चेन्नई में 2015 की बारिश। हम यह कह सकते हैं कि इन शहरों में रहने वाले सभी लोग नहीं तो ज़्यादातर लोग ग्रामीण लोगों से बेहतर स्थिति में रहते हैं, लेकिन क्या उस बेहतर स्थिति ने उन्हें बाढ़ से बचा लिया। इसका उल्टा हुआ। ज़्यादातर धनी और रसूख़ वाले लोग बुरी तरह इस बाढ़ से प्रभावित हुए—दोनों ही शहरों में। …और भविष्य में भी जब समुद्र का स्तर बढ़ेगा तो यही लोग सबसे अधिक प्रभावित होंगे, क्योंकि उन्होंने उन इलाक़ों में रहना चुना है; जिनके डूबने के आसार सबसे अधिक हैं। इस बारे में कोई शक नहीं किया जा सकता है कि बड़ी संख्या में मध्यवर्ग के जन भी समुद्र के बढ़ते स्तर के कारण विस्थापित हो जाएँगे। ये लोग शिक्षित हैं जो कि तरह-तरह की खबरें मीडिया में देख पाते हैं। वे इस बात पर गर्व करते हैं कि वे दुनिया से जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद वे अपने घर के दरवाज़े पर आ चुके ख़तरे पर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं। मेरी किताब ‘द ग्रेट डिरेंजमेंट’ का विषय यही है कि लोग कैसे आँखें मूँदे हुए हैं।

मुंबई और चेन्नई में कई लेखक, अभिनेता, निर्देशक, कवि रहते हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि दोनों ही जगहों पर बड़ा फिल्म-उद्योग है, जो इस बाढ़ से प्रभावित भी हुआ है। इसके बाद भी जहाँ तक मैं जानता हूँ कि न तो कोई उपन्यास, न कोई फ़िल्म, न ही कहानी और न ही कविता लिखी गई—इस बाढ़ के बारे में—एक भी नहीं।

आपकी पुस्तक ‘हंग्री टाइड’ में भी जलवायु-परिवर्तन एक मसला था। आपने ‘गन आइलैंड’ में भी इस पर बात की है। इस समय हम सभी एक महामारी से जूझ रहे हैं। आप क्या इस महामारी को भी एंथ्रोपोसीन से जोड़कर देखते हैं।

सामान्य रूप से लेखक जलवायु-परिवर्तन के बारे में बात करते हुए भविष्य की बात करते हैं, लेकिन मैं इन मुद्दों के बारे में लिखते हुए इसे अतीत से जोड़कर सोचता हूँ। जलवायु-परिवर्तन ऐसी चीज़ नहीं है, जो पिछले तीस साल में हुई है। इसका एक बहुत लंबा इतिहास है जो कि हमारे अतीत में कहीं गहरे संबद्ध है। मैं इसे इस संदर्भ में सोचता हूँ। ‘गन आइलैंड’ इसी संदर्भ में लिखी गई।

जहाँ तक महामारी की बात है तो मैं नहीं समझता कि जैसे जलवायु-परिवर्तन के बारे में कम लिखा गया, वैसे ही महामारी के बारे में कम लिखा जाएगा। न्यूयॉर्क में 2012 में सैंडी तूफ़ान आया, जिस पर मेरी जानकारी में कोई उपन्यास या कहानी नहीं लिखी गई है। इसके बाद 2017 में ह्यूसटन में हार्वी तूफ़ान आया। मुझे लगता है कि महामारी के बारे में बहुत सारे उपन्यास लिखे जाएँगे, जैसा कि 9/11 के बाद हुआ था। ऐतिहासिक रूप से महामारियों के दौरान लेखन ख़ूब होता रहा है। बोकाचियो की क्लासिक कृति ‘डिकैमरून’ महामारी के दौरान ही लिखी गई थी।

आप साहित्य और एंथ्रोपोसीन या जलवायु-परिवर्तन को कैसे जोड़कर देखते हैं?

मैं यह संभावना देखता हूँ कि साहित्य लोगों की मदद कर सकता है। मुझे नहीं लगता कि कोई उपन्यासकार यह सोचकर उपन्यास लिखना शुरू करता है कि साहित्य किसी संकट को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकता है। यह तो फिर प्रोपेगेंडा हो जाएगा और वह उद्देश्य पूरा नहीं होगा। कोई भी यह सोचकर लिखना शुरू कर रहा है कि वह लोगों का मानस बदल देगा, वह भ्रम में है। अगर तथ्यों ने लोगों का दिमाग़ नहीं बदला है तो उपन्यास यह काम कैसे करेगा! हाँ, लेकिन मैं यह भी मानता हूं कि उपन्यास को अपने समय के यथार्थ को चित्रित करना चाहिए। इसलिए मुझे लगता है कि हम सामूहिक रूप से जिस संकट से गुज़र रहे हैं, उस पर हमें लिखना चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जलवायु-परिवर्तन को एक वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक समस्या के रूप में पहचाना गया है और इस पर बात करने वाले यूनिवर्सिटी और थिंक टैंक के लोग हैं, जबकि आप दुनिया में कहीं भी किसानों और मछुआरों से बात कीजिए; उन्होंने भी जलवायु-परिवर्तन को नोटिस किया है। लेकिन हम उनकी बात नहीं सुनते हैं। हम वैज्ञानिकों की सुनते हैं, क्योंकि वे सत्ता का हिस्सा हैं।

आपकी किताब ‘द ग्रेट डिरेंजमेंट’ में आपने कहा है कि एकल हीरो की जो अवधारणा है, वह एंथ्रोपोसीन को व्यक्त करने में समर्थ नहीं है। क्या आप इस बात से संस्कृति के संकट की तरफ़ इशारा कर रहे हैं। यह संकट लेखन की संस्कृति का भी हो सकता है, जलवायु से जुड़ी संस्कृति का भी और ओवरऑल भी।

मैं इसमें ‘पलायन के संकट’ को भी जोड़ना चाहूँगा। जो आप कह रहे हैं, वह सब एक दूसरे से जुड़ा हुआ है; हालाँकि उनके बीच सीधा-सीधा कारण और परिणाम का संबंध नहीं है। ये सभी उस तेज़ी का नतीजा हैं, जो पिछले तीस सालों में आई है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ग्रीनहाउस गैसों का आधे से अधिक हिस्सा 1990 के बाद के उत्सर्जन से आया है। (जब सोवियत रूस का विघटन होता है और लगभग सभी देश ‘वाशिंगटन कंसेन्सस’ पर तैयार होते हैं।) ये समय उस ग्रेट एक्सलरेशन या कहें कि भयावह तेज़ी का है और मैं इसे भयावह ही कहूँगा, क्योंकि ये सारे संकट उसी का नतीजा हैं—जलवायु का छिन्न-भिन्न हो जाना, पलायन का संकट और कोरोना वायरस से जुड़ा संकट भी।

एंथ्रोपोसीन और जलवायु की चर्चा में हमेशा पूँजीवाद को केंद्र में रखा जाता है। आपने अपनी किताब में साम्राज्य और साम्राज्यवाद की बात की है। क्या वर्तमान संकट (कोविड) इनकी देन है?

मेरे हिसाब से साम्राज्य और वैश्विक ताक़त का हिसाब-किताब तो है ही और यह जैविक ईंधनों और हमारे भविष्य से जुड़ा ही हुआ है। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि जैविक ईंधनों को निकालना और उन्हें दूसरे देशों तक ले जाना वैश्विक सत्ता के गठजोड़ के केंद्र में है। यह अब पूरी तरह स्थापित हो चुका है कि जैविक ईंधन से रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ़ हम जा सकते हैं और यह सबके फ़ायदे में है। लेकिन अगर ऐसा हुआ तो अमेरिका को नुक़सान है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था और सामरिक बढ़त का नुक़सान है, जो जैविक ईंधन पर उसके नियंत्रण (तेल के सर्कुलेशन पर उनका पूर्ण नियंत्रण) के कारण उसे मिली हुई है।

वर्तमान संकट में भी आपने देखा कि धनी और ताक़तवर देशों के लिए परीक्षण-संबंधी उपकरण और अस्पताल हैं, जबकि ग़रीब देशों को यह सब मुहैया नहीं है। साथ ही अमेरिका में धनी और सेलिब्रिटी लोग आसानी से टेस्ट करा पाते हैं, जबकि सामान्य लोग नहीं। आपको यह भी पता होगा कि अमेरिका में अफ़्रीकी-अमेरिकी मूल के लोग इस बीमारी से गोरे लोगों की तुलना में अधिक प्रभावित हुए हैं।


यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के एंथ्रोपोसीन अंक में पूर्व-प्रकाशित। जे सुशील से परिचय के लिए यहाँ देखें : पुराने और नए निशानों के आस-पास

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