कविताएँ ::
अशोक कुमार

अशोक कुमार

जंतर-मंतर पर बुरी लड़कियाँ

वे बुरी लड़कियाँ थीं
उन्होंने हमारी ही भाषा के शब्दकोश से
हमारे ही शब्द चुनें
और अश्लील वाक्यों को कहते हुए
बहुत ख़ूबसूरत लगीं

उन्होंने हमारे शिष्टता के मलबे पर
अपनी उद्दंडता का इत्र छिड़का
और सारे वर्जित मुहावरों को
विद्रोह के नारों में बदल दिया

हमने अपनी कुंठा के व्याकरण में गढ़कर
उन्हें सबसे भद्दी उपमाएँ दीं
और उन्होंने हमारी मर्यादा की दरारों में
अपनी हँसी के बीज बो दिए

हमने उनके चरित्र परिभाषित किए
रिवाजों की दुहाई दी
उन्होंने हमारी जर्जर परंपराओं के आसमान में
सिगरेट का काला धुआँ फूँक दिया

उन्होंने हमारी नैतिकता के ठूँठ को
अपने नंगे पैरों से ठोकर मारी
और हमारी सभ्यता की दीवारों पर
सवालों के पोस्टर चिपका दिए।

तर्क की अंतिम आहुति

आओ!
कवियो आओ,
तुक भिड़ाओ और अपने कंठ से
सदी के सबसे बेसुरे गीत गाओ।

आओ!
सुविधाभोगियो आओ,
जीवन की ऊब के इस भारी बोझ को
अपनी आत्मा के ऊपर धर दो।

आओ!
दिशाओ आओ,
मुक्ति के तमाम मार्गों को
किसी अँधेरी गुफा की तरफ़ मोड़ दो।

आओ!
इतिहासकारो आओ,
और तमाम सफ़्हों के ऊपर
गल्पों की काली स्याही बिखेर दो।

आओ!
न्यायविदो आओ,
सहमति की अश्लील चुप्पियाँ ओढ़कर
असहमतियों को अपराध घोषित कर दो।

आओ!
भाषाविदो आओ,
अपनी शुद्धता की छलनी से
एक पूरी सभ्यता को मूक बना दो।

आओ!
पूँजीपतियो आओ,
प्रकृति के उजले माथे पर
विकास की नुकीली कील ठोंक दो।

आओ!
अंधभक्तो आओ,
मूर्खता के उत्सव में
तर्क की अंतिम आहुति दे दो।

इतना बचा रहे जीवन

इतना बचा रहे आँखों में पानी
कि कोई दुखी दिखे तो
ये भीगे भले नहीं
पर नम जरूर हो जाएँ।

इतनी कोमलता बची रहे कंठ में
कि क्रोध में भी बोलें
तो भी आवाज़ ऊँची भले रहे
किंतु भीतर चुभे नहीं।

इतना बचा रहे साहस
कि दिन को दिन
और रात को रात कह सकें।

इतनी बची रहे उम्मीद
कि रात को जब सोएँ
तो टेबल पर रखकर सोएँ
कामों की एक छोटी-सी फ़ेहरिस्त।

इतना बचा रहे बचपना
कि कोई प्यार करे
तो दौड़कर गले लग जाएँ
और कोई दिल दुखाए
तो रो लें फूट-फूटकर।

इतना बचा रहे प्रेम
कि यदि शत्रुता भी हो
तब भी किसी की मौत की दुआ न करें।

और इतना बचा रहे अहम्
कि कोई तिरस्कार करे
तो सिर उठाकर कह सकें—
भाड़ में जाओ!

विकल्पहीनता

हम विकल्पहीनता से ऊब गए हैं
और अवसाद से भी
दुःखी होने के लिए
हमें अब नए दुःख चाहिए।

अख़बार

एक पुराने जले हुए अख़बार की कतरन में
झुलस गई गई हैं कुछ खबरें।

झुलस गई हैं
दुःख की सारी अभिव्यक्तियाँ
एक सुसाइड नोट झुलस गया है।

संदेह की कड़ी धूप में
मुरझाने से बहुत पहले
झुलस गई है सच की आख़िरी तहरीर।

झुलस गई हैं
उदासियों के आसमान में
शुष्क बादलों की तमाम सूचनाएँ।

कितना मुश्किल है रोज़-रोज़
कालिख लगी उँगलियों से
झुलसे हुए अख़बार पलटना।

मैंने कुछ नहीं सँभाला

पुराने किसी तोहफ़े से
सजाई जा सकती थी
सीलन भरी कोई दीवार।

किसी पुरानी चिट्ठी के पंखों से
भरी जा सकती थी
स्मृतियों की एक उड़ान
या भेजी जा सकती थी
कोई जवाबी चिट्ठी
किसी पुराने पते पर।

पर मैंने कुछ भी नहीं सँभाला
न तोहफ़े
न चिट्ठियाँ
न पते।


अशोक कुमार की कविताओं के ‘सदानीरा’ पर प्रकाशित होने का यह दूसरा अवसर है। उनकी कविताओं की दो पुस्तकें मेरे पास तुम हो और रिक्तियों में पहाड़ प्रकाशित हो चुकी हैं। अशोक की कविताएँ पहाड़ से आए उन हिंदी कवियों की परंपरा का विस्तार हैं, जिनके बारे में मंगलेश डबराल द्वारा बार-बार उद्धृत—जर्मन कवि बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की—ये पंक्तियाँ बहुत याद आती हैं : ‘पहाड़ों की यातनाएँ हमारे पीछे हैं / मैदानों की हमारे आगे…’ कवि से और परिचय के लिए यहाँ देखिए : जहाँ एक जीवन के लिए जीवन भर जंगलों में भटकते चरवाहों की प्रेम-कहानियाँ लोकगीतों में ढलकर अमर हो जाती थीं

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