श्रीनिवास सिरास की कविताएँ ::
मराठी से अनुवाद : सुनीता डागा

श्रीनिवास सिरास

जद्दोजहद

जीने की ख़ातिर दरख़्तों की
छाँव की ख़ातिर इंसानों की
कबसे जारी जद्दोजहद
ख़त्म हो चुकी है—
अब केवल निराशा शेष है

एकाकी रात के बाद दिन भी उगता है
फूल भी खिलते हैं चाव से
पर जद्दोजहद ख़त्म हो चुकी है—
उन फूलों को अपना कहने की

कभी किसी समय सहजता से टूटे सितारे
उल्का बनकर स्वप्न बन चुके
घटनाएँ शेष हैं—
उनका काव्य नष्ट हो चुका है

किसी पोखर के मोड़ पर
मिले थे जो शब्द
अपने में ही डूबे हुए
फड़फड़ाहट शेष है—
अब केवल पंख छाँटने हैं

रिश्ते

रेल के प्लेटफ़ॉर्म पर का पानी कहता है
बचे हैं अभी बारिश के दिन
ख़त्म नहीं हुए हैं,
ख़त्म हो चुके हैं
अब केवल अपने रिश्ते

सभी के रिश्ते ख़त्म हो जाते हैं
जैसे पिंजरे ख़ाली होते हैं परिंदों के
या कहो कि प्रदर्शनी के
वे ही चित्र बिक चुके होते हैं
जिन्हें ख़रीदना चाहते हैं हम

एक बड़ा कपूर है जीवन
जिसमें जलना होता है
वह बेतरतीबी से जलने से रह जाता है
और उड़ जाता है

फिर भी एक रिश्ता होता ही है
न जलने का कपूर से केवल
और हाथ से फिसलते-फिसलते आख़िरकार
सारा दुःख मन में क़ैद हो जाता है

फ़ोल्डिंग कुर्सी की तरह यह मन अब
जब चाहो खोला जा सकता है
मेरे आँगन में—
छत पर बारिश हो मूसलाधार

सचेत होकर कहना होता है हमें
उस बारिश से अकुलाहट से
क्या तुम्हारे मेरे रिश्ते कभी ख़त्म नहीं होंगे दोस्त
और कान उसके बधिर

किसी नदी के तट पर बैठ जाता हूँ मैं तब
ताकते हुए एक-एक उठती तरंग को
अपने ही मन में गिनता हूँ
पराजित करती बारिश की एक-एक स्मृति को…

फिर भी कविता लिखते हैं हम

सोचना होता ही नहीं है और
देखते-देखते ख़त्म हो जाता है चंद्रग्रहण
ख़त्म होना ही था
ख़त्म होना ही होता है
लेकिन अपने ही हाथों ध्वस्त किए गए
इस देश के किनारों को
सूरज के उगने में लज्जा महसूस होती है
फिर भी कविता लिखते हैं हम—
स्वार्थ का धब्बा ओढ़कर

यहाँ पर अभरक और फूल दोनों अनचाहे होते हैं
पेट के निवाले के लिए भूखा होता है नर बलात्कारी
बेशक नहीं चाहता है वह अपना ही नंगापन और आत्मा की शाश्वतता
फिर भी बेशर्म होना ही होता है पुरुषों को
फिर भी कविता लिखते हैं हम—
पुरुषत्व को ओढ़कर

इसमें से भी निकलेगा कोई रास्ता इस झूठी तसल्ली में
रेती को पीसता रहता है और कहता है
जल्द ही निकलेगा आटा फिर रोटी और बस तृप्ति
क्यूँकि केवल देह से परे धन के लालच से परे
कुछ भी सिखाना है असंभव
फिर भी पाठ रटने होते हैं अध्यापक को ही
फिर भी कविता लिखते हैं हम—
हमारे माथे ज़रूरत नहीं होती है इसलिए

हर्ष भरे आवेगों को न चाहने वाले इस आसमान से
तारे भी दूरियाँ बनाते हैं
सर्वस्व के हाहाकार से नित-नए बलि रक्तिम रास्ते
शब्द नींव बनते हैं फिर भी थमता नहीं है
शहीदों की शापवाणी का समूहगान
फिर भी कहना होगा बेमतलब ही आत्मा अमर है

फिर भी कविता लिखते हैं हम—
मैं ही हूँ वह आत्मा यह जतलाने की ख़ातिर!

