आसावरी काकडे की कविताएँ ::
मराठी से अनुवाद : सुनीता डागा

आसावरी काकडे

दुःख होता है सयाना

जब दहकता रहता है बाहर-भीतर
दुःख तूफ़ान का रूप धारे
हवा बनकर आता है

थरथराने लगती है
भीतर की ज्योति
उस अंधड़ में जब
तब दुःख लालटेन की
काँच बनकर आता है

कितना भी सतर्क रहिए
जब तय होता है धराशायी होना
तब दुःख बिछौना बन जाता है

मन झुँझलाने लगता है
चिड़चिड़ाने लगता है
तब दुःख एक बड़ी लकीर की तरह दिखता है

कभी भोगे हुए सुखों की
क़ीमत वसूलने आता है
कभी आने वाले सुखों की ख़ातिर
पगड़ी माँगने आता है

उकताए बैठे खिलाड़ी को
कभी ‘खो’ देने आता है
कभी केवल एक बदलाव लिए
मिलने चला आता है

दुःख होता है सयाना
केवल क्लेश नहीं पहुँचाता है
हर समय जाते-जाते
कुछ सयानापन भी दे जाता है!

उसने जन्म लिया

उसने जन्म लिया और
भाषा में पैर जमाए
खड़ा रहा दृढ़ता से!

‘अर्थहीन’
यह एकमात्र शब्द ही
बेहद अर्थ से भरा महसूस हुआ उसे
फिर आत्महत्या की प्रक्रिया का
अविभाजित हिस्सा बनकर जीता रहा
वह मूर्खतापूर्ण यातनाएँ
लबालब उबाऊपन
प्रगाढ़ अज्ञान
विक्षिप्त प्रतिक्रिया
आक्षितिज निष्क्रियता
और बारिश की निश्चेष्ट प्रतीक्षा
इनके अभूतपूर्व घेरे में
हिचकोलें लेता रहा…

तितिक्षा की परीक्षा में पराजित
वह
एक नखशिखांत थकान…!

इतना सब घटित हुआ

नहीं जानती वह
किसकी चोंच से गिरा था बीज
उड़ते-उड़ते

नहीं पूछा उसने नाम और पता
समेट लिया सहजता से कोख में
यहाँ-वहाँ से पानी आया
धूप… हवा… और सबका गवाह आसमान भी
लहलहाई बेल
इमारत की आड़ में
उगते रहे पौधे-झंखाड़ भी
इर्द-गिर्द
उससे लिपटकर

वह नहीं जानता
कौन-सी है यह शाख
फूल-पत्तों के नाम से भी अज्ञात
खुले में ही पनपी
उन झाड़ियों में
खोजी उसने ओट
पत्तों के भीतर गहरे भीतर जाकर
इत्मीनान से घिसता रहा वह
नन्हे परों को नन्ही-सी चोंच से
वहीं पर कुछ देर फुदक कर देखा
और चहचहाते हुए उड़ गया…

एक पंछी को
पल भर की ओट चाहिए
इसलिए घटित हुआ
इतना सब कुछ?

वहीं पर नहीं केवल

वहीं पर नहीं केवल
यहाँ भीतर भी चलता रहता है
पूनम-अमावस का
एक निरंतर आवर्तन
वहाँ पर तय गति से
निर्धारित समय पर
खिलती है चंद्रकलाएँ
मिटती जाती हैं…
अबाधित होता है हर हाल में
पूनम-अमावस का क्रम

पर यहाँ पर
कभी भी खिलकर हँसता है पूरनचंद्र
भीतर ही भीतर उफनता है समुद्र
और बुझ जाता है यकायक
फिर पीछे की ओर लौटती हैं
शांत होती लहरें

यहाँ के चाँद की
नहीं होती हैं कलाएँ
न ही निर्धारित दिशाएँ
उगने की
ढलने की
प्रतिपदा… द्वितीया…
यह वहाँ का क्रम भी
नहीं समझ में आता है
बहते भावों की पेशियों को
होती रहती है भीतर भी पूर्णिमा
नहीं संभव होता जिन्हें गिनती में रखना

वहाँ की पूनम के हिसाब से ही
लोग मनाते हैं ठाठ से
सहस्रचंद्रदर्शनउत्सव
भीतर की अमावसों का अपना-अपना अँधेरा
ख़ामोशी से सहा होता है हर किसी ने
ज्ञात होता है यह सिर्फ़
पीछे लौट चुकी लहरों को ही!

राह भूले हुए मुसाफ़िर से

राह भूले मुसाफ़िर से
मत पूछिए
उसका गाँव
दिखाएँ उसे दिशा
नए सपनों की ओर ले जाती…

मत उकेरिए
शब्दों से उनके अर्थ
अपने रोपें
नाभि से उगने वाले

मत ढूँढ़िए वजहें
अस्फुट मुस्कुराहटों की
पैदा करें बहाने ताकि
उमड़े खिलखिलाती हँसी

मत मिटाइए तृषित की तृष्णा
तुरंत पानी देकर
कुछ शेष रहने दें कंठ में
उसका अपना कुआँ मिलने तक

मत लादिए
जीवन की इच्छाओं के बोझ
गुज़रती उम्र पर
कहें निर्मम होकर
शुभास्ते पन्थानः सन्तु…!


आसावरी काकडे (जन्म : 1950) मराठी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और गद्यकार हैं। उनके ‘आरसा’, ‘मी एक दर्शनबिंदु… उत्तरार्ध’ और ‘व्यक्त-अव्यक्ताच्या मध्यसीमेवर’ शीर्षक कविता-संग्रह प्रकाशित हैं। सुनीता डागा मराठी-हिंदी लेखिका-अनुवादक हैं। उन्होंने समकालीन मराठी स्त्री कविता पर एकाग्र ‘सदानीरा’ के 22वें अंक के लिए मराठी की 18 प्रमुख कवयित्रियों की कविताओं को हिंदी में एक जिल्द में संकलित और अनूदित किया है। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के 22वें अंक में पूर्व-प्रकाशित।

प्रतिक्रिया दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *