मोज़िद महमूद की कविताएँ ::
अँग्रेज़ी से अनुवाद : रंजना मिश्र

मोज़िद महमूद

पिता

मेरे पिता कड़े स्वभाव के इंसान थे
जब भी वह अपने कुर्ते का बटन खोलते
मैं अत्यंत विस्मय से उनका शरीर देखा करता
सदियों पुरानी दाढ़ी अपने चेहरे पर उगाए
वह अपना समय किसी अदृश्य के बारे सोचने में बिताते
‘भय’ और ‘असंभव’ ये दोनों शब्द वह नहीं जानते थे
मुग़लिया अतीत में पैर जमाए अँग्रेज़ी पलटन में उन्होंने अपना नाम दर्ज करवाया
उनकी तरह आज़ाद बांग्लादेश का स्वप्न भला और कौन देख पाया होगा

पिता कड़े स्वभाव के इंसान थे

माँ कहती है : वह अत्यंत विनम्र थे
उनकी पीठ पर एक ज़हरीले नाग का फन था
माँ के लिए वह विनम्र थे

भाई जब दुश्मनों के ख़िलाफ़ मोर्चे पर गया
पिता ने गर्मियों के अनियंत्रित तूफ़ान की तरह भाई के गाल चूमे
और हमारे घर ने रोज़मर्रा के मतिभ्रम के आगे घुटने टेक दिए
बहुत सारे तूफ़ान उठ खड़े हुए
उन्होंने हमारा घर तहस-नहस कर डाला
और हम बर्बादी के भीतर दफ़्न हो गए
नाविक ने तब गहन आत्मविश्वास से मुस्कुराते चप्पू चलाते हुए कहा :
‘बेटे डरना क्यों?
जीवन मृत्यु के बग़ैर अंधकारमय है
मृत्यु से ही कोई जीवन का प्याला पीता है’

आज भी जब मैं किसी तूफ़ान से हारने लगता हूँ
समय की धारा में बिना प्रतिरोध बहने लगता हूँ
कहता हुआ कि प्रतिरोध की क्षमता है कहाँ
अचानक मुझे समय से पकी सफ़ेद दाढ़ी वाला वह इंसान याद आता है
मैं शंकित होता हूँ : क्या मैं उनका पुत्र हूँ
या किसी कायर की नाजायज़ संतान
मैं क्यों प्रतिरोध में खड़ा नहीं होता
अपने जायज़ हक़ की माँग मैं क्यों नहीं करता?

युद्ध

महफ़ूज़ा, हमारी आत्माएँ युद्धों से घिरी हुई हैं। शायद चालीस वर्षों या दो हज़ार वर्षों पुराना युद्ध, अनगिन जीवनों की आहुति लेने वाला—वह हत्यारा युद्ध। कितने कम लोगों ने कितने ज़्यादा लोगों की हत्या की—युद्ध-कथाएँ और कुछ नहीं, लोगों को मूर्ख बनाने का ज़रिया है।

युद्धों से कौन इनकार कर पाया है, महफ़ूज़ा? एक नए युद्ध की शुरुआत से बचने के लिए हमें पुराने युद्ध हार जाने होंगे। जानती हो न, कुछ लोग अब भी युद्धरत हैं।

हम, जो युद्ध के मैदानों से भाग आए, कहो : क्या हमने लड़ाइयाँ नहीं लड़ीं? जीवित बचे रहने के लिए भाग आना अगर एक दूसरी लड़ाई नहीं तो कोई भी भ्रष्ट अपना सिर ख़ुशी से बलिवेदी पर रख देता। कहो : हम अब भी जीवित हैं, युद्ध के सिवाय और क्या था जो हमें जीवित रख सकता था? युद्ध के उन्मुक्त मैदानों में हमारे पिताओं ने दो जीवनों की हत्या की और अंत में ख़ुद भी मारे गए—उनके विषय में रक्त सनी कथाएँ अब और नहीं, महफ़ूज़ा—उनकी बेवाएँ अब दूसरे मर्दों की अंकशायिनी हैं।

और हम—उनकी संतानें, पितृहीन—अब भी युद्धरत हैं, जीवित रहने के लिए, नितांत अकेले। कहो : क्या कोई उत्तराधिकारी सम्राट अब भी अपने पिता के बलिदान की कीमत समझता है?