क़दमों तले हरियाली

क़दमों तले हरियाली चाहता हूँ मैं
चाहता हूँ हर तरफ़ महक
वसंत की हवा चाहता हूँ
और सपनों का कुछ फैलारा
मदिरा की ख़ातिर धीमे-धीमे ढलती रहे तपती धूप
रात्रि की लालसाओं के लिए तुम
रौंदती चली आओ मेरा मन

यथार्थ की अपेक्षा कभी-कभी
बहुत अधिक हरा होता है हर एक का स्वप्न
लेकिन वही होता है भयभीत स्वप्न देखने से
किसी स्वप्न न देखने वाले से अधिक
कोई भी द्वार नहीं होता है खुला कभी भी—
हवा के लिए, चाँदनी के लिए
फिर भी करकराहट की आवाज के साथ
खुलता जाता है सपनों का जग

अभी भी बैठ-बैठे घड़ी की टिक-टिक सुनते हुए
समझता जा रहा हूँ कि रिसता नहीं है समय
लेकिन उस रेती की घड़ी के क्या हैं मायने?
हर अंग से टपकते इस पसीने के क्या हैं मायने?
रेगिस्तान निराशा का हो चुका देख-रौंदकर और
सूँघी जा चुकी पसीने की भी गंध

मेरी मदद कर सके ऐसे कुछ परिंदे चाहिए
चोंच में पंख धरे हुए उड़ने की ख़ातिर
मेरी ही वजह से चलते रहेंगे शायद
तुम्हारी टकटकी धरे नज़र के रास्ते
मोड़ लाँघकर चलकर आओ तब
लगेगा एक मज़बूत विशाल द्वार
न खुलता हुआ संभवतः
अपनी दहलीज़ पर हर किसी को अपनी छाँव में लेता

संधि-प्रकाश की ख़ातिर जब अधखुली करता हूँ मैं
अपनी उनींदी आँखें
चमकने की मंशा से तब यूँ ही बिखरकर गिरते हैं
टूटे दर्पण के कोने
प्रतिमा जो बिगड़ी हुई होती है
अपने आप ही सँवर जाती है—
मुझसे बात करती है
और बतलाते-बतलाते ज्ञात होता रहता है कि
क़दमों तले हरियाली होती ही है…


श्रीनिवास रामचंद्र सिरास (1948–2010) मराठी के सुपरिचित साहित्यकार हैं। उन्होंने मराठी में कई लघुकथाएँ और कविताएँ लिखीं। उनके कविता-संग्रह ‘पायाखाली हिरवळ’ के लिए उन्हें मराठी साहित्य परिषद् सम्मान मिला। वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे। उनके जीवन पर बनी मनोज बाजपेयी अभिनीत फ़िल्म ‘अलीगढ़’ (2016) एक मार्मिक फ़िल्म है। श्रीनिवास सिरास की यहाँ प्रस्तुत कविताएँ मराठी से हिंदी में अनुवाद के लिए उनके कविता-संग्रह ‘पायाखाली हिरवळ’ (क़दमों तले हरियाली) से चुनी गई हैं। सुनीता डागा मराठी-हिंदी लेखिका-अनुवादक हैं। उन्होंने समकालीन मराठी स्त्री कविता पर एकाग्र ‘सदानीरा’ के 22वें अंक के लिए मराठी की 18 प्रमुख कवयित्रियों की कविताओं को हिंदी में एक जिल्द में संकलित और अनूदित किया है। यह प्रस्तुति ‘सदानीरा’ के क्वियर अंक में पूर्व-प्रकाशित।

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