केतकी कुशारी डायसन की कविताएँ ::
बांग्ला से अनुवाद : चित्रप्रिया गांगुली

केतकी कुशारी डायसन

नीरवता

यंत्र के तार निचोड़कर
शिल्पी निकालता है झंकार
हमें लगता है
हमारा ही दर्द गूँजता है वहाँ।

अवाक् हम सोचते हैं,
नहीं जानते हुए भी
वह हमें कैसे जान गया
हमारे छुपे हुए अनुभव को।

दर्द को रूप देती है ध्वनि,
वह दर्द गहन है,
लेकिन उससे भी गहन है
नीरव तार का दर्द

शिल्पी की उँगलियाँ
एक रोज़ बजाती थीं उसे
लेकिन अब नहीं बजातीं।

धूल जम जाती है,
केवल यही धूल
उसके दर्द की साक्षी है।

स्त्रीत्व

ऐ लड़की,
तुम्हारी हाँडी बहुत उथल रही,
आँच ज़रा कम करो ना।

ऐ लड़की,
तुम्हारे अनाज के कढ़ाई का ढक्कन क्यों नहीं है?
गुण-सुगंध-रस सब उड़ जाएँगे।

ऐ लड़की,
तुम्हारी मछली की पीठ तल गई,
अब पलटकर दूसरी ओर भी तल दो।

ऐ लड़की,
नामक डालना मत भूलना,
मसाले को जलाना नहीं।

ऐ लड़की,
तेल-झोल-आँचल-बच्चा
सँभालकर कड़ाही उतारना।

कब खाने बैठोगी?


केतकी कुशारी डायसन [1940-2026] बांग्ला की अत्यंत समादृत कवि-लेखक-अनुवादक हैं। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के समकालीन बांग्ला स्त्री कविता अंक में पूर्व-प्रकाशित। चित्रप्रिया गांगुली से परिचय के लिए यहाँ देखिए : अनंत जीवन अगर पाऊँ मैं

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