बेटे

पिता के वीर्य से जन्म मत लो मेरे बेटे
माँ के गर्भ में ही ठीक हो तुम
मुक्कों से प्रहार करते, खेलते—गर्भ के जल में
तुम बिल्कुल ठीक हो
इस रौशनी में आना कोई ख़ुशी न होगी
मेरे परित्यक्त आक्रोश से जन्मोगे तुम
तुम क्रोध के उन्माद की संतान
माँ का रक्त पीते बड़े होओगे
यह सिर्फ़ समय का खेल होगा
एक भूलभुलैया जिसमें उलझते जाओगे तुम
इस दुनिया की स्त्रियाँ तुम्हें पीड़ा देंगी
हवस तुम्हें पागल कर देगी
तुम गर्व, अहंकार और लालच से फूट पड़ोगे
सत्य के लिए संघर्ष करो, वे बताएँगे
पर तुम क्यों परवाह करोगे
कोई नहीं जानता सत्य क्या है
सत्य—एक दोग़ला सिद्धांत
सत्य—एक छलावा
ये सारे धोखे, माया और प्रपंच
तुम्हें खड़ा भी होने देंगे
एक अमिट क्रोध और अधूरेपन के साथ
तुम्हें लौट ही जाना होगा!

तुम्हारे लिए, एक समाचार

एक विचलित करने वाली ख़बर तुम्हारा इंतज़ार करती है, महफ़ूज़ा
पिछले दिनों हमारे गाँव से एक विचित्र किसान आया था
जिसके हल-बैल इस बार की बाढ़ में बेकार हो गए
पूरे दिन भूखा रहने के बावजूद उसने मेरा आतिथ्य स्वीकार नहीं किया
दरवाज़े पर चटाई बिछाकर तुम्हारी प्रतीक्षा करता रहा, सिर्फ़ तुम्हारी

अपनी किसी प्रार्थना के साथ आया था वह
जो वह तुम्हें और सिर्फ़ तुम्हें बताना चाहता है
तुम तो मेरा दरवाज़ा रोज़ खटखटाती हो
फिर भी तुम्हें नहीं पहचानता मैं
तुम्हारी अपार्थिव आभा ने पचपन हज़ार मील की दूरी तय कर ली है
अगर तुम नहीं जाओगी, फिर से बेरुबारी के उस ग़रीब किसान की खेती तबाह हो जाएगी

मैं सिर्फ़ तुम्हारे हरे वक्ष देखता हूँ—खेतों की लपट
देखता हूँ कल्पनातीत मेहनत से बन उठे नक़्क़ाशीदार वस्त्र पहने ताज के कंगूरे
तुम्हारी केशराशि के वनों में मुझे कोई आकाशीय सुगंध नहीं मिलती
इस अयोग्य कवि को माफ़ करो, महफ़ूज़ा
जो सिर्फ़ तुम्हारी मांसलता में ही आनंद ढूँढ़ता है
तब भी तुम्हारा स्नेह मुझे इस तरह आच्छादित करता है
इस अपराध में भी तुमने मेरा साथ नहीं छोड़ा है।

घर

मेरी मूर्खता मेरा घर है
घर मुझे कहीं नहीं ले जाता, सिर्फ़ वापस लौटा लाता है
नींद से जागते ही मैं कहीं दूर चले जाने की कामना करता हूँ
बेचैनी से पूरा दिन चलते रात जहाँ मैं ख़ुद को पाता हूँ, वह घर है

दरअसल, घर एक रूपक है—एक बिम्ब—इंसान ख़ुद को खो बैठा था जहाँ
वे परिचित चेहरे, घरेलू बर्तन, असबाब
गंधों और दृश्यों की एक दुनिया
पिता को पुकारती थी जहाँ बेटी की आवाज़
पार्श्व में सोई थी एक स्त्री
जिनकी स्मृतियों की गंध
अंधे कुत्ते की तरह मुझे पुकारती है

घर एक केंद्र है
छोटा-सा उपग्रह इंसानों का
एक ही आवर्तन पर घूमता हुआ।

दान

आज जुमे-रात के दिन, भिखारी सड़कों पर हैं
दुकानदारों ने क़तार-दर-कतार रेज़गारी सजा रखी है इम्दाद1मदद की पेटी में
परम विरक्ति और ममता के साथ क़तार में सजे सिक्कों से एकाध
वे हर किसी को देते हैं

बैतूलमुकर्रम बाज़ार की छाया हमारे दफ़्तर पर गिर रही है
अशोक पेड़ों की तिरछी छायाओं के नीचे अकेला चलता
मैं सड़क पर आता हूँ
कल जुमा के लिए मेरी भी कुछ इच्छाएँ हैं
जुमा के बाद नमाज़ी सड़कों पर होंगे
जॉर्ज बुश की उपेक्षा और ख़ालिदा हसीना की हँसी उड़ाते
वे वापस अपनी प्रार्थनाओं में लौट जाएँगे

मैं कहाँ जाऊँगा? जिसकी आत्मा बहुत पहले मर चुकी
किसी ने उसका फ़ातेहा नहीं पढ़ा, ताबूत नहीं बख़्शी
किसे मैं उसे दफ़नाने को कहूँ?
आज गुरुवार है, मैं भी कुछ सिक्के इम्दाद में दूँगा

मृत हृदय की याद में
और भूली हुई स्मृतियों की।

मुक्ति-योद्धा

मैं एक मुक्ति-योद्धा को जानता हूँ
जिसने अपना एक पैर आज़ादी की लड़ाई में खो दिया
अब वह एक पैर से लंगड़ाता है
पहले मुझे उसे देखकर दुःख होता था
हमारी स्वतंत्रता की क़ीमत उसका एक पैर है
अब वह एक अपाहिज मुक्ति-योद्धा है
आजकल मुझे वह कुछ अलग-सा नज़र आता है
सोचता हूँ, चलने के लिए तो
इंसान को एक ही पैर पर खड़े होना होता है
और क़दम-दर-क़दम बढ़ाते चलते जाना होता है
दूसरा पैर अक्सर काफ़ी ऊँचाई पर होता है
दो पैरों पर खड़े इंसान आगे नहीं बढ़ सकते
दो पैरों पर खड़ा इंसान कहीं जा भी नहीं सकता
मुक्ति-योद्धा को तो बहुत आगे जाने की ज़रूरत है

अर्जुन का पेड़

अर्जुन के पेड़ को बाँहों में भरने से रक्तचाप कम होता है
हृदय की बीमारियों में इसकी छाल की औषधीय उपयोगिता है
मैं सचमुच ऐसे शानदार पेड़ से विवाह करना चाहता हूँ
अगर हृदय गति तेज़ होगी
रक्तचाप बढ़ेगा
वह मुझे अपनी बाँहों में भर लेगी
अपने छाल वस्त्र अनावृत करते हुए
अपना रस मुझे पीने को देगी, कहेगी :

‘अपना हृदय जीवित रखो
मैं एक ज़िंदा पेड़ हूँ, वैसे कोई दुःख
कोई शिकायत नहीं,
हालाँकि मैं पूरे दिन सूर्य के ताप में भोजन पकाती हूँ
और जब रात उतरती है
मैं खड़ी रहती हूँ,
नितांत एकाकी’

विपरीत आकांक्षाएँ

मैं किनारे पर खड़ा हूँ और तुम बीच में
जैसे ही तुम मेरी ओर आती हो
मेरा रास्ता अदृश्य होता जाता है
यह ऐसी यात्रा है जो कभी साथ तय नहीं की जाती

तुम्हें आना था और तुम आ रही हो
दूर से मैं तुम्हारा मस्तूल देखता हूँ
क़रीब आती तुम्हारी नौका का विदीर्ण पाल
हवा में नाचता है
पर इस बार मैं नदी के मुहाने पर हूँ
नदी और समुद्र के समागम को देखता हुआ
और धारा भी मुझे अपने साथ बहा ले जाना चाहती है
फिर भी तुम्हारी यात्रा लंबी, उत्ताल, अक्षुण्ण
शायद तुम मुझसे मिलन को लेकर निश्चिंत हो
मेरी और बढ़ रही हो
शायद मैं तुम्हारा अंतिम पड़ाव हूँ
धारा बदलने की सोचती हो तुम
दोस्तों के साथ थोड़ा समय बिताकर
तुम मेरे समुद्र में आसरा ढूँढ़ोगी
पर, जानती हो सूर्योदय और सूर्यास्त सभी तटों पर
साथ नहीं घटते
तुम सूर्यास्त की सुंदरता देखने को व्याकुल
मैं सूर्योदय की महिमा का प्रतीक्षारत
नहीं जानता,
हमारी इच्छाओं का समागम कैसे होगा?

कौए

एशिया के बाशिंदे कौओं को बदसूरत और चाँद को सुंदर कहते हैं
शायद वे ख़ुद काले हैं और चाँद उनका उपनिवेश
ऐसा पराश्रित, जिसकी अपनी कोई रौशनी नहीं
घावों से भरा शरीर है जिसका, क्षत-विक्षत
फिर भी जीवित कथाओं में

कौए इसके विपरीत मेहनती और सुसंगत
वे गंदगी, कूड़ा और मलबा
देखते ही निगल लेते हैं
क्योंकि वे धरती को साफ़-सुथरा रखना चाहते हैं।

मोज़िद महमूद (जन्म : 1966) बांग्लादेश के सुपरिचित कवि-लेखक हैं। उनकी तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी यहाँ प्रस्तुत कविताएँ अँग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद करने के लिए उनके ‘फ़ेबल ऑफ़ द एप्पल’ (2002) शीर्षक कविता-संग्रह से चुनी गई हैं। रंजना मिश्र सुपरिचित हिंदी लेखिका और अनुवादक हैं। उनसे और परिचय के लिए देखें : अपनी स्मृतियों के लिए मैं बुरी श्रोता हूँ

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