नुरुल हक़ की कविताएँ ::
बांग्ला से अनुवाद और प्रस्तुति : अजीत दाश

नूरुल हक (जन्म : 1944) बांग्लादेश के महत्त्वपूर्ण कवि हैं। वह बांग्ला कविता में अपने अलग स्वर और विचार के लिए जाने जाते हैं। उनकी पहली किताब 63 साल की उम्र में ‘सारा ज़ख़्म फैल चुका है रक्त-कणिकाओं में’ शीर्षक से 2006 में प्रकाशित हुई। इसके बाद उनकी पाँच और किताबें भी प्रकाशित हुईं। 22 जुलाई 2021 को कोरोना से हुई उनकी मृत्यु की वजह से उनकी कविताएँ पाठकों के बीच पुनः चर्चा में आ गईं। नुरुल हक़ ने प्रसिद्धि की परवाह किए बिना पर्दे के पीछे रहकर जीवन भर कविताएँ लिखीं।

नुरुल हक़

शुभ प्रभात

एक सूरज तुमसे मिलने आएगा
थोड़ी देर बाद,
सुबह की मीठी आवाज़ों में डूबकर
छोटी-सी झोपड़ी के पास

कहेगा—
शुभ प्रभात

डरो मत
तैयार रहना।

तलवार

दुनिया हँस रही है
फूलों में
हँस रहे हैं ईश्वर
ये फूल हैं—वह तलवार
जिसकी एक झलक
तबाह कर देती संसार।

अनजाने में

इस दुपहर की बात
मैं थोड़ी देर बाद
भूल जाऊँगा
लोगों का उदास चेहरा
देखते हुए
मैं खो जाऊँगा रास्ते में

एक घुघुती का गीत
पता नहीं कब
मैं तुम्हारे पास भेजूँगा—

अनजाने में।

दुपहर के आस-पास

मौत सिलवाकर
अब मैं
जाऊँगा किसके भीतर?

मैं अमरता नहीं चाहता हूँ

मैं चाहता हूँ—
तम्हारे दिल की
ख़ूबसूरती।

चिड़ियों की पुकार

कुछ चिड़ियों की पुकार
धुँधले पानी की तरह
रास्ते धूसर कर देती है।

बांग्लादेश

एक दिन एक चिड़िया आई और बोली—
‘‘बांग्लादेश, अगर तुम किसी नदी का नाम हो
तब मैं तुम्हारा पानी नहीं पीऊँगी
क्योंकि गरल और अमृत
तुम्हारी धारा में एक होकर
इस नदी में बह रहे हैं।’’

निवासी

मैं एक बदनसीब शहर का निवासी
शहर जो एक अभिशप्त आत्मा के साथ
घूम रहा है पथभ्रांत झरने की तरह

आदमी बिखरे हुए कंकड़ हैं
एक पत्थर से
दूसरे पत्थर पर
सर फोड़ते हैं

आदमी पानी के नीचे भी
तबाह आदमी है।


अजीत दाश (जन्म : 1989) बांग्लादेश की नई पीढ़ी से संबद्ध कवि-अनुवादक हैं। उनके अनुवाद में दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनसे ajitmitradas@gmail.com पर बात की जा सकती है।

